समलैंगिगकता याने गे-लेस्बियन संबंधो की शब्दावली मेरे जीवन मे पहले-पहल राही मासूम रज़ा की किताब "कटरा बी आरजू " , और श्री-लाल शुक्ल की "राग दरबारी " को पढने के बाद आयी थी, तकरीबन बीस बरस पहले। "कटरा बी आरजू" को पढ़कर भय और "राग-दरबारी" के "मास्साब " को लेकर दैन्य भाव एक किशोर मन मे जागा था। बाद के सालो मे "लियानार्दो दी विंची" और फ़िल्म रोल के आविष्कारक "जॉर्ज ईस्ट्मेन" और कई दूसरे ख्यातीलब्ध लोगो के गे होने का पता चला। और रोचेस्टर सिटी मे ईस्ट्मेन का घर बनाम संग्रहालय भी देखने का मौका आया. "विंची" और ईस्ट्मेन दोनों के बारे मे कुछ प्रचलित विश्वास भी है की दोनों परफेक्टनिस्ट थे, और कुछ दर्जे तक आत्म-मोहित भी, और इसीलिये औरतों के बजाय मर्द उन्हें ज्यादा आकर्षित करते थे।
बाद के बरसो मे कई लोगो को देखकर अक्सर उनके "गे-पने" को लेकर शक होता था, पर मर्यादा के चलते कभी पूछा नही। गे-लेस्बियन संबंधो और हाशिये पर फेक दी गयी सेक्सुअल अस्मिता और ३७७ का ज़िक्र "मंटो और चुगताई " की कहानियों मे पढा " पर किसी को इसका शिकार होते हुए देखने की कोई स्मृति नही है।
मेरा परिचय और दोस्ती "गे-लेस्बियन " लोगो से कोर्नेल कैम्पस मे हुयी और इन संबंधो पर खुली बहसे भी हुयी। इत्तफाकन इस दोस्ती की शुरुआत एक हिन्दुस्तानी लड़की से हुयी, जिससे हिन्दुस्तान, नारी विमर्श और राजनीती पर बात शुरू हुयी, और यकीनन उसकी तीक्ष्ण बुद्धी और सामाजिक संवेदनशीलता दोनों ने मुझे प्रभावित किया। एक भरोसे की दोस्ती के बाद उन्होंने मुझे अपने लेस्बियन होने के बारे मे बताया और एक खुले और सम्मान भरे महाल मे हमने इस पर कई बहसे की। इन बहसों मे कई चीजे मुझे पता चली। एक ये की जैसे ब्राहमण को दलित का दर्द नही दिखता, अपमान नही दिखता वैसे ही द्वीलिंगी लोगो के लिए "गे" अदृशय है। और एक गे ही दूसरे गे" को पहचान सकता है। गे-लेस्बियन कम्युनिटी मे इसे रेडार की तर्ज़ पर "गेडार" कहा जाता है। बाद के दौर मे जब कभी सड़क पर चलते हम दोनों साथ होते तो मैं लोगो को देखकर अंदाजा लगाने की कोशिश करती की कौन गे है.... और मेरी मित्र मेरे गेडार को रेटिंग देती। इस बात से ये अनुभव मुझे वाकई सिखा गया की एक ऐसे समाज मे जह्ना आप बहुसंख्यक है, या फ़िर स्वीकृत व्यवस्था का हिस्सा है, आपकी अपनी ज्ञानेंद्रिया और समझ पर भी अल्पसंख्यक अस्मिताओं को देखने के लिए परदे पड़ जाते है।
हिन्दुस्ताने गे जो मेरे मित्र बने और उनकी वजह से कई दूसरे गे लोगो से जो बातचीत हुयी. उसने मेरे सामने दो सवाल खड़े किए की क्या ये सिर्फ़ पश्चिम का अनुकरण है, और क्या मौजूदा समलैंगिक दावेदारी का कोई भारतीय कंटेक्स्ट है? तमाम लोगो की तरह मैं भी मानती थी की इसका इलाज़ सम्भव है। तीसरी दुविधा मेरे भीतर नही थी कि जानवर इसका अपवाद है, क्योंकि थोड़ी बहुत जानकारी रिसर्च की थी। आज पलटकर सोचती हूँ तो मेरा मन अपने उन मित्रो के लिए थोड़ी और इज्ज़त से भर जाता है की उन्होंने मेरे अटपटे और कुछ हद तक एक खाके मे फिट सवालों का बड़े धैर्य से ज़बाब दिया.
बहुत ज़द्दोजहद के बाद एक समझ बनी है कि एक मायने मे गे एक अदृश्य जमात है, जिसे बाकी लोग देखना नही चाहते, सुनना नही चाहते और उनका वजूद परिहास , घृणा, और शर्मिन्दगी का प्रतीक बन जाता है. LGBT ग्रुप एक साथ दो अंतर्विरोधों का सामना करता है, लगातार। एक उस इच्छा का कि उनके वजूद को सम्मान जनक जगह मिले, वों अदृशय जमात स्वीकृत हो । गे-परेड के आयोजन को इसी सन्दर्भ मे देखना होगा.
दूसरी तरफ़ परिवार और समाज और कानून की तरफ़ से द्वीलिंगी खांचे मे फिट होने का दबाव, लगातार उनके अदृशय होने की शर्ते बुनता है। कुछ हद तक इन सभी ने मिलकर hidden symbolism को बढावा दिया। इनमे से कुछ जानकारियाँ, दाहिने कान मे बाली, सतरंगी छाता, और हर शहर, कसबे मे कुछ जगहे, जहाँ लोग मिलते है। एक उदाहरण दिल्ली का कंबन पार्क है, पालिका मे। जाने कितनी बार वहाँ जाना हुया होगा मेरा पर मेरे लिए इस अदृशय जमात को देखना सम्भव नही था। इस लिहाज़ से बहुत से गे-मित्रो ने अपने-अपने symbols हर धर्म मे खोजे हुए है, अगर यह्ना लिखा जाय तो शायद बहुत लोग अपने विश्वासों को लेकर आहत हो। सो ये सवाल कुछ हद तक पाठको पर उनके लिए जो पूर्वाग्रही नही है , यही छोड़ दिया जाय। अगर कमजोर लोगो का और सताए हुए लोगो का संबल है आस्था है, तो गे-लोगो को भी यंहा संबल ढूढने का, अपने रोल मॉडल ढूँढने का हक है।
दूसरा, सवाल जिसे पहलू वाले चंद्रभूषण जी ने उठाया है वों गे आन्दोलन के आक्रामक रेडिकलिज्म के बोध के साथ जुड़ा हुआ है, और आमतौर पर समलैंगिक होना, ऊंचे तबकों के कई दूसरे शौकों- मसलन ड्रग्स, रैश ड्राइविंग और रेव पार्टीज के समकक्ष दिखना है। मेरा मानना है कि जिस तरह का दमन और दबाव इन लोगो पर है, बिना संगठित हुए और बिना आक्रमक हुए उनका काम नही चलेगा। इस आन्दोलन की ज़रूरत और दूनिया मे जनतंत्र का आज का ढांचा दोनों इसके लिए मुफीद माहौल बनाते है। तमाम दबे-कुचलों के आन्दोलन चाहे वों दलित आन्दोलन हो, नारी आन्दोलन हो, या नक्सल आन्दोलन और दूनिया भर मे फैले अराजक, आक्रमक आन्दोलन उनकी अपनी जमीन है, और अपने भटकाव भी है। गे-आन्दोलन भी इन्ही सब का शिकार होगा, आखिरकार ये विसंगति तो मानव सभ्यता की है, गे इससे कैसे बचेंगे?
कुछ पोजीटिव चीजे जो गे-परेड को लेकर एक बंद समाज मे उभरेंगी, वों है कि माता-पिता "मेल बच्चों" के योन शोषण की संभावनों के लिए शिक्षित हो जायेंगे। और शायद कुछ बच्चे इसका शिकार होने से बच जाय। कुछ स्त्रिया भी बच जाय, गे पुरुषो के साथ शादी के बंधन मे बंधने से। और शायद कुछ पुरूष भी बच जाय, जबरदस्ती और अनजाने मे हुयी शादियों से। दूसरी बात गे-विजीबिलिटी शायद कुछ हद तक दो जेंडर के दो ध्रुवो पर टिके विभाजन को ख़त्म कर दे, जैसे कौन कैसे कपडे पहने? कैसी चाल ढाल रखे, पुरूष रोये नही और स्त्रीयों के लिए रोना ही एक तरीका बचे अपनी मर्जी चलाने का. शायद मनुष्य पर थोपे गए रोज़ ब-रोज़ के ये ज़बरदस्ती के मूल्य टूट जाय, थोड़ी सी साँस लेने की जगह सबको मिले।
और तीसरी बात, की शायद वों जगह हमारे समाज मे थोड़ी सी और बढ़ जाय जह्ना दो विपरीत लिंगी सहज दोस्त बन सके, सामाजिक दबाव न झेले, और अपनी लैंगिक पहचान से ऊँचे उठकर एक इंसान की तरह एक दूसरे के साथ बर्ताव कर सके। हर महिला और पुरूष को विपरीत लिंगी दोस्तों को भाई-दीदी/कजिन मे तब्दील न करना पड़े। कुछ गे-पुरूष मित्रो की मजाक मे कही बात की "यू आर सेफर विद मी" कुछ हद तक सही भी है, की ये दोस्ती की उन संभावनाओं को जन्म देती है, जह्ना इस बात का डर नही रहता की कब कौन विपरीत लिंगी मित्र unintended/ undesired lover ya rapist की तरह अचानक से अवतरित हो जाय। इस बात का कतई ये मतलब नही है की "heterosexual " मर्द और औरते अपनी लैंगिक पहचान से ऊपर नही उठ सकते या विपरीत लिंगी दोस्तिया उनके लिए नही है। कुछ उठ जाते है, कुछ हमेशा वही डूबे रहते है।
गे लोगो पर लिखना और उनके बारे मे मेरे लिखने का मकसद भी सिर्फ़ इतना है कि कुछ पूर्वाग्रहों की बुनियाद हिल सके, और उन्हें हम एक मनुष्य की गरिमा के साथ स्वीकारे। एक documentary "khush" हिन्दुस्तानी सन्दर्भ को समझने के लिए अच्छी है, और कुछ किताबे भी जिनमे हिन्दुस्तानी समलेंगिको ने अपने अनुभव समेटे है। मेरे लिए ख़ुद जियो, औरो को उनके हिसाब से जीनो दो ही एक बेहतर अपप्रो़च है, और इस दूनिया मे इतनी विषमताये है, कुछ प्रकृति की और कुछ मानव की बनायी हुयी। फ़िर भी हम जाती की, लिंग की, भूगोल की, सीमाओं को तोड़ते हुए एक दूसरे की तरफ़ हाथ बढाते है। प्रेम होता है, दोस्ती होती है, मिलजुल कर काम करते है। इन्ही बहुत सी विषमताओं मे से एक गे या लेस्बियन होना भी है
Jul 8, 2009
गे मित्र और गेडार: एक अदृशय जमात के हक मे
Posted by
स्वप्नदर्शी
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1:02 AM
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9 comments:
स्वप्नदर्शी जी ,
आपने बहुत महत्वपूर्ण चीजें उठाई हैं. ऐसा नहीं है की भारत में समलैंगिक लोग हैं ही नहीं. ऐसा तो बहस में सभी ने माना है कि भारत में भी बहुत पहले से समलैंगिकता का अस्तित्व रहा है. बहस इस बारे में है कि समलैंगिक आन्दोलन का मौजूदा स्वरुप जो लोगों भारत में दीखता है वह उन्हें पश्चिम से आयतित लगता है. दूसरा उसकी सांस्कृतिक प्रवृत्तियों पर उन्हें आपत्ति है.
सबसे पहले समलैंगिक लोग भारत में सदियों से मौजूद रहे हैं. लकिन समलैंगिक अधिकारों के प्रति यह चेतना निश्चित रूप से पश्चिम से आई है. इसलिए इसमें पश्चिम के तौर तरीकों का शुरुआत में होना स्वाभाविक है. लेकिन क्योंकि भारत में समलैंगिक लोग हैं. और अपने समलैंगिक वजूद के साथ जीना चाहते हैं. समाज में अपनी अस्मिता को व्यक्त न कर पाने से पैदा हुई घुटन से बाहर निकलना चाहते हैं. यह यहाँ समलैंगिक आन्दोलन के लिए आधार बनाता है. समलैंगिक आन्दोलन के उच्चवर्गीय होने के सम्बन्ध में यह ध्यान देना चाहिए के अधिकतर जनतांत्रिक आन्दोलन जो अस्मिता पर आधारित हों पहले उच्च वर्ग में ही आते हैं. क्योंकि इसी वर्ग के पास इतनी स्वंत्रता होती है. कि वह समस्याओं को सूत्रबद्ध कर सके और दुनिया में अन्य जगहों से प्रेना ले सके. जैसे भारत में नारीवादी संघर्ष भी पहले उच्च माध्यम वर्गीय महिलाओं में आया. लेकिन क्योंकि निम्न वर्ग में भी बहुत से समलैंगिक लोग मौजूदा हैं (मैं इसे व्यक्तिगत तौर पर जानता हूँ और अंग्रेजी तहलका के पिछले अंक को देखा जा सकता है) इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि यह आन्दोलन उच्च वर्ग तक ही सीमित रह जायेगा. उच्च वर्ग के लोगों का होने के कारन सौन्दर्यबोध के मामले में यह आन्दोलन उच्चवर्गीय प्रतीकों का इस्तेमाल कर रहा है. जैसे देल्ली में गे परेड आदि. प्रसंगवश उस दिन मैं देल्ली में मौजूद था इसलिए मैं भी वहां चला गया. अपने समूचे उच्चवर्गीय सौन्दर्यबोध के बावजूद में वहां बिलकुल साधारण वर्ग के लोगों से मिला. जैसे टेलर का काम करने वाले एक लड़के से चाय का ठेला चलने वाली एक महिला से.यह इस आन्दोलन का नेतृत्व करने वाले लोगों पर भी निर्भर करता है कि वह कितना आम समलैंगिकों तक पहुँचते हैं.
दूसरी बात, समलैंगिकता के प्रश्न को समलैंगिक लोगों के एक्टिविज्म कि राजनीती से और समलैंगिकता के प्रत्यक्ष अनुभव जो हमें दीखते हैं से अलग हटकर देखना जरुरी है. समलैंगिकता एक जटिल परिघटना है क्योंकि मानव यौन व्यवहार एक जटिल चीज है.बहुत से लोग समलैंगिकता को कई तरह से reduce करते हैं जैसे कई लोग यह समझते हैं कि समलैंगिक होना एक सचेत विचारधारात्मक चुनाव है जैसे कि मार्क्सवादी होना. और इस तरह उन्हें लगता है कि विचारधारात्मक फैशन के तहत धीरे धीरे सब लोग समलैंगिक हो जायेंगे जैसे एक दौर में सब लोग समाजवादी हो गए थे. सामान्यतया समलैंगिक होना एक सचेत विचारधारात्मक चुनाव नहीं है. मानव यौन व्यवहार को इस तरह से reduce नहीं किया जा सकता. एक दौर में लेस्बियन संबंधों के मामले में ऐसा रहा है कि यह विचारधारात्मक चुनाव था. ६० और ७० के दशक में रेडिकल फेमिनिस्तों ने इसे पितृसत्ता (दमन पर आधारित यौन संबंधों से) से मुक्ति के रूप में देखा था. रेडिकल फेमिनिस्म से सहमत होना या न होना एक अलग बात है (एक मार्क्सवादी के तौर पर मैं इससे असहमत हूँ ). लेकिन सारे लेस्बियन सम्बन्ध कोई सचेत विचारधारात्मक चुनाव नहीं होते. इसी तरह जेल में विकल्पों के अभाव में कई बार समलैंगिक सम्बन्ध बन जाते है. या धार्मिक मठों में समलैंगिक सम्बन्ध बन जाते हैं. कई लोग इन चीजों को देखकर समलैंगिकता को विकृत्ति समझने कि भूल करते हैं. दरअसल समलैंगिकता को इन चीजों तक सीमित किया ही नहीं जा सकता. अध्ययन बताते हैं के समलैंगिकता कहीं अधिक व्यापक और जटिल चीज है. समलैंगिकों के बारे में इस तरह के कुछ केस लेकर मान्यता नहीं बनाई जा सकती पश्चिम में हुए अध्ययन इसकी पुष्टि करते हैं. जैसे अफ्रीका और भारत के निकोबार में हुए न्रितात्व्शाश्त्रीय(anthropological) अध्ययन यह साफ़ तौर पर पुष्ट करते हैं कि प्रगेतिहासिक समय में समलैंगिता का अस्तित्व रहा है. और आज के इन आदिवासी समाजों में इसको लेकर पर्याप्त सहिष्णुता मौजूद हैं. और ऐसे रिवाज़ मौजूद है जो इन संबंधों को institutionalise करते हैं.
इसी तरह समलैंगिक लोगों का drugs लेना भी एक प्रत्यक्षवादी भ्रान्ति है. सही है कि कुछ समलैंगिक drugs लेते हैं पर drugs तो कई अन्य लोग भी लेते हैं. इसका सामान्यीकरण करना एकदम गलत है. इसी तरह अन्य चीजों के साथ उन्हें जोड़ा जाता है. हम एक पूंजीवादी उपभोक्तावादी समाज में रह रहें हैं उपभोक्तावादी संस्कृति सभी को प्रभावित करती है. तो यह कैंसे हो सकता है कि वह समलैंगिकों को प्रभावित नहीं करेगी. समलैंगिकों में भी कई लोग उपभोक्तावादी विकृत्तियों से भरे होते है. लेकिन सभी समलैंगिक ऐसे होते है यह कहना पूर्वाग्रह के सिवा और कुछ नहीं है. समलैंगिकों में भी एक वर्ग कि समस्या यह है कि जिन चीजों को अन्य लोग बड़ी आसानी से आनंद उठा लेते हैं उसे वह नहीं कर पाते. जैसे कामुक पार्टियों डिस्को व नाईट क्लबों में जाना और वन नाईट स्टे जैसे जिम्मेदारीविहीन असंवेदनशील सम्बन्ध बनाना. ऐसे समलैंगिकों को अपने लिए दूसरे तरीके ढूँढने पड़ते है जो कि अब तक गैर कानूनी थे उन्हें हमेशा पुलिस का भय बना रहता था. कोर्ट के फैसले से इन लोगों का खुश होना स्वाभाविक है. लेकिन क्या सारे समलैंगिक ऐसे ही होते हैं. दरअसल बहुत से मित्र हमारे समाज कि ऐसी बुराइओं --जो पूंजीवादी उपभोक्तावादी समाज कि देन हैं और जिनसे समाज के सभी तबके प्रभावित है -- को समलैंगिकता के ऊपर आरोपित कर देते हैं. समलैंगिक लोगों के आन्दोलन को ऐसे ही लोगों का आन्दोलन समझ लेते हैं. और समलैंगिक लोगों कि घुटन, पीडा और संत्रास को नहीं समझ पाते. उनकी एक सामान्य जीवन जीने कि स्वाभाविक इच्छा को नहीं समझ पाते.
कोर्ट के फैसले के बाद रोहित बल के यहाँ हुई पार्टी के आधार पर समलैंगिक लोगों के आन्दोलन के बारे में बहुत कुछ तय नहीं किया जा सकता है. यह एक मायने में मुझे वैसा ही लगता है जैसे मुस्लिम सवाल पर बात करते समय कई लोग यह बात कहने लग जाते है कि पाकिस्तान के क्रिकेट मैच जीतने पर मुस्लिम लोग पटाखे फोड़ते हैं .
इसके आलावा समलैंगिकता पर मैं भी कुछ अपने ब्लॉग में लिखना चाहता हूँ खास कर जैविक आधारों पर और समलैंगिक आन्दोलन की राजनैतिक प्रवृत्तियों पर. किन्तु यह एक श्रमसाध्य काम है जिसके लिए मैं अपने को तैयार नहीं कर पा रहा हूँ.
aap ne apne parichay ke ant me kavayat likha h, sambhavtah aap kavayad likhna chahti hongi...
aap ka lekh vicharottejak h...
Udan Tashtari said...
सार्थक चिन्तन है.
July 6, 2009 4:12 PM
AlbelaKhatri.com said...
badhiya baat !
July 6, 2009 5:55 PM
अभिषेक मिश्रा said...
bahut achcha kaha swapndarshi ji,
kash aisi soch sab ki hoti, tab ye duniya bahut khubsurat hoti.
@Rangnath,
Thanks, I have made corrections. For me primary purpose of this blog is not to forget hindi-urdu.
विस्तृत विमर्श - आपकी सशक्त लेखनी ही इस ब्लॉग पर आने को प्रेरित करती रहती है ! आपने गे -लेस्ब मुद्दों को उनके सही परिप्रेक्ष्य में निरूपित किया और कई कम चर्चित बिन्दुओं को भी उकेरा ! मेरी अपनी समझ है की इस विचित्र मानवीय व्यवहार की जड़े बाल्यकाल से ही उगने लगने लगती हैं -और कई कारक उसे उत्प्रेरित करते हैं ! बेटी का पिता की ओर से दुत्कार /.उपेक्षा उसे लेस्ब बना सकता है तो मान का बेटे के प्रति तिरस्कार या लड़कपन /किशोरावस्था की दहलीज पर कोई ऐसी घटना जिससे विपरीत सेक्स के प्रति विपरीत मनोग्रन्थि बने -पुरुष को गे बना सकती हैं -और सही है इनमें इनका कोई दोष नहीं है -यह पूरी तरह परिस्थितिजन्य है ! समलैंगिकता का कोई जीन /जीन लड़ी तो अब तक खोजी नहीं गयी अतः इसके अनुवांशिक पक्ष पर कुछ कहना मुश्किल है -हाँ कुछ पशु प्रजातियों में दबंगता प्रदर्शित करने हेतु नर पेक आर्डर के कम दबंग पर माउन्ट कर जाता है और उसे सतत यह अहसास दिलाता रहता है की औकात में रहो -पर मानवीय संदर्भ में हम इसे उधृत कर सकते हैं या नहीं .मुश्किल है ! और मुझे यह भी ठीक से स्पष्ट नहीं है की गे या लेस्ब में अनिवार्यतः यौनउत्कंठाएँ होती ही हों जो पुरुषों में सोड़ोमी जैसे क्वीयर व्यवहार तक जा पहुँचती हों -क्या सभी सोडोमिस्ट गे होते हैं या सभी गे सोडोमिस्ट ऐसा भी कोई अध्ययन मेरे सामने नहीं गुजरा है !
बहरहाल आपने विषय का गंभीर विवेचन किया ,साधुवाद !
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