"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Dec 8, 2009

चिड़िया भर आसमान

चहकी हवा देती जैसे निमत्रण
कि
चलो एक छोर से दूसरे तक देख आए दुनिया,
एक ज़रूरी शर्त है जीवन की इस छोर से उस तक
और
फ़िर उस छोर से इस तक उड़ना,
गंतव्य जैसा गंतव्य भी नही कोई,
लगातार गति है, सिर्फ़ यात्रा का रोमांच है,
अनदेखे रास्तों की, अबूझी संभावनाओं की आस है

चलो फुर्र से निकल उड़ चले
इन महाद्वीपों के परे, महासागरों के पार,
निकल जाय फुर्र से, अलसुबह की ख़ुमारी में नहाए
अरुणिम सुरज और पूरे चाँद के ठीक बीचों-बीच
या फ़िर निकल जाते है किसी हतप्रभ सर के ऊपर
और बताते है उसे बची है उम्मीदे, और संभावनाए
जो बिनबूझे दाखिल हो जाती है अब भी.....

10 comments:

  1. कुछ समय से इस महत्वपूर्ण ठिकाने पर कविताओं की आमद से साक्षात्कार कर रहा हूँ। एक पाठक की हैसियत से यही कहना है संवेदना सही आकार ले रही है और शिल्प की कोई कमी नहीं !

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  2. @Sid
    Hindi ke professor ka anumodan maan liyaa jaay?

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  3. साफ़ आसमान में निर्विरोध बहती ठण्डी हवा की तरह लगी यह रचना । सुन्दर !!!!!

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  4. Bahaut achchi udaan aur yojna hai... sabhi ke man mein dabi hoti hai, aapne ba-khoobi qaid bhi kiya aur bayaan bhi. Jai ho!

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  5. गंतव्य जैसा गंतव्य भी नही कोई,
    लगातार गति है, सिर्फ़ यात्रा का रोमांच है,
    अनदेखे रास्तों की, अबूझी संभावनाओं की आस है

    KITNA SAHI KAHA AAPNE...WAAH !!!

    AAPKI IS RACHNA NE MAN MOH LIYA....BAHUT BAHUT BAHUT HI SUNDAR RACHNA...

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  6. चि‍ड़ि‍या को खबर नहीं थी

    कि‍ उससे भी ज्‍यादा आजाद कोई हो सकता है

    ये खबर तो

    आदमी को भी नहीं है

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  7. उड़ान की चाह बहुत ज़ुरूरी है . पंख से भी ज्यादा .

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  8. यह पलायन तो नहीं बल्कि उत्फुल्ल उछाह का संचरण है न ? क्या फिर १८० डिग्री गलत समझा ?
    साहित्य मैं ऐसा सहज ही है ! मैं अपनी समझ का भी रोना नही रोना चाहता !

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