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Mar 25, 2009

हज़ार इच्छाए लिए सूरज फ़िर उगता है..........

दिन है कि ख़त्म नही होता,
एक चक्की की धूरी  में बीतती है उम्र
रोशनी के बिना दिन
और नींद से बोझिल राते
दो नन्ही कोपलों की हरियाली से
मन फ़िर भी हरा है........

स्वप्न अब भी आते है,
और स्वप्न में, मैं माँ नही
बल्कि अक्सर बच्ची हो जाती हूँ
स्नेह की स्मृति से सराबोर
हज़ार इच्छाए लिए सूरज  फ़िर उगता है..........

11 comments:

  1. very nice and expressive, nostalgic

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  2. कैसे-कैसे मन. मन के कैसे-कैसे तन, धन.
    स्‍नेहसड़क पर पीछे दूर कहीं एक हमारी साइकिल की संगत भी समझियेगा.

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  3. हज़ार इच्छाए लिए सुरज फ़िर उगता है..........
    यही तो जिंदगी है।

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  4. हर माँ के साथ यही होता होगा ..सुन्दर अभिव्यक्ति

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  5. स्वप्न अब भी आते है,
    और स्वप्न मे, मैं माँ नही
    बल्कि अक्सर बच्ची हो जाती हूँ
    स्नेह की स्मृति से सरोबार
    हज़ार इच्छाए लिए सुरज फ़िर उगता है..........
    aashawadi sunder bhav

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  6. प्राकृतिक रचना को शब्दों के माध्यम से सुन्दरता के साथ सजाया है ।

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  7. हज़ार इच्छाए लिए सुरज फ़िर उगता है..........!
    सुखद अनुभूति /आशा की कविता !

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  8. सच कहा आपने... हर रोज़ उगते नए सूरज के साथ नई नई हज़ारों इच्छाएँ भी उगने लगती है... यही अनगिनत इच्छाएँ सपनीली दुनिया मे ले जाती है जो मन को असीम सुख से भर देती है.

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  9. हजार फूलों की तरह खिलने दीजिए हजार सूरजों को । भले ही इच्छाएं अक्सर मूर्खतापूर्ण हों , तब भी ।

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