"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Sep 21, 2008

दादी-दादा की कहानी-3

दादी की कहानी शुरू करने का मेरा कोई प्लान नही था। पर अब भी अक्सर बचपन के घर के सपने आते है। कई दिनों के बाद सपने मे फ़िर दादी के साथ लंबा समय बिताया। ब्लॉग खोलकर देखा तो ख़ुद -ब -ख़ुद दादी की कहानी शुरू हो गयी। समय की बंदिश, है, पर कुछ सार मे लाल्बोलुबाब ये है, की दादी आज भी हम सब की स्मृति मे चंडीरूप ही है। बहुत सशक्त , घर परिवार मे उन्होंने अपने सौतेले बच्चे, जेठ के बच्चे और अपने ६ बच्चे संभाले। और घर परिवार तक ही सीमित भी नही थी, खेती मे, जंगल से लकडी लाना, पानी लाना, हर तरह के काम मे उनका सहयोग बराबर ही था। मेरे दादा ख़ुद बेहद मेहनती थे, १४-१६ घंटे रोज़  घर-बाहर काम करते थे। पर शाम के समय खाना खाने के बाद घर के सभी सदस्यों को उनकी अंगीठी के चारो तरफ़ झुंड लग जाता था। और और गीता, भागवत, पुराण और कई तरह के श्लोक, कविता पाठ सबके लिए करते थे। बेटिया, बहुए, उनकी पत्नी, बच्चे, अक्सर गाव के दूसरे लोग भी रोज १-२ घंटे इसमे शामिल रहते थे।
कड़क मेहनत के बाद, खेती, जानवर आदि देखने के बाद भी मेरे दादा अपना दिन सुबह १-२ घंटे की एकांत रामायण पाठ से करते थे। और कुछ जानकारी उन्हें पहाड़ मे पायी जाने वाली जडी -बूटियों की भी थी। डॉक्टर के अभाव मे दूर-दूर तक के गाँव वाले उन्ही का सहारा खोजते थे। साँप के काटे लोगो को बचाने का जिम्मा पूरे इलाके मे उन्ही के पास था। सिर्फ़ सेवा-भाव से ही वों सबकी मदद करते थे, और इसके एवज मे कभी कुछ किसी से नही लेते थे। इस कारण दूर-दूर के गाँव के लोग भी हमारे गाँव को उनके नाम से जानते थे। और खेती के समय, किसी कामकाज के समय, हर वक़्त उनका काम बिन बुलाए कराने को तैयार रहते थे। अपनी जरूरत भर का सामान उन्हें अपनी खेती से मिल जाता था। स्वभाव से बेहद सज्जन , और विनम्र, और बेहद स्वाभिमानी।

मेरी दादी का जीवन से संतुष्टी के साथ जीना इसीलिए भी सम्भव हो पाया होगा क्योंकि दादाजी, उम्र के अधिक होने के बाद भी सज्जन, विनम्र और मेहनती थे। अपनी तरफ़ से जितना बन पड़ता था, सारे काम करते थे। और परिवार के पास भले ही धन न था पर एक बहुत बड़ा मित्रो का दायरा था। बहुत मुश्किलों के बाद भी बेहद हौसला था। फ़िर मौक़ा  लगा  तो  लिखूंगी ।

Sep 20, 2008

दादी का जीवन-2

सोलह साल की उमर मे मेरी दादी ३४ साल के मेरे दादा की पत्नी बनकर घर आयी थी। घर पर कोई महिला न थी। दो बच्चे मेरे दादा के और तीन बच्चे उनके बड़े भाई के थे। कुछ ऐसा इतेफाक हुया की दोनों की पूर्व पत्निया किसी शादी मे भाबर गयी आयर मलेरिया की चपेट मे आकर अचानक मर गयी थी। बड़े भाई नौकरी करते थे, और छोटे भाई यानी मेरे दादा गाँव की जमीन देखते थे। अंत मे ये तय हुया की छोटा भाई दूसरी शादी कर ले, और उसकी पत्नी इन सारे बिन माँ के बच्चों को संभाल ले। दादा के परिवार मे दोनों लोगो ने इस रणनीती को ध्यान मे रखकर मेरी दादी को परिवार मे लाये थे। आस-पास के गाव के लोगो को परिवार के हालत का पता था, सो कोई भी आसानी से अपनी लड़की को इस बोझ तले नही धकेलता। इसीलिये बहुत दूर के गाँव के एक अहमक, जंगलात के अफसर जिसकी बड़ी उम्र की बेटिया थी, उसके सामने मेरे दादा विवाह का प्रस्ताव लेकर गए। मेरी दादी के सगे जीजा ने भी इस रिश्ते को करवाने मे खासी भुमिका निभायी।

शादी के तीन-चार दिन पहले मेरी दादी को बताया गया की उसकी शादी है। शादी की उम्मीद हंसी-खुशी भरे जीवन की ही रही होगी शायद मेरी दादी के मन मे भी, उसे क्या पता था की इसका क्या मतलब है? ससुराल पहुँच कर कितने पत्थर उसके गले लटकने वाले है? किस -किस के हिस्से की जिम्मेदारिया , उसके सारे सपनो और ऊर्जा को सोखने का इन्तेजाम किए बैठी है? और ये कमसिन लड़की इससे बेखबर, थैला भरकर गहने जो उसके पास पंहुचे थे, उन्ही मे खुश हो रही थी। ये गहने भी उन दोनों मृत औरतों के थे जिनके बच्चे उसे जाकर संभालने थे। और सिर्फ़ दो-चार दिन के बाद उसे लौटाने थे। ये कहानी ढेर सी दूसरी औरतों की भी थी, जहाँ मात्र शादी के दिन के लिए गाँव भर के गहने इक्कठे किए जाते और दुल्हन के माँ-बाप को दिखाने के लिए, और घर लौटते ही गहने वापस लौटा दिए जाते। औरतों को इस तरह के धोखे देने की सामाजिक सहमति थी, और शायद आज भी है। मेरे दादा के सदाचार की , भले , उदार मनुष्य होने की साख थी। पर सामाजिक मर्यादा, उसके ताने-बाने, नेकचलनी के कांसेप्ट भी पुरूष-पुरूष के व्यवहार पर ही आधारित है। स्त्री -पुरूष के सन्दर्भ मे तो मर्यादा पुरुषोतम भी मर्यादा खो देते है, और उसका भी यश पाते है.

कभी -कभी मुझे लगता है की शादी -शुदा जीवन हमारे चारो तरफ़ बिखरा है, और कई मायने मे अपने घर परिवारों मे , समाज मे विशुद्द स्वार्थपरता से ये सम्बन्ध तय होते है, पर लड़की जिसकी शादी होनी है, वों न इन फैसलों मे शामिल है, और जिसे एक बड़ा विस्थापन झेलना है, वों शादी-शुदा जीवन के सुनहरे सपनों मे डूबी रहती है। शायद जितना कठिन शादी-शुदा जीवन है, उसके ठीक उलट इसका "विज्ञापन" उतना ही लुभावना है। और ये लोरी से शुरू होकर मोक्ष तक पहुँचने की यात्रा मे सब जगह बड़े उजाले अक्षरों मे है। इतना प्रबल है ये विज्ञापन की ये आस-पास के देखे सच और उसको गुनने की शक्ति को , नष्ट कर देता है.

पिता ने अपनी बचकाना हरकत मे तीन बचन बंधवाये, ये सोचकर की मेरी बेटी की खुशी तय हो गयी। माँ ने जब इतनी बड़ी उम्र के ६ फिट लंबे दुल्हे और अपनी सबसे नाजुक कमसिन लड़की का जोड़ बनते देखा तो बेहोश हो गयी। उसके बिना ही शादी की सारी रस्मे हो गयी और मेरी दादी विदा हो गयी.

Sep 10, 2008

ब्लॉग्गिंग के एक साल : "The argumentive Indians are very much alive here"


पिचले साल सितम्बर मे खेल-खेल मे ये ब्लॉग बनाया था, सिर्फ़ इस उत्साह से की ओनलाईन हिन्दी टाईप की जा सकती है, और मोजिला पर एक पुराने मित्र का ब्लॉग ठीक से पढा नही जा रहा था, उसी समस्या को सुलझाने के लिए, ख़ुद ब्लॉग बनाया। कुछ दिन तक ख़ास समझ नही आया की क्या किया जाय? किसके लिए लिखा जाय? कितना समय इस पर खर्च किया जाय? और इससे हासिल किसी को भी क्या होगा?

इन सवालो के ज़बाब अभी भी ठीक-ठीक नही मिले है, पर बरसों पहले छूट गया डायरी लेखन और ख़ुद से संवाद कुछ हद तक कायम हुया है। ब्लॉग जगत से परिचय हुया और कुछ लोगो का लिखा पढ़ने का चस्का भी लगा। कुछ पुराने जाने-पहचाने नाम कई सालो बाद ब्लॉग जगत मे देखने को फ़िर से मिले। सारी प्रविष्टिया तो नही पढ़ सकती पर फ़िर भी जब भी मौका मिलता है, "एक हिन्दुस्तानी की डायरी, टूटी -बिखरी, कबाड़खाना, ठुमरी, उड़न -तस्तरी , घुघूती-बासूती, पहलू, चोखेर बाली, नारी, शब्दों का सफर, और सुनील दीपक जी के ब्लोग्स नियमित पढ़ती हूँ।

बाकी, "गाहे-बगाहे" के विनीत मुझे अपने विधार्थी जीवन मे वापस ले जाते है, मिनाक्षी जी की कविताएं, कई अनुभूतियों को जगाती है, रियाज़ उल- हक , दीलीप मंडल जी,अफलातून जी, के ब्लोग्स सोचने की सामग्री भी देते है। तरुण और काकेश वापस घर की याद दिला देते है। और भी कई ब्लोग्स को बीच-बीच मे देखने -पढ़ने का अवसर मिला, सब का नाम लेना यहाँ असंभव है। यही कहा जा सकता है, की ब्लॉग जगत एक समग्र आईना है, भारतीय समाज का, कोई पहलू और दृष्टिकोण इसमे छूटा नही लगता, एक धरातल पर कई तरह की जद्दोजहद। शायद इसी जद्दोजहद से आपस मे सभी को कुछ सीखने को मिलेगा। "The argumentive Indians are very much alive here".

तीन लोग जिन्हें पढ़ने की इच्छा रहती है, आजकल गायब है, काकेश, चंद्रभूषण और मनीषा पाण्डेय, अगर कही ये लेख पढ़े तो आप लोग समय मिले तो ब्लॉग पर ज़रूर लिखे, ऐसी मेरी विनती है। आप तीनो लोगो को पढ़ना अच्छा लगता है। असहमति कई बिन्दुओ पर हो सकती , फिर भी आप के लिखे का इंतज़ार रहता है।

इस महीने दस साल पुराना आशियाना छोड़ा है, और नई नौकरी, नया घर, नया शहर, अपनाया है, सो समय कभी कभार ही लिखने का मिलेगा, पर पढ़ने की गुंजाईश किसी तरह निकालती रहूंगी। ले दे कर यही एक जीवंत संवाद मेरा "Vibrant India " से बचा है। और शायद कुछ हद तक ब्लॉग्गिंग के मायने , और यह्ना समय नष्ट करने का मुआवजा भी यही है।
मेरे ब्लॉग पर आने वालो का धन्यवाद.

Sep 6, 2008

कुछ और समय तक आप सब से बातचीत न हो सकेगी.

प्रिय ब्लोगर मित्रो,
व्यक्तिगत व्यस्तता के चलते, कुछ और महीनो तक आप सब से बातचीत न हो सकेगी। फ़िर भी कोशिश होगी की यदा-कदा आप सबका लिखा पढती रहूँ और टिप्पणी के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रहूँ।

मेरे ब्लॉग पर आने वालो का धन्यवाद और हिन्दी ब्लॉग पर अच्छा लिखने वालो का भी.