"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Oct 5, 2008

यात्रा-१

एक पूरी दूनिया समेटकर
बसेरा छोड़ते हुए लगता है,
सब यही है,
कभी भी वापस आना हो जायेगा
हमारे जाने के बाद भी रहेंगी
शहर मे हमारी मौजूदगी
सब वैसे ही रहेगा
मन कहता है
"बस कुछ ही दिन की बात है
आ जायेंगे फ़िर यही "

गाँव छोड़कर शहर
और शहर दर शहर
रास्ते है कि और लंबे हो जाते है
और उम्र चूक जाती है।
सड़के है कि
घूम-फ़िर कर वापस जाने का नाम ही नही लेती.


और अक्सर एक लंबे युग तक
घर लौटना हो भी जाता था,
कुछ दिन बाद ,
महीनो बाद,
कई बार सालों बाद
बचपन और जवानी के उन दिनों मे
घर लौटकर आती थी एक निश्चिंत नींद,
इतनी कि जैसे जनम-जनम से अनिद्रा पूरी करनी हो.
ऐसे ही आती थी खुशी और भूख भी

फ़िर घर छोड़ते वक़्त ले लाये
कुछ घर अपने भीतर
जब घर लौटना उस तरह सम्भव नही है.
और कई शहर जिनमे हम बसते थे कभी
अब बसे है हमारी स्मृति मे।

स्मृति के शहर रूक जाते है
वही पर जहा हम उन्हें छोड़ आए थे,
और सचमुच के शहर बदल जाते है,

5 comments:

  1. स्मृति के शहर रूक जाते है
    वही पर जहा हम उन्हें छोड़ आए थे,
    और सचमुच के शहर बदल जाते है,

    bahut khub

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  2. गाँव छोड़कर शहर
    और शहर दर शहर
    रास्ते है कि और लंबे हो जाते है
    और उम्र चूक जाती है।
    सड़के है कि
    घूम-फ़िर कर वापस जाने का नाम ही नही लेती.

    बहुत ख़ूब...

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  3. ऐसा आभास हो रहा है कि 'यात्रा' की एकाधिक कड़ियां पढ़ने को मिलने वाली हैं.मुझे यह लगता है कि 'स्मृति के शहर' न हों तो सचमुच के शहरों के दिए रंजो-गम की रफ़ूगरी कौन करे? आप चाहे तो इसे भावुकता कह लें परंतु क्या करें इस कायनात में इसकी भी एक जगह तो है ही!
    अच्छी कविता!!

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  4. स्मृति के शहर रूक जाते है
    वही पर जहा हम उन्हें छोड़ आए थे,
    और सचमुच के शहर बदल जाते है,

    -कितनी गहरी और सच्ची बात कह दी, बिल्कुल जैसा मैं हरदम सोचा करता हूँ, आपने उसे शब्द दिये हैं. बहुत आभार और बधाई.

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  5. आपकी प्रोफाइल देखि "यायावार" एक पल के लिए चौंक पड़ी, पर फ़िर यह कविता देखकर लगा आपने कितना सही लिखा है.बहुत सुंदर

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