"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Dec 31, 2009

नया साल मुबारक: कुछ और रास्ते मिले, कुछ और रास्ते खुले......

एक दिन अचानक मुहँ बिरायेगा आयना, चांदी के तार झलकेंगे कपास की खेती में बदलने से पहले, तुम फिर फ़िराक में रहोगे, अभी भी पकड़ में है वक़्त, कुछ और दिन के लिए मुब्तिला कर दोगे खुद की तलाश. वक़्त के बदलते घोड़े की घुड़सवारी नहीं करोगे, उसकी थापों की थाह लोगे, तब जब वों एक फासले तक गुजर चुकी होंगी. फिर सुनोगे उसे एक भूली तान के भ्रम में, या किसी आहट के अंदेशे में। दुनिया बदलने की खुमारी में डूबे तुम, एक कोने दुबके रहे और उतनी देर में बदल गया है दुनिया का धरातल, कुछ वैसे नहीं जैसे चाहा था तुमने, जैसा अंदेशा था दन्त कथाओं में, जैसी उम्मीद कायम थी कत्लो-गारद की भरी पिछली सदी में.

फिर अकबका कर पूछोगे एक दिन क्या यही थे हम? बस इतने भर? ऐसे ही डूबे उतरोगे भीतर ही भीतर विषाद के विष में, और बाहर जो आयेगा वों धिक्कार होगा, दूसरों से ज्यादा अपने लिए, अपने होने के मायने खारिज़ करता. वों कहाँ होगा जो थे तुम, कहाँ होगी वों संभावना जो हो सकते थे तुम? हकबक में, फिर उठोगे तुम खुद को दुरुस्त करते, फिसलती जमीन पर, बिन शऊर सौदा करने, फिर से क़त्ल होगा एक दिन, बेबस होगी एक रात, और अंतहीन होगा ये सिलसिला. जमाने की आँख से खुद को देखोगे और ज़माना भी देखेगा सिर्फ सफलता के ब्लैक एंड व्हाईट सिनेमा की तरह तुम्हे. अंतर्मन का धन, सपनों की उड़ान को पकड़ सकेगा कोई कैमरा?

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पथराये सपनों में, उलटे रास्ते दिखेगा कोई घुड़सवार, पलटकर पीछे लुढकता, गिरता, संभलता, पत्थर किसी टीले से, घर को तोड़ता, अनजाने सरों पर अचानक से बरसता, फिर से ढूंढता भटकता पुराना रास्ता, पुराना शहर, और जीने के पुराने ढंग. वों भी कुछ देर में समझेगा कि रास्ता अब एकतरफा हो गया है, पलटकर वापस नहीं ले जाएगा वहाँ, जो छूट गया था. अब चांदनी चौक नहीं जाएगा रास्ता, और जाएगा भी तो चाईना के रास्ते. वक़्त से पहले निढाल होंगे इसी आपा-धापी में, हम में से बहुत से लोग. फिर एक दिन हिसाब लगायेंगे, अपने हिस्से के सुरज का, रोशनी का, याद करेंगे नाज़ुक अनार की डाल और घनी अखरोट की छाँव को, बौरायी आम की, और किसी पहाड़ की गुनगुनी धुप में उठी संतरे की खुशबू की. पर तब पहाड़ जैसा पहाड़ होगा, पहाड़ चढ़ने का हौसला भी होगा, जीवन ही पसर जाएगा पहाड़ बनकर हिलने के लिए.

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पीछे मुड़ते और आगे बढ़ते कदम, दोनों होंगे दिशाहारे, बिना नक़्शे के गोल गोल घूमेंगे दूनिया के एक छोर से दूसरे तक, फिर से काटेंगे चक्कर उन्ही रास्तों पर गोल-गोल, दोहरायेगे फिर से आदिम यात्रा पीढी दर पीढी, फिर सोचेंगे क्यूँ निकल आया आदिमानव अफ्रीका से, कितना घूमा पैदल, वों भी फैला सात भूखंडों में। सवाल वही होगा, जीने के संसाधन, और अपने संसाधन में बदलने की सहूलियत का, बाज़ार की ज़रुरत का और मुनाफे का समीकरण भी, इसी के बीच डोलते, मिलेंगे आगे जाते और पीछे लौटते लोग अपनी खुमारी में, भीड़ से अटे, सटे, लदर-बदर, बेहाल एयरपोर्ट पर और ऐसे ही जाने कैसे कैसे पोर्ट पर, बदहवास, बैचैन, बदशक्ल. बीच बीच में ठोर मिलेगा, दुरुस्त करेंगे कपडे लत्ते, चहरे और बाल, और हदर-बदर देखेंगे दूसरे की आँखों से अपनी शक्ल. और धीरे से मुस्कराकर कहेंगे, नया साल , नयी यात्रा मुबारक. कुछ और रास्ते मिले, कुछ और रास्ते खुले......

Dec 17, 2009

जीवन: क्या बनोगे तुम?

जिज्ञासावश नहीं आता सवाल कि बच्चे क्या बनोगे तुम? सवाल हमेशा मुखर हो ये ज़रूरी नहीं, सवाल का उत्तर भी ठीक-ठीक मिले ये भी ज़रूरी नहीं। ज़रूरी जो है वों है उसका ज़बाब जो बिन ज़बान, चुपके से, चालाकी से उकेर दिया जाता है, कोमल कोरे मन की तहों पर अचानक से खिलानों के बीच खेलते हुए, किसी रंगीन लुभावनी किताब को पलटते हुए, सीधे-सीधे नहाकर कपडे पहनते हुए भी, एक बड़े की आशीष के बीच, कि कुछ एक होने के लिए, कुछ एक बनने के लिए ही है जीवन!


क्या बनना है बच्चे को? बच्चा अभी कहाँ जान पायेगा कि ये कुछ एक बनने की लहरदार सीढ़ी, चुनाव और रुझान से ज्यादा, कब एक जुए की शक्ल ले लेगा, जो भाग्य, भविष्य, और बदलते बाज़ार की ज़रुरत के दांव से खेला जाएगा। बच्चा दूसरे के देखे सपने में अचानक दाखिल होगा, कभी एक डॉक्टर बनकर दिन भर घिरा रहेगा, बीमारी, बेबसी, और व्यापार के बीच। कभी एक डेंटिस्ट की शक्ल में अपने ८-१० घंटे बिताएगा, सड़े दांतों, और बदबू मारती साँसों के बीच। कभी एक बेबस-फटेहाल, टीचर की शक्ल में जो अपने जीवन के सबसे ज़रूरी पाठों को पढने से रह गया। कभी नींद में बौखलाए पायलेट की तरह, जिसका जीवन एक रुकी हुयी, ख़त्म न होने वाली, बिन मंजिल की यात्रा में बदल गया है। कभी किसी एयरहोस्टेस की शक्ल में, जिसके लिए हवाई उड़ान के रोमाच और ग्लैमर की ठीक बीचों बीच जूठी प्लेटों के ढ़ेर में है जीवन। कभी इन्ही सपनों में दाखिल होंगे निर्वासित वैज्ञानिक और इंजीनियर, जो एक लम्बी दिमागी कसरत के बाद बस हाथ बनकर रह गए है, और जिनका दिमाग भी हाथ का ही विस्तार है, कुछ ज्यादा कठिन कसरतों के लिए, ये दिमाग एक बंद खांचे से बाहर, जीवन से ज़िरह के लिए नहीं है, सवाल के लिए नहीं है, एक प्रोजेक्ट से दूसरे को बिन रुके निपटाने के लिए है। कभी आयेगा किसी दूसरी शक्ल में एक पत्रकार के लिए, टीवी पर लहकते-बहकते लड़के लड़कियों के लिए, और भी कई शक्लों में आयेगा उन सब बच्चों के जीवन में जिनसे बड़े लाड से कभी पूछा जाता रहा, कि क्या बनोगे बच्चे?

कुछ सिगरेटबाजों के लिए

इस बीच जीनोमिक रीसर्च की एक खासी उपलब्धी कैंसर को सिस्टम लेवल पर समझने की कसरत रही है। हमारे शरीर के बहुत से जींस जो सामान्यतः अपना काम करते है, आंतरिक और बाहरी वजहों से प्रभावित होकर, उस काम को ठीक से नहीं कर पाते, और यही एक वजह बनती है तमाम तरह के कैंसर की। तकरीबन २३,००० मुटेशन सिर्फ फेफड़े के कैंसर से सम्बंधित पाए गए है, जिनका धुम्रपान से सीधा सम्बन्ध है। लगभग हर १५ सिगरेट पीने के बाद ये निश्चित ही है कि एक बदलाव किसी ऐसी जगह आयेगा जो कैंसर होने कि दिशा में एक छोटा या फिर बड़ा रोल निभा सकता है। किस तरह से ये बदलाव आते है, और इनका असर किस तरह से हो सकता है, उसका एक २ मिनिट का वीडियो है.

Dec 8, 2009

चिड़िया भर आसमान

चहकी हवा देती जैसे निमत्रण
कि
चलो एक छोर से दूसरे तक देख आए दुनिया,
एक ज़रूरी शर्त है जीवन की इस छोर से उस तक
और
फ़िर उस छोर से इस तक उड़ना,
गंतव्य जैसा गंतव्य भी नही कोई,
लगातार गति है, सिर्फ़ यात्रा का रोमांच है,
अनदेखे रास्तों की, अबूझी संभावनाओं की आस है

चलो फुर्र से निकल उड़ चले
इन महाद्वीपों के परे, महासागरों के पार,
निकल जाय फुर्र से, अलसुबह की ख़ुमारी में नहाए
अरुणिम सुरज और पूरे चाँद के ठीक बीचों-बीच
या फ़िर निकल जाते है किसी हतप्रभ सर के ऊपर
और बताते है उसे बची है उम्मीदे, और संभावनाए
जो बिनबूझे दाखिल हो जाती है अब भी.....

Dec 5, 2009

नही है देश जैसा कोई देश, शहर जैसा कोई शहर

कहीं दूर से एक भूली पुरानी धुन के संगीत में आह सुनाई देती है, घर लौट आओ......
मै अकबक ढूंढती हूँ घर का पता, शहर का पता, देश का पता, बहुत टटोलने पर भी ठीक ठीक शिनाख्त नही कर पाती उस जगह की। यायावरी में एक शहर से दुसरे, दूसरे से तीसरे, और फ़िर लगभग चार दशक की यात्रा में जहाँ हर २-३ साल में शहर बदले हो, और बेहिसाब सरकारी मकान, किराए के मकान, और हॉस्टल की दूनिया में जीवन बीता हो तो किसी एक जगह उंगली रखकर ये कह देना की ये मेरा घर है, ये मेरा घर था, ये मेरा शहर था, दीवानेपन के अलावा और क्या है? किसी दरवाजे पर जो नींद की सी रोमानियत में जाकर खड़ी हो जाऊं तो कौन पहचानेगा? पीछे छुटे शहर जिस गति से बदल गए है, वहाँ कही खड़े हो जाए तो बीते दिनों की ही तरह हमारी स्मृति के वों शहर भी बीत गए है, अब ये कोई और ज़मीन है, ये कोई और लोग है, इनकी दूनिया से हम, और हमारी दूनिया से बेदखल है ये लोग!

कहने वाले फ़िर भी कहेंगे, दीवानापन छोड़ो, शहर के चेहरे पर क्या कोई घर के निशान ढूंढता है? यहाँ रहने को एक कमरा मुहय्या नही और मैडम को पूरा शहर चाहिए, घर के लोग ठीक-ठाक पहचान ले तो गनीमत है, शहर से पहचान भी कोई बात हुयी? शहर, देश, सब घर की चारदीवारी के भीतर है, दहलीज़ से बाहर निकलते ही अनजानेपन की मारा-मारी है, लौटकर साबुत आ सकेंगे इस चारदीवारी के भीतर शाम को, इस बात की भी क्या कोई गारंटी है? बाकी सब किताबी बातें है, कहने, सुनाने और गाने के लिए है, जीने के लिए शहर नही, देश नही, बस निजी, बन्द, दड़बे है, बाकी कुछ और कहाँ है?

इस बात से भी निश्चिन्त कहाँ हो पाती हूँ कि किसी चारदीवारी के भीतर ही मनुष्य की पूरी पहचान अट सकती है? न इस बात का धीरज बाँध पाती हूँ कि चारदीवारी के बाहर फैले डर भी घबराकर हमारे साथ घरों के अन्दर ही घुसे चले नही आयेंगे? मनुष्य भले ही शिष्टता में रहे, डर तो खेल खेलने को स्वतंत्र है। क्या मालूम कि उन्ही का साम्राज्य और गहराता जाएगा अंधेरे बंद कमरों के भीतर भी। डरो के साम्राज्य में, अपने-अपने सुकून ढूंढते लोग, किस किसको पहचानेगे? पहचान सकेंगे? या फ़िर अपने अपह्चाने मन और हारी इच्छाओं के आयने में एक दूसरे को निहारेंगे? एक दुसरे की शिनाख्त करेंगे? और फ़िर बिलबिलाकर मैं चारदीवारी से बाहर सड़क पर निकलूंगी, शहर से दूसरे शहर होते हुए एक देश से दूसरे, दूसरे से तीसरे, चौथे, लगातार किसी नए देश की तलाश में भट्कुंगी? जहाँ पूरी पहचान के साथ जिया जा सके, खंड-खंड मे पहचान न हो, शहर उसी का आँगन हो, और देश एक अमूर्त बीहड़ जंगल से कुछ ज्यादा जिसे याद करने के लिए सिर्फ़ उसकी भोगौलिक चारदीवारी का रोमानियत मे लिखा गाना न गाना पड़े.......

Dec 2, 2009

This Land is Your Land - Woody Guthrie


वूडी गुथरी के गाने और जीवन दोनों मुझे हमेशा से आकर्षित करते रहे। पिछले कुछ सालो में भूल गयी थी। पर कुछ इतफ़ाक से मेरे ५ साल के बेटे को गुथरी का एक गाना जो अमेरिका का एक तरह का लोकगीत है इतना भाया है, कि जब तक गाता है, और एक जगह स्टेज पर गा चुका है। उसी के दोस्तों के लिए,


Nov 25, 2009

Thanksgiving poem by 5 year old

Blueberry blueberry who are you?
with raspberry you are going to be a topping too
pie-pie who are you?
you are frosting cake too
so you can be eaten


Turkey turkey lets roast you
so we could toast it
and make it so scrumptious today
scrumptious food is very good
helps you get vitamins
and then you can succeed the virus today

Pigy-pigy who are you?
you are going to be roasted beef too
chicken chicken you are a lion
so you can eat the turkey

Nov 19, 2009

ढाई बरस का एक बच्चा

ढाई बरस के एक बच्चे ने
अभी सीखा है पूरी ताकत के साथ नकार
और अपने चुनाव


ढाई बरस का एक बच्चा खोजता है
सहजता, आदमजात के इतर
किसी दूसरे रूप में, बिम्ब और भूगोल में
कभी गाय के बछड़े में
और चाहता है कि माँ भी गाय बन जाय
कभी हाथी में, और चाहता है
माँ के साथ एक बड़े स्वर मे गर्जन
तो कभी डायनोसोर में और झपट जाता है
माँ के ही ऊपर
और कभी फडफडाता है
अपनी कल्पना के पंख
एक कोने से दूसरे मे उड़ता हुया।

ढाई बरस का बच्चा
रोज़ खोल देता है माँ के बंधे बाल
और ढक देना चाहता है चेहरा
खिलाना चाहता है माँ को कुछ ज़बरदस्ती
और चहकता है जीत पर
गौर से देखता है बालियाँ
और छीन लेता है स्कार्फ
छुपमछुपाई के लिए
या फ़िर बनने को सुपरमेन

जो कभी माँ निकाल सकी
वक़्त एक कल्पनालोक से दूसरे मे उड़ने का
तो कहता है
"मामी यू आर गुड बॉय ".

Nov 17, 2009

आधी शताब्दी यम के इंतज़ार के बाद भी बची रहती है स्त्री

बरसो पहले जब मैं छोटी थी
अक्सर किसी दादी, नानी, ताई,
या फ़िर ऐसी ही किसी अधेड़ पहाड़ी स्त्री
को कहते सुनती थी
दिन भर की कमरतोड़ मेहनत के बाद
'बाबा-बोई * मुझे यम भी भूल गया है"
क्या करू जब तक है जान
तब तक लगी हूँ

अक्सर मन मे सवाल आता था कि
एक भरे-पूरे परिवार मे स्नेह बांटती स्त्री,
एक माँ, पत्नी
और एक कठिन भूगोल मे
बुजुर्गो का एक मात्र संबल
क्यूँ रिक्त हो जाती है अपने भीतर ही भीतर

और बहुत सी ये स्त्रियाँ आधी शताब्दी
ऐसे ही जी गयी
कर गयी बच्चों को अपने पैरो पर खडा
पितरो का तर्पण
बना गयी घर-द्वार
कंठस्थ है इन्हे रामायण
और कबीर और रहीम
और ढेर सी लोकोक्तिया
कभी स्कूल जाने के बाद भी

तीस साल बाद अचानक
एक दिन ऐसे ही
बचपन के मृगछौने जैसे उत्साह से
उलटे रास्ते
कूदते-फांदते सीढ़ीदार खेतों मे
बहुत उपर मुझे मिलती है एक दादी
एक पेड़ के नीचे घाम तापती हुयी
सौ साल की एक बुढ़िया
और कहती है
"बोई बहुत सुख से हूँ,
कितना खुबसूरत है
सामने का पहाड़ और यहाँ की धुप
किसी अस्पताल की बजाय
यही मरना है मुझे"

आधी शताब्दी यम के इंतज़ार मे
जीवन को धकेलती स्त्री के भीतर भी
ज़िंदा रहता है प्रेम
प्रकृति से, मनुष्य से,
और बची रहती है इच्छा..........

Oct 13, 2009

A Song from Garhwal Himalayas




The Rhododendron trees laden with flowers

Decorate the mountains,

Like jewels studded in a crown !

The 'kafal' fruit is ripe

Come dear friend - Let us go to the forest

To eat the fruit of the 'kafal' bush

The leaves of the Oak tree have turned green

There is water in the roots of the Oak

Come, quench your thirst !

Pluck the Rhododendron flowers


But do not break its branches

Cut the dry branches of the Oak

But do not cut it from roots !

Cut grass, but not the branches

of the Deodar trees.

Oct 11, 2009

नोबेल एक प्रोमिसरी नोट पर

बराक वाकई एक बड़ी संभावना का नाम है, उनमे प्रतिभा है, साफगोई है, और इस तरह का करिश्मा भी है, जो जन नेताओं मे दुर्लभ होता है। स्वयं बराक को बहुत पसंद करती हूँ। पर उन्हें शांती का नोबेल जिस तरह से दिया गया है, वों मुझे भी हतप्रभ कर गया है। ऐसा लगता है की ये एक अलिखित करार या प्रोमिसिरी नोट पर दिया गया है।
बराक की इन जीतो के मायने समझने मे कम से कम अगले आठ साल तो लगेंगे ही।

Sep 16, 2009

हम सब अचिन्हित शिकार है योनिक हिंसा के .

बलात्कार के तमाम पहलू है जिन पर बहुत कुछ बोला-लिखा जाता है, जिसमे नर होरमोंस पर दोशोरोपन से लेकर, स्त्रियों का व्यवहार, वेश भूषा चपेट मे आती है। बलात्कार की घटनाओं मे कमी स्त्रीयों के किसी भी तरह के आचरण करने से काबू मे नही सकती (चाहे वों बुर्का पहने, रात-बेरात घर से बहार निकले, या फ़िर हथियारों से लैस होकर सड़क पर निकले) ये एक सामाजिक समस्या है, और इसकी जड़े भी इसी व्यवस्था मे है।, चाहे अनचाहे स्वीकृति भी। अपनी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से आसानी से मुह मोड़ने का सबसे आसन तरीका ये है की दोष पीड़ीत पर मढ़ दिया जाय। क्या बलात्कार की पीडीत स्त्री सिर्फ़ इसीलिये आत्महंता बन जाती है की किसी ने उसका शील भंग कर दिया है, शुचिता नस्ट हो गयी है? और वों अपवित्र हो गयी है? ये कुछ कपोल कल्पनाये है, जिसे हमारी दोगली और सामाजिक व्यवस्था ने अपने हित मे गढ़ रक्खा है, ताकी वे अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाय। क्या वाकई हमारा समाज इतना मानवीय है की वों पीडीत को जीने के संबल देने को उतारू है, और ये बेवकूफ लड़किया है जो योन शुचिता के 'विचार" की बली चड़ रही है? और जो बच जा रही है वों इस कीमत पर कि अपना मुहं बंद रखे ! परिवार का मुहं काला न करे!
देश मे क़ानून है, और जैसी भी लचर व्यवस्था है, जनतंत्र की, कितने लोग है जो दम लगाकर इन हथियारों का इस्तेमाल करते है। बलात्कार के बहुत से अनछुए पहलू मे एक ये भी है कि हमारे समाज मे माता-पिता, नाते रिश्तेदार, और दोस्त, तीनो जिन्हें पीड़ीत का संबल बनाना चाहिए, वों उसका साथ छोड़ देते है। कम से कम इस अर्थ मे कि कानूनी लड़ाई लड़ना नही चाहते और समाज मे अपनी रुसवाई से डरते है। समाज, पास पड़ोस, और स्त्री के प्रति एक गहरा अमानवीय सामाजिक नजरिया कि बलात्कार की पीडीता, विधवा और तलाकशुदा स्त्री एक झूठी थाली है, न कि एक मनुष्य, स्त्री को हाशिये पर फेंक देने के लिए जिम्मेदार है। जब तक ये स्थिती रहेगी, पीडीत कैसे सिर्फ़ अपने बूते और अपनी सोच के बूते इस समस्या का हल ढूँढ सकता है? इससे पहले कि बलात्कार की पीड़ीता ये मानने लगे कि ये एक मात्र दुर्घटना थी, उसके परिवार को, और वृहतर समाज को इस मूल्य को अपनाना पडेगा। बलात्कार स्त्री और उसके परिवार के लिए सामाजिक कलंक है, और जब तक सामाजिक सोच नही बदलेगी, खाली पीड़ीत की सोच बदलने की बात से क्या होगा?



धीरे-धीरे ही सही पर हमारे समाज मे बदलाव आए है, और प्रिदर्शनी मट्टू के पिता के जैसे पिता भी हमारे देश मे है, जिन्होंने बेटी की मौत के बाद भी न्याय के लिए संघर्ष किया, और अपराधी को सजा हुयी। भावरी देवी के पति भी है, जिन्होंने अपनी पत्नी का साथ दिया। मेरी नज़र मे यही एक अभूतपूर्ण पहल हमारे जनतंत्र मे हुयी है, जिसमे एक आम, बूढा पिता, और परिवारजन , एक गरीब ग्रामीण, अहिंसक तरीके से और जनतंत्र का इस्तेमाल करके न्याय पाने मे सक्षम रहे है। पर इन सफलताओं का सहरा सामाजिक भागीदारी को जाता है, केवल एक अकेले व्यक्ति और परिवार के लिए ये सब अपने बूते करना मुमकिन नही है।

क्या किसी को ये भ्रम है कि पीड़ीत व्यक्ति बलात्कार के लिए ख़ुद को दोषी मान सकता है?
क्या वाकई स्त्री अपनी कम समझ के चलते अपना शरीर पुरूष से छिपाती है, और शरीर पर परपुरुष के छू जाने मात्र से विचलित होती है, और इसी मे अपना शील गया समझती है? और अगर इस पर काबू पा ले तो बलात्कार की पीडा कम हो जायेगी। अगर ऐसा होता तो पश्चिमी देशो मे जहा काफी हद तक यौन शुचिता का भ्रम टूटा है, वहा बलात्कार की पीडीत स्त्रीयों और योन हिंसा को झेलने वाले बच्चों का दर्द कुछ कम होता। कम से कम इन देशो ने इतने गहरे जाकर, न सिर्फ़ बलात्कार, बल्कि सेक्सुअल हरासमेंट के क़ानून कई परतों मे बने है, जिनमे हाव-भाव, बॉडी लंग्वैज़, भाषिक हिंसा, तक तमाम आयामों को परिभाषित किया गया है।
योंशुचिता से छुटकारे के बावजूद मानसिक पीडा बहुत गहरे वहां भी है। और ये पीडा इसीलिये है की इंसान का अस्तित्व कुचला जाता है, एक असहायता के बोझ, और मनुष्य का सिर्फ़ एक वस्तु बन जाने का अहसास इससे गहरे जुडा है. दूसरा उदाहरण, पुरुषो के लिए समाज मे योन शुचिता के मानदंड स्त्री के जैसे नही है, पर फ़िर भी अगर "सोडोमी" का शिकार हुए बच्चे जो लिंग से पुरूष है, इसे सिर्फ़ शारिरीक दुर्घटना की तरह भूल जाते है? बलात्कार की रोशनी मे नही, बल्कि मनुष्यता की सम्पूर्णता की रौशनी मे इस तथ्य को खुलकर स्वीकार करने की ज़रूरत है की योनिकता और सेक्सुअल व्यवहार, और उससे जुड़े मानव अनुभव, हमारे मन, शरीर और समस्त व्यक्तित्व पर बहुत गहरा, और चौतरफा असर डालते हैऔर किसी भी तरह का अन्याय, जबरदस्ती, और निजता का उलंघन जो मनुष्य के बेहद निजी योनिक व्यवहार से जुड़े है, उनकी शिनाख्त इसी के तहत होनी चाहिएभले ही सामाजिक रूप से ये कितना ही, अवांछनीय विषय हो! और अगर ऐसी घटना से पीड़ीत को अपने काम मे हर्जा होता है, स्वास्थ्य मे समस्याए आती है, तो हर्जाना उस नुक्सान का ज़रूर मिलना चाहिए और ज्यादा से ज्यादा, और हरजाने के साथ साथ कडा कानूनी दंड मिलना चाहिए। या खुदा न खास्ता गर्भ और अनचाहे बच्चे पैदा हो जाए, तो उनके पालन की जिम्मेदारी भी पुरूष पर होनी चाहिए।

ये सिर्फ़ पुरुषो के दिमाग का फितूर है, कि स्त्री पुरूष स्पर्श से असहज हो जाती है, और ख़ुद को योनिकता के अर्थ मे अपवित्र मानती है। मैं फिलहाल किसी ऐसी स्त्री को नही जानती जिसका शरीर जाने अनजाने और मजबूरी मे हजारो पुरुषो के शरीर से टकराया हो। पर-पुरूष के रोज़-ब-रोज़ के स्पर्श की आज की स्त्री अभ्यस्त हो गयी है, और पहले भी हमारी दादी नानिया अभस्य्त रही है। कोई नई बात नही है। रोज़-रोज़ की बसों मे, हवाई जहाज़ की तंग सीटो मे भी, भीडभाड से भरे बाज़ारों मे, घरों मे सब जगह, नाते रिश्तेदारो और दोस्तों को गले लगाने मे भी। स्पर्श किसी एक तरह का नही होता, स्पर्श और स्पर्श मे फर्क है। आत्मीयता का, दोस्ती का स्पर्श, प्रेम का वांछनीय है, और भीड़ का तो आपकी इच्छा हो न हो , आपको भुगतना ही है, अगर आप "असुर्यस्पर्श्या" नही है तो। इन स्पर्शो की तुलना बलात्कार के या फ़िर योनिक हिंसा से उत्प्रेरित स्पर्शो से नही की जा सकती है। और अन्तर इन स्पर्शो मे सिर्फ़ इंटेंशन का है, शारीरिक एक्ट का नही!! शारीरिक से बहुत ज्यादा बलात्कार पहले एक अस्वस्थ, रोगी, और अपराधी मानस मे जन्म लेता है, और ऐसी परिस्थिति जब उसे कम से कम अवरोधों का सामना करना पड़े, शारिरीक रूप लेता है। इसीलिये, बलात्कार की घटनाओं से भी ज्यादा सर्वव्यापी वों अपराधी मानस है, जिसकी शिनाख्त बिना इस व्यवस्था और पारंपरिक सोच को समझे बिना नही की जा सकती है। और इसकी रोकथाम भी, सामाजिक सोच और स्त्री के प्रति समाज का नज़रिया बदलने के ज़रिये हो सकती है, और तत्कालीन उपाय क़ानून व्यवस्था को सक्षम बना कर और तमाम छोटे-बड़े हर तरह के बुनियादी स्पोर्ट सिस्टम को बना कर किए जा सकते है जो बलात्कार की राह मे लगातार रोड़ा खडा करते रहे।

बलात्कार से भी ज्यादा "योन शुचिता" और "बलात्कार का खौफ" हमारे समाज मे इतना व्याप्त है, की वों स्त्री और पुरूष दोनों से उनकी मनुष्यता छीन लेता हैऔर कुछ हद तक हम सब अप्रत्यक्ष रूप से उसका शिकार हो जाते हैस्त्री-पुरूष के सम्बन्ध विशुद्द रूप से यौनिक संबंधो के दायरे मे बंध जाते है, उनमे एक मनुष्य की तरह दोस्ती की, सहानुभूती की और कुछ हद तक एक स्वस्थ "कम्पीटीशन" की तमाम गुंजाईश ख़त्म हो जाती हैएक दूसरे से सीखने की संभावनाए ख़त्म हो जाती है, एक दूसरे के साथ खड़े होने की संभावनाए ख़त्म हो जाती है, और कही कही बहुत सी समस्याए जो सामूहिक भागीदारी से ही सुलझाई जा सकती है, उनका मार्ग अवरुद्ध हो जाता हैले देकर स्त्री और पुरूष अपना जीवन मनुष्य नाम के एक प्राणी का जीवन जीकर "अपने अपने लैंगिक कटघरों" मे बिताने को बाध्य है। स्त्रीयों का अच्छा स्वास्थ्य, और उनकी देह मे थोडा रफ-टफ पना, मार्शल आर्ट की ट्रेनिग आदि बलात्कार की समस्या का समाधान नही है, पर ये कुछ हद तक उनके भीतर एक मनुष्य होने का विश्वास पैदा कर सकता है, और अपनी परिस्थितियों के आंकलन को इम्प्रूव कर सकता है। और शायद कुछ हद तक, स्त्री पुरूष के बीच खड़ी लैंगिक कटघरों की दीवारों को ढहाने का काम कर सकती है।

Sep 7, 2009

आयोवा डायरी-०२

पहला भाग यहाँ पढ़े
मार्च १९९८  
आयोवा  की पहली सुबह, ठण्ड मे घुली हुयी और धुप-छाँव की आँख-मिचौली के साथ शुरू हुयी. लैब जाने के लिए एक मित्र ने राईड दी और दो चीजे जो रात के अंधेरे मे नही दिखी वों सुबह के उजाले मे हतप्रभ करनेवाली थी; एक तो १००% समतल लैंडस्केप, और दूसरा, चिनार के, ओक और  तकरीबन १५-२० अलग-अलग जातियों के पेड़, सब के सब अमूमन ३० फिट की ऊँचाई से ज्यादा नही. लगभग वीरानी से भरा शहर, चरों तरफ  सिर्फ़ कार ही कार, लोग नही.  लोगो को देखना तब तक न हुआ , जब तक अपनी बिल्डिंग के अन्दर नही घुस गए. पहला दिन कई तरह की कागज़बाजी मे बीता और इस बहाने लगभग पुरे कैम्पस मे चक्कर लगाना पढ़ गया. बहुत जल्द सभी पेडो का ३० फिट से ऊंचा न होना मेरी समझ मे आ गया. आयोवा मे खासकर ठण्ड मे 50-६० किमी प्रति घंटा की रफ़्तार से बर्फीली हवा चलती है, जो पेडो को इस ऊंचाई से ज्यादा बढ़ने नही देती, पेड़ टूट जाते है। दूसरा, हवा की इतनी तेज़ रफ़्तार तापमान को -२० डिग्री से -४० डिग्री तक आसानी से पहुंचा देती है. मुझे इसका कोई पूर्वानुमान नही था. सिर्फ़ इतना पता था की बर्फ पड़ती है आयोवा मे। और लगा था, की पहाडी लड़की को बर्फ से क्या डरना? और इस लिहाज़ से जिस तरह के जैकेट की दरकार थी, वों मैं लेकर नही गयी थी। थोडा बहुत ढूढा था, लखनऊ , दिल्ली मे, पर कोई ठीकठाक जैकेट मिली नही, और अंत मे लखनऊ से एक कोट लिया. कोट देखने मे तो ठीक था, पर मौसम को झेलने की कुव्वत उसमे नही थी. हड्डी तो दूर, मज्जा को भी मजा चखाने के लिए चाकू सी तेज़ ठंडी हवा काफी थी. अपनी सीमित जानकारी के चलते, डॉन किहोते टाईप के एडवेंचर की ये शुरुआत भर थी....

दूसरे दिन एक लोकल कांफ्रेंस हमारी ही बिल्डिंग मे शुरू हो रही थी. एक एक करके लोगो से बतियाना शुरू किया, काम के बारे मे पूछा और कुछ अंदाज़ लगा की कैसे लोग है? क्या करते है? और "सायंस के मक्का" मे सायंस का क्या हाल-चाल है. पर अभी तक तो सबसे बड़ी दिक्कत थी घर ढूँढने की, कैसे ढूंढा जाय? कुछ लोकल अखबार ढूंढें, फ़िर अगले एक हफ्ते तक कई लोगो को फ़ोन किया, पर दिक्कत ये की शहर का कुछ नक्शा पता हो तो समझ मे आए. लैब के कुछ सहकर्मी मदद देने को तैयार थे (जिसमे सिर्फ़ कार राईड, और ग्रोसरी शोपिंग शामिल थी), कोई भी सीधी जानकारी देने की पहल नही कर रहा था. जिसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी, यानी किराए का मकान कैसे और कहाँ मिलेगा ?  कुछ मेरा अंतर्मुखी स्वभाव भी आड़े आया, और जितना कम हो सकता था उतनी ही मदद लेने का मेरा विचार था.  अगले दिन लिफ्ट मे एक हिन्दुस्तानी साहब नज़र आये, सोचा की इनसे पूछा जाय, कि लोकल ट्रांसपोर्ट क्या है? पर वों बोले के "मैं यहाँ बहुत अरसे से हूँ".  मतलब कि "अपना रास्ता नापो! यू आर फ्रेश आउट ऑफ़ बोट"  . इसी बीच जिन प्रोफ़ेसर के घर पर मेरा टेम्पररी रुकना था, वही पर तीन दिन के लिए, संतूरवाले शिवकुमार शर्मा जी, उनके बेटे राहुल और तबलावादक सफत अहमद खान आकर रुके. उठते-बैठते इन तीनो लोगो से काफी बातें हुयी. संगीत, खासकर सेमी-क्लासिकल, और वोकल को सुनने की आदत थी, पर विशुद्ध रूप से "इंस्ट्रुमेंटल" से मेरा परिचय यही से शुरू हुआ. शिवजी से पूछा कि गाने की तो थीम होती है, आप खाली इंस्ट्रुमेंटल परफोर्मेंस की थीम कैसे लिखते है? उनका सुझाव था कि शाम को उनका कंसर्ट सुना जाय, और मैं ख़ुद समझने की कोशिश करू कि क्या कहा जा रहा है? फ़िर अगले दिन इसके बारे मे बात की गयी. इंस्ट्रुमेंटल को समझने की शुरुआत शायद उसी दिन से हुयी.

तकरीबन तीसरे-चौथे दिन कॉफी मशीन के पास एक दूसरे सज्जन फिरोज़ ने बतियाना शुरू किया, पता चला वों उजबेकिस्तान के है, करीब साल भर पहले आए है. उसके बाद करीब १५-२० मिनट बातचीत होती रही. फिरोज़ ये जानकर खुश हुआ की मुझे समरकंद के बारे मे और उलूगबेग के बारे मे पता था. अगले दिन कुछ तस्वीरे उसने मुझे दिखाई, यशब  के प्यालों की, मेहराबदार घरों और गुम्बदों पर फिरोजी ही रंग के पत्थरों की सजावट, एक पुराना ज़रदोज़ी का कोट, अपनी मंगेतर और घर के लोगों की तसवीरें. फ़िरोज़ से ही लोकल ट्रांसपोर्ट और घर किराए पर कैसे ढूंढा जाय ये पूछा. उनकी एक मित्र हाल-फिलहाल मे कैलीफ़ोर्निया चली गयी थी और उसका अपार्टमेन्ट किराए पर उठाना फिरोज़ साहेब की जिम्मेदारी थी. सो फिलहाल तीन महीने के लिए घर का इन्तेजाम हो गया था, जुलाई के महीने में मेरे पास भरपूर चोयास होती क्यूंकि एम्स शहर में मकानों की लीज़ जुलाई से जून के बीच ही मिलती है. मेरे प्रोफेसर ने अपने घर से मेरा समान अपार्टमेन्ट तक पहुंचाया, और कुछ समान खरीदवाने के लिए ग्रोसरी स्टोर लेकर गए. जितना भी हो सकता था, समान लिया, और यही पर मुझे बस का पास, और शहर का नक्शा जो निहायत ज़रूरी था, वों भी मिला.

ऐम्स एक बेहद छोटा शहर है, अप्रेल पहले-दूसरे हफ्ते के बाद मौसम कुछ खुल गया, और अक्सर पैदल चलने की वजह से शहर के बारे मे मेरा एक अनुमान बन गया. करीब एक हफ्ते के बाद लौंड्री रूम मे जो अपार्टमेन्ट मे साझा था, हैदराबाद से आए एक तेलगु परिवार से जान-पहचान हुयी, राव भी सीनीयर पोस्टडोक थे, और उनकी पत्नी और दो साल का बच्चा, ये लोग मेरे ही अपार्टमेन्ट मे रहते थे. उसी वक़्त इसरार करके वों लोग मुझे अपने घर ले गए, खाना खिलाया, और एक बेहद आत्मीयता के माहौल से मैंने कुछ घंटो के बाद विदा ली.

लंच के वक़्त अक्सर फिरोज़ से और कुछ दिन बाद उसके रूसी दोस्तों से बात होती थी और बातें दुनिया जहान की.  मजे की बात ये थी कि रूस के १६ टुकड़े अस्सी दशक के आख़िरी सालो मे हुए थे, उन सभी देशो के लोग एम्स मे एक ही ग्रुप मे रहते थे, सभी अपनी भाषा के अलावा रूसी बोलते थे, आपस में गहरे सूत्र मे बंधे लगते थे. मैं अक्सर सोचती थी, कि भारत और पाकिस्तान के बीच इतनी दुश्मनी क्यो है? कुछ महीनों के बाद कुछ पाकिस्तानी दोस्त बने तब मैंने जाना की हमारे बीच में भी खान-पान, भाषा और संस्कृति के वैसे ही सूत्र है, परन्तु हमारे देशों की राजनीती हामारी संस्कृति और साझेपन पर सवार हो जाती है.

रूसी साहित्य को पढ़कर जो कुछ समझ बनी थी, उसका फायदा ये हुया कि मैं लगभग सभी रूसी नामो को सही उच्चारण करती थी, और अक्सर तो कई शहर जिनके बारे मे सिर्फ़ पढा था, रूसी क्रांती के बारे मे भी सिर्फ़ पढा ही था, पर काफी देर तक बातें होती थी. उस ग्रुप के अधिकतर दोस्तों के परिवार भयंकर आर्थिक संकट के समय से गुजर रहे थे. फ़िर भी जितना हो सकता था, भाई-बहन, दोस्त, नाते रिश्तेदार एक दूसरे की भरपूर मदद करते थे. इसी बीच एक लड़की उक्रेन से आयी, और फ़िर उसकी मकान ढूँढने की फजीहत को देखते हुए, मैंने उसे अपने अपार्टमेन्ट मे रहने के लिए कह दिया.  उसे अंगरेजी बहुत कम आती थी और अक्सर बात करते समय उसके हाथ मे डिक्शनरी होती थी. उसके साथ बड़ी आत्मीयता बनी. लेरेसा जितनी बढिया इंसान थी, उतनी ही आला दर्जे की वैज्ञानिक भी, और वैसी ही मेहनत और रुची के साथ खाना भी बनाती थी. उसका बेहद महीन किस्म के काम को लैब मे देखकर  और उसका धैर्य देख कर मुझे बहुत राहत मिलती थी. लेरेसा के मार्फ़त उन दिनों और उससे पहले के रूस के बारे मे मुझे काफी कुछ समझने का मौका मिला, उस भूभाग के साहित्य और संगीत, खानपान, और लोगो के बारे मे पता चला.
..........जारी

Sep 2, 2009

एकनिष्ठा का सवाल, शरत और आज की स्त्री

एकनिष्ठा, अनन्यता पर स्त्री-पुरूष के सन्दर्भ मे राजकिशोर जी ने पिछले लेख मे शरतचंद्र के बहाने कुछ सवाल उठाये है, उन सवालों पर कुछ यथासंभव कच्चे-पके जबाब की तरह इस पोस्ट को देखा जाय।

"स्त्री-पुरुष संबंध का शायद ही कोई आयाम हो जिस पर इस विचार-प्रधान, पर अत्यंत पठनीय उपन्यास में कुछ न कुछ नहीं कहा गया हो। और, जो भी कहा गया है, वह इतना ठोस है कि आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है जितना 1931 में, जब यह पहली बार प्रकाशित हुआ था। हैरत होती है कि हिन्दी की स्त्रीवादी लेखिकाएँ शरत चंद्र को उद्धृत क्यों नहीं करतीं। क्या इसलिए कि वे स्त्री नहीं, पुरुष थे ?"
शरतचन्द्र की आज हमारे लिए प्रासंगिकता
ये आग्रह भारतीय समाज मे बहुत गहरे बैठा हुया है, कि शरत स्त्री मनोविज्ञान की कुंजी दे गए है और वही पर सारी उलझनों का आदि और अंत है, शायद इसीलिये राज किशोर जी भी कह गए "जैसे उत्तर भारत के समाज को समझने के लिए प्रेमचंद को बार-बार पढ़ने की जरूरत है, वैसे ही स्त्री-पुरुष संबंध के यथार्थ पर विचार करने के लिए शरत चंद्र को बार-बार पढ़ना चाहिए।"

शरत को पढा ज़रूर जाना चाहिए, पर आज के स्त्री-पुरूष सम्बन्ध बहुमुखी हो चुके है, शरत चन्द्र के समय का यथार्थ हमारा भूतकाल है, वर्तमान नहीं  है, और हमारे भविष्य की दिशा का निर्णायक भी नहीं  है। शरत की आज के समय कितनी प्रासंगिकता है, उसके लिए एक कसौटी ये हो सकती है कि  पिछले  १०० सालो में  औरत की स्थिति में  देश के भीतर और बाहर कितना बदलाव आ चुका है। अगर ये बदलाव अभूतपूर्व है, तो शरतचंद्र की १०० साल पुरानी कुंजी नहीं  चल सकती है।  हमारी-सामजिक /ऐतिहासिक यात्रा के एक पड़ाव की पड़ताल ही उससे हो सकती है, उनके समाज मे सिर्फ कुछ  संभ्रांत स्त्रियों को शिक्षा  के नए अवसर मिले थे, वो चारदीवारी के भीतर पति-पिता के सरक्षण मे अक्षरज्ञान सीख रही थी, और भद्र बंगाली पुरूष के लिए एक कोतुहल भरा आकर्षण था कि अरे स्त्री  सोच सकती है? उनकी समझ का कोई सामाजिक-आर्थिक मूल्य नहीं  था, इसीलिये वों कटघरे मे छटपटाती आत्मायें  है, जिन पर  पुरूष लेखक लगातार अपने फैसले देते हैं.  ये सीमित पर्यावरण ही है जो स्त्रीयों की समूची सोच और शरत बाबू के पूरे उपन्यास का आधार सिर्फ़ स्त्री पुरूष के संबंधो पर ही "एक अंधेरे बंद कमरे" मे घूमता है।

स्त्री के सारे प्रश्नों और समूची प्रतिभा और जीवन का निचोड़ सिर्फ़ अगर प्रेम संबंधो के विश्लेषण ही रह जाय तो ये सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि इस परिवेश मे स्त्री का अपना स्वायत्त अस्तित्व नहीं, जो भी है सिर्फ़ पुरूष के इर्द-गिर्द है।

पिछले १०० साल मे आज़ादी मिल चुकी है, और स्त्री घर की चारदीवारी से बाहर  निकल कर सामाजिक और राजनैतिक जीवन में  ख़ुद को स्थापित कर चुकी है. स्त्री पुरूष मे बीच व्यक्तिगत प्रेम संबंधो से आगे बहुत से नए सम्बन्ध भी जुड़ गए हैं, मित्रवत, सहकर्मियों, प्रतिद्वंदियों, भीड़ से रोज-ब-रोज का exposure,, जो शरत के समाज मे नहीं थे । हमारे समाज मे आज स्त्री के लिए अपार सम्भावनाये हैं,  शरत की नायिका की तुलना में आज स्त्री के प्रश्न अनेक हैं, संघर्ष बहुमुखी हैं, प्रेम सम्बन्ध स्त्री जीवन का केन्द्र बिन्दु न होकर सिर्फ एक निजी डोमेन है. इसीलिए शरत की आज हमारे लिए प्रासंगिकता नहीं बची।  उनकी रचनात्मकता और उस समयकाल मे स्त्री को समझने के उनके ज़ज्बे को भी सलाम है, पर उनके आगे पूरी-तरह नतमस्तक हो कर ये स्वीकारना की स्त्री के सारे महत्वपूर्ण सवाल यही खत्म हो गए हैं,  सम्भव नहीं है। इसे २१वी सदी मे होने के व्यक्तिगत घमंड, या फ़िर शरत को कूड़े में फेंक देने की बात नहीं है, क्यूंकि वो पुरुष थे,  उनकी जगह कोई स्त्री लेखिका होती तो उसका भी यही हश्र होता, पुरूष लेखन से स्त्रियों का कोई बैर नही है।

"शरत आज होते तो क्या लिखते?"सवाल ये होना चाहिए कि स्त्री के आज के सवाल क्या है?

कोई भी समकालीन लेखक-लेखिका आज स्त्री के सामाजिक संघर्षो के बारे मे, नयी चुनौती के बारे मे लिखेंगे, पुरूष सत्ता को चुनौती उनकी सिर्फ़, पौराणिक कथाओं के बूते नही बल्कि जनवादी आधार पर, सामाजिक न्याय की जमीन पर खडे होकर दी जायेगी. बाकी की दीन-दुनिया से संवाद और इसी की रोशनी मे स्त्री-पुरूष के रिश्ते का भी संवाद आज का सच है । आज शरत होते तो बहुत सम्भव है की, एकनिष्ठा के संवाद की जगह "रसोई संवाद होता" , परिवार को जनतांत्रिक बनाने का संवाद होता।

-दूसरा प्रश्न एकनिष्ठा को वों भी विधुर/विधवा के लिए एक नैतिक मूल्य की तरह मानने और मानने का या आग्रह का है
मेरी नज़र मे शादी-शुदा लोगो के लिए एक निष्ठा इस रिश्ते(सिविल contract) की इमानदारी है। पर आपकी परिभाषा ये है ....

"एकनिष्ठता कुछ अलग ही चीज है। इसका सहोदर शब्द है, अनन्यता। कोई स्त्री या पुरुष जब अपने प्रेम पात्र के साथ इतनी शिद्दत से बँध जाए कि न केवल उसके जीवन काल में, बल्कि उसके गुजर जाने के बाद भी कोई अन्य पुरुष या स्त्री उसे आकर्षित न कर सके, तो इस भाव स्थिति को अनन्यता कहा जाएगा। यही एकनिष्ठता है। आज भी इसे एक महान गुण माना जाता है और ऐसे व्यक्तियों की पूजा होती है।"

ये एकनिष्ठा का मूल्य सदियों से भारतीय स्त्री के ऊपर "नैतिकता " का पाठ पढा कर थोपा गया है, जिसकी क्रूरतम अभिव्यक्ति "सती-प्रथा" और "सती-पूजन" मे जाकर होती है। स्त्री को एक पुरूष की "सर्वाधिकार" सम्पति जीवन-पर्यंत और मृत्यु के बाद भी हमारी सामाजिक और कानूनी व्यवस्था ने बना कर रखा हैपुरूष के लिए सिर्फ़ शरत बाबू ने अपने उटोपियां ग्रस्त उपन्न्यासो चरित्रहीन के "उपेन्द्र बाबू" और शेष प्रश्न के "आशु बाबु" के लिए सृजित किया है, और इसका महिमा मंडन भी एक तरह से। उसी रोमांटिसिज्म की छाया आपके इस लेख पर भी है। जब किसी व्यहवार के साथ मूल्य और नैतिकता का आग्रह जैसे शब्द जुड़ते है, तो चाहे -अनचाहे , वृहतर समाज के लिए इसे एक मानक की तरह स्वीकृति की इच्छा छिपी रहती है।

राज किशोर जी २१वी सदी मे भी इस एकनिस्ठा पर सवाल उठाने से हैरत मे है!!! और लिखते है॥
"हैरत की बात यह है कि शेष प्रश्न की नायिका कमल, जो लेखक की बौद्धिक प्रतिनिधि है, एकनिष्ठता के मूल्य को चुनौती देती है।"

किसी भी संवेदनशील इंसान के लिए, इसमे हैरत मे पड़ने की कोई वजह नही है, और इसीलिये एकनिष्ठता को प्रिय मूल्य की तरह सहेजने की भी ज़रूरत नही है. इसे एक व्यक्तिगत फैसला मानना ज़रूरी है, और ऐसे लोगो की पूजा की कोई आवश्यकता नही है। कमल या किसी और की तरह इन्हे बुड्डा या मृत मानना जरूरी नही है। विधुर, तलाकशुदा के लिए ये एक नैतिक मूल्य से ज्यादा "चोयस" का मामला ज़रूर है, क्योंकि नए रिश्ते बनाने मे बहुत ऊर्जा लगती है, समय लगता है, और इतना आसान शायद हर व्यक्ति के लिए नही होता। हो सकता है कुछ लोग अपनी इस ऊर्जा का कही और इस्तेमाल करना चाहते हो। इसीलिये कम से कम आज के दौर मे इस पर एक रोमांटिसिज्म का वैसा आवरण नही है, जैसे शरत ने अपने समय मे किया है, कि ये एक नैतिक मूल्य है।

पुनश्च: वों कौन से कारण है की ब्लॉग जगत के पुरूष लेखक इस बात का रोना रोते है, की स्त्रीया ये नही लिखती? इसका प्रतिरोध नही करती? अमुक का समर्थन नही करती? फला लेखक को कोट नही करती? क्या स्त्री को मानसिक रूप से वयस्क मानने की रिवायत नही है यह्ना? हर वक़्त कोई "अभिवाहक " चाहिए ? जो निर्देश देता रहे, की ये किया? वों हुया? और ये क्यों न हुआ का समाधान और उत्तर भी ख़ुद ही देता फिरे? स्त्रियों के उत्तर की प्रतीक्षा भी न करे?

Sep 1, 2009

शरत चन्द्र की नायिकाये कटघरे मे छटपटाती आत्माए है,

एकनिष्ठा, अनन्यता पर स्त्री-पुरूष के सन्दर्भ मे राजकिशोर जी ने पिछले लेख मे शरतचंद्र के बहाने कुछ सवाल उठाये है, उन सवालों पर कुछ यथासंभव सीधे जबाब की तरह इस पोस्ट को देखा जाय।

"स्त्री-पुरुष संबंध का शायद ही कोई आयाम हो जिस पर इस विचार-प्रधान, पर अत्यंत पठनीय उपन्यास में कुछ न कुछ नहीं कहा गया हो। और, जो भी कहा गया है, वह इतना ठोस है कि आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है जितना 1931 में, जब यह पहली बार प्रकाशित हुआ था। हैरत होती है कि हिन्दी की स्त्रीवादी लेखिकाएँ शरत चंद्र को उद्धृत क्यों नहीं करतीं। क्या इसलिए कि वे स्त्री नहीं, पुरुष थे ?"


मेरा मानना है की अब तक १०० साल बीत चुके है, आज़ादी मिल चुकी है, और स्त्री पुरूष मे बीच व्यक्तिगत प्रेम संबंधो से आगे बहुत से नए सम्बन्ध भी जुड़ गए है, जो शरत के समाज मे नही थे उनके समाज मे स्त्री को वों भी संभ्रांत स्त्री को शिक्षा और बौद्धिक विलास मात्र के ही अवसर थे। और उनका पूरा वजूद, शिक्षा-दीक्षा, सब पिता-पति के बूते था। और ये सिर्फ़ एक चारदीवारी के भीतर था, और भद्र बंगाली पुरूष के लिए एक कोतुहल भरा आकर्षण कि अरे स्त्री भी ऐसा सोच सकती है? उनकी समझ का कोई सामाजिक/आर्थिक मूल्य नही था। इसीलिये वों कटघरे मे छटपटाती आत्माए है, जिन पर लेखक और पुरूष लगातार अपने फैसले देते है। स्त्री का ये सीमित पर्यावरण ही है जो स्त्रीयों की समूची सोच और शरत बाबू के पूरे उपन्यास का आधार सिर्फ़ स्त्री पुरूष के संबंधो पर ही "एक अंधेरे बंद कमरे" मे घूमता है। रवि साहित्य की नायिका का अपने समय के वृहतर समाज से जो संवाद है, शरत की नायिका का नही है. स्त्री के सारे प्रश्नों और समूची प्रतिभा और जीवन का निचोड़ सिर्फ़ अगर प्रेम संबंधो के विश्लेषण ही रह जाय तो ये सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि इस परिवेश मे स्त्री का अपना स्वायत्त अस्तित्व नही, जो भी है, वों सिर्फ़ पुरूष के इर्द-गिर्द है।

हमारे समाज मे आज स्त्री के लिए अपार सम्भावनाये है। और शरत की नायिका के बजाय आज स्त्री के प्रश्न अनेक है। प्रेम सम्बन्ध स्त्री जीवन का केन्द्र बिन्दु न होकर एक निजी डोमेन है. शरत आज होते तो क्या लिखते? सवाल ये होना चाहिए कि स्त्री के आज के सवाल क्या है? शरत या कोई भी समकालीन लेखक-लेखिका आज स्त्री के सामाजिक संघर्षो के बारे मे, नयी चुनौती के बारे मे लिखेंगे, पुरूष सत्ता को चुनौती उनकी सिर्फ़, पौराणिक कथाओं के बूते नही बल्कि जनवादी आधार पर, सामाजिक न्याय की जमीन पर खडे होकर दी जायेगी. बाकी की दीन-दुनिया से संवाद और इसी की रोशनी मे स्त्री-पुरूष के रिश्ते का भी संवाद आज का सच है आज शरत होते तो बहुत सम्भव है की, एकनिष्ठा के संवाद की जगह "रसोई संवाद होता" , परिवार को जनतांत्रिक बनाने का संवाद होता।

-आपका दूसरा प्रश्न एकनिष्ठा को वों भी विधुर/विधवा के लिए एक नैतिक मूल्य की तरह मानने और मानने का या आग्रह का है
"एकनिष्ठता कुछ अलग ही चीज है। इसका सहोदर शब्द है, अनन्यता। कोई स्त्री या पुरुष जब अपने प्रेम पात्र के साथ इतनी शिद्दत से बँध जाए कि न केवल उसके जीवन काल में, बल्कि उसके गुजर जाने के बाद भी कोई अन्य पुरुष या स्त्री उसे आकर्षित न कर सके, तो इस भाव स्थिति को अनन्यता कहा जाएगा। यही एकनिष्ठता है। आज भी इसे एक महान गुण माना जाता है और ऐसे व्यक्तियों की पूजा होती है।"

ये एकनिष्ठा का मूल्य सदियों से भारतीय स्त्री के ऊपर "नैतिकता " का पाठ पढा कर थोपा गया है, जिसकी क्रूरतम अभिव्यक्ति "सती-प्रथा" मे जाकर होती है स्त्री को एक पुरूष की "सर्वाधिकार" सम्पति जीवन-पर्यंत और मृत्यु के बाद भी हमारी सामाजिक और कानूनी व्यवस्था ने बना कर रखा हैपुरूष के लिए सिर्फ़ शरत बाबू ने अपने उटोपियां ग्रस्त उपन्न्यासो चरित्रहीन के "उपेन्द्र बाबू" और शेष प्रश्न के "आशु बाबु" के लिए सृजित किया है, और इसका महिमा मंडन भी एक तरह से उसी रोमांटिसिज्म की छाया आपके इस लेख पर भी है जब किसी व्यहवार के साथ मूल्य और नैतिकता का आग्रह जैसे शब्द जुड़ते है, तो चाहे -अनचाहे , वृहतर समाज के लिए इसे एक मानक की तरह स्वीकृति की इच्छा छिपी रहती है इसीलिये, इसे एक प्रिय मूल्य की बजाय व्यक्तिगत फैसला मानना ज़रूरी है, और ऐसे लोगो की पूजा की कोई आवश्यकता नही है नही कमल या किसी और की तरह इन्हे बुड्डा या मृत मानना जरूरी है संबंधो को बनने के लिए, वों भी प्रेम सम्बन्ध, उसके लिए आपको अपना निजी स्पेस शेयर करना होता है, बहुत ज्यादा समय और ऊर्जा लगानी पड़ती है अगर किसी विधुर या विधवा की दूसरी pratibaddhtaaye है, तो वों हो सकता है उस ऊर्जा का कही और इस्तेमाल करना चाहे? उसके लिए समाज से पूजा और प्रतिष्ठा का मोह क्यो?
इसीलिये, शरत आज हमारे लिए प्रसंगिक सिर्फ़ एक समय काल मे स्त्री के सवालों को समझने का मध्यम है वर्तमान और भविष्य का आयाम नही उनकी जगह कोई स्त्री लेखिका होती तो उसका भी यही हश्र होता पुरूष लेखन से स्त्रियों का कोई बैर नही है