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Nov 17, 2009

आधी शताब्दी यम के इंतज़ार के बाद भी बची रहती है स्त्री

बरसो पहले जब मैं छोटी थी
अक्सर किसी दादी, नानी, ताई,
या फ़िर ऐसी ही किसी अधेड़ पहाड़ी स्त्री
को कहते सुनती थी
दिन भर की कमरतोड़ मेहनत के बाद
'बाबा-बोई * मुझे यम भी भूल गया है"
क्या करू जब तक है जान
तब तक लगी हूँ

अक्सर मन मे सवाल आता था कि
एक भरे-पूरे परिवार मे स्नेह बांटती स्त्री,
एक माँ, पत्नी
और एक कठिन भूगोल मे
बुजुर्गो का एक मात्र संबल
क्यूँ रिक्त हो जाती है अपने भीतर ही भीतर

और बहुत सी ये स्त्रियाँ आधी शताब्दी
ऐसे ही जी गयी
कर गयी बच्चों को अपने पैरो पर खडा
पितरो का तर्पण
बना गयी घर-द्वार
कंठस्थ है इन्हे रामायण
और कबीर और रहीम
और ढेर सी लोकोक्तिया
कभी स्कूल जाने के बाद भी

तीस साल बाद अचानक
एक दिन ऐसे ही
बचपन के मृगछौने जैसे उत्साह से
उलटे रास्ते
कूदते-फांदते सीढ़ीदार खेतों मे
बहुत उपर मुझे मिलती है एक दादी
एक पेड़ के नीचे घाम तापती हुयी
सौ साल की एक बुढ़िया
और कहती है
"बोई बहुत सुख से हूँ,
कितना खुबसूरत है
सामने का पहाड़ और यहाँ की धुप
किसी अस्पताल की बजाय
यही मरना है मुझे"

आधी शताब्दी यम के इंतज़ार मे
जीवन को धकेलती स्त्री के भीतर भी
ज़िंदा रहता है प्रेम
प्रकृति से, मनुष्य से,
और बची रहती है इच्छा..........

4 comments:

  1. आधी शताब्दी यम के इंतज़ार मे
    जीवन को धकेलती स्त्री के भीतर भी
    ज़िंदा रहता है प्रेम
    प्रकृति से, मनुष्य से,
    और बची रहती है इच्छा..........


    -बहुत गहरी अभिव्यक्ति!!

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  2. वाह प्रणम्य अभिलाषा -यही मानवीयता का सुन्दर रूप है -अपराजित ,चिर आनंदित !

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  3. आधी शताब्दी यम के इंतज़ार मे
    जीवन को धकेलती स्त्री के भीतर ____

    केवल स्‍त्री ही नहीं सभी आधी शताब्‍दी या थोड़ा और इंतजार करते हैं।

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  4. बेहद सच्ची और मन को छूने वाली कविता .

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