"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"
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Mar 31, 2009
वाकई शशि थरूर और उनके जैसे लोग देश के लिए खतरा है?
शशि के विरोध की वजह अगर ये है.....
“बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पे रोल पर रहे अथवा अन्तरराष्ट्रीय संगठनों से पेंशनयाफ़्ता ऐसे लोगों का आयात करना पड़ेगा जिनका दिल-दिमाग पूरी तरह पश्चिमीकृत हो चुका है और जो अपनी पश्चिमपरस्त नीतियों की वजह से अन्ततः बाहुबलियों से ज्यादा नुकसानदेह साबित हो सकते हैं ।”
इस बारे मे फ़िर से अपनी असहमति दर्ज करना चाहती हूँ। दिल का मुझे नही पता की शशि का हिन्दुस्तानी है या नही। वैसे भी दिल का काम सोचने का नही है। दिल का सोच से रिश्ता सिर्फ़ कविता मे एक रूपक की तरह है। असल जीवन मे उसका काम सिर्फ़ इतना है, की खून लगातार परिशोधित होता रहे और शरीर के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचता रहे।
दिमाग का पश्चिमीकृत या पूर्वीकृत होना भी मेरी समझ से बाहर है। सोच मे रेशनलिटी या फ़िर सुब्जेक्टिविटी
पूर्व और पश्चिम दोनों ही संस्कृति मे पायी गयी है। इतना ज़रूर है की पिछली दो -तीन सदियों मे तकनीक और विज्ञान, और बाज़ार की समझ पश्चिम मे ही परवान चड़ी है, उसके अपने ऐतिहासिक और सामाजिक कारण है।
और निश्चित रूप से उसका असर जन जीवन की सोच पर भी है। पर सब पर एकसार है, ये मुझे अपने लंबे प्रवास मे नही लगता।
पूर्व के जितने भी देश है, उन्होंने भी विज्ञान, दर्शन, राजनीती, और बाज़ार का और आधुनिक शिक्षा का प्रारूप पश्चिम से उधार लिया है। कितना भी मन कड़वा करे, या अपने गोरवमय अतीत पर मुग्ध होवे, इस सच्च से हम मुकर नही सकते। भारत का जनमानस अपनी शिक्षा मे और नयी पीढी, और हमारी अधेड़ पीढी अपनी महत्त्वाकांक्षा मे जो खाका लिए घुमते है, वों पश्चिम की संस्कृति मे और सोच मे कितनी सरोबार है, इस पर भी सोचने की ज़रूरत है। और क्या ये सम्भव है की लगातार कम होती दूरियों की इस दूनिया कोई भी पश्चिम के प्रभाव से या पूरब के प्रभाव से बचा रहेगा? थरूर के बारे मे मेरी अपनी जानकारी सीमित है, पर सिर्फ़ इसीलिये की उन्होंने UN मे नौकरी की है, या पश्चिम का एक्स्पोसर है, उनका विरोध की हल्की वजह है।
देश की समझ, जन आंदोलनों की समझ और हिस्सा होना जननेता के लिए ज़रूरी है। पर ये भी ज़रूरी है की संसद मे इस समझ के लोग भी जाय जिन्हें इल्म हो की भारत आज के समय मे अंतररास्ट्रीय स्तर पर कहा खडा है ? जिसे अनुभव हो कई देशो के लोगो से नेगोशिएट करने का. समझ हो पश्चिमी संस्कृति और भाषा की भी ताकी उनके आर्गुमेंट्स के सन्दर्भ और उपज को समझ सके, और ज्यादा सशक्त तरीके से किसी भी सौदे को भारत के पक्ष मे कर सके। बाहुबली या नितांत जनान्दोलनों से आए ईमानदार नेताओं (जिनकी संसद मे जाने की संभावना वैसे भी कम है) को निश्चित रूप से इस समझ की कमी होती है। वैरायटी मिक्स संसद मे भी चाहिए, ताकी कई तरह की दृष्टी और समझ वहा भी हो। कभी -कभी किसी जगह से दूरी अच्छी होती है। distant view पूरे परिद्र्स्य को समग्र मे देखने की छूट देता है। और माईक्रोस्कोपिक view उसके भीतर एक स्थिति या स्थानीयता की गहनता को। भारत जैसे देश को समझने के लिए और खासकर नीती निरधाराको की फोज़ मे दोनों तरह के लोगो का होना ज़रूरी है। भारत को समझने की distant view वाली एक समग्र दृष्टी थरूर से ज्यादा आज की संसद मे किसके पास है?
ये भी मेरे लिए समझ से बाहर है, कि आरिफ ज़कारिया, शशि थरूर, जैसे लोग बाहुबली से ज्यादा खतरनाक है? या फ़िर UN मे नौकरी करने वाला या MNC मे नौकरी करने वाले, या विदेशी यूनिवर्सिटी मे कार्यरत हमारे जैसे लोग उन लोगो से बेईमान है जो सहारा , रिलायंस, इत्यादि या जोड़ जुगत करके नौकरी पाये सरकारी संस्थानों/हिन्दुस्तान के विश्व्विध्लायो मे काम करते है?
Mar 30, 2009
Mar 25, 2009
हज़ार इच्छाए लिए सूरज फ़िर उगता है..........
रोशनी के बिना दिन
और नींद से बोझिल राते
दो नन्ही कोपलों की हरियाली से
मन फ़िर भी हरा है........
स्वप्न अब भी आते है,
और स्वप्न में, मैं माँ नही
बल्कि अक्सर बच्ची हो जाती हूँ
स्नेह की स्मृति से सराबोर
हज़ार इच्छाए लिए सूरज फ़िर उगता है..........
Mar 17, 2009
Slum Dog Millionaire
बोलीवुड की तर्ज़ पर कहे तो अमिताभ की दीवार के ज्यादा करीब है, अगर गाना बजाना छोड़ दिया जाय। एक सवाल जिसके ज़बाब का सीधा तारतम्य दिखायी नही देता वों है, नायक की जानकारी रिवाल्वर के आविष्कार कर्ता के बारे मे। रिल्वाल्वर का होना और उससे जुडी ऐसी जानकारी का बिना पढ़े-लिखे, सीधा सम्बन्ध थोडा टेढी खीर लगता है। दूसरा एक सीन मे नायक अपना नाम कम्पूटर पर टाइप करता हुया दिखता है, और दूसरी जगह न लिख-पढ़ पाने का क्लेम है। जो तकनीकी के पॉइंट से ये कुछ मेल नही खाता।
बाकी भारतीय संस्कृति या भारत को खासतौर पर फ़िल्म मे जैसे दिखाया गया है, उससे मुझे कोई आपत्ति नही लगी। एक कहानी और हाशिये पर खडे बच्चों की नज़र से जो भारत दिखता होगा, कुछ कुछ ऐसा ही होगा, और इस लिहाज़ से कहानी के साथ उसकी लय है। वैसे भी भारत जैसे विविधता लिए देश को किसी एक कहानी , एक फ़िल्म, या एक दिमाग मे कैद कर पाना मुश्किल है। यहाँ एक साथ कई सदियाँ है। और किसी भी कहानीकार या फिल्मकार से ये उम्मीद करना की वों पूरे भारत को समेटे एक मुश्किल और कभी पूरी न होने वाली आशा है, और ये कतई ज़रूरी नही है। दुसरा हम जो है, वों है, एक कहानी , एक फ़िल्म , हमारी किस्मत नही बदलने वाली है।
Mar 12, 2009
धर्म, आस्था और स्त्री मुक्ती

धर्म और स्त्री मुक्ती को लेकर कई तरह की बहस गर्म है। चोखेर बाली पर एक तरफ़, महिलाओं का पुरोहिताई की तरफ़ बढ़ते कदम स्त्री-मुक्ती तरफदारी मे उठाये हुए कदम की तरह शिनाख्त पा रहे है। वही अंशुमाली और ब्लॉग जगत के दूसरे दोस्त कहते है की अगर स्त्री को मुक्त होना है तो धर्म को छोड़ना भी एक ज़रूरी सी शर्त है। तार्किक शर्त है।
स्त्री मुक्ती और धर्म को लेकर कुछ फुटकर विचार मेरे भी है, जो बार बार आत्म-चिंतन और बहुत तरह के लोगो के संपर्क मे आने से बने है। मुझे लगता है की जीवन के और ख़ास तौर पर सामाजिक जीवन के, सामाजिक अव्धारानाओ से जुड़े सवाल, किसी तरह के झटका समाधानों से सुलझने वाले नही है।
पुरोहिताई और स्त्री मुक्ती:
ये पुरूष द्वारा बनायी गयी व्यवस्था और दुर्ग पर औरतों की फतह की तरह दिखती है पहली नज़र मे। और तमाम संसाधनों की तरह, धर्म मे जनवादी संस्करण के उभरने का संकेत भी देता है, रूप के स्तर पर। मेरी उम्मीद है की ये फतह एक पुराने जीर्ण-शीर्ण और खाली पड़े किले की फतह से ज्यादा हो।
मेरी चिंताए अंतर्वस्तु को लेकर है, अगर वों बदले तो बात बने। नही तो कर्मकांडो मे और पुरोहिताई मे औरत की भागीदारी आज के समय मे कोई बड़ी बात नही है। न ही ये किसी सचेत प्रक्रिया की उपज है, जिसके फलस्वरूप औरतों मे इस भागीदारी की इच्छा उपजी हो। इसे लिबरल और प्रगतिशील महिलाओं के द्वारा जो एक लंबा संघर्ष भारत और उसके बाहर चला है, उसके साईड़ इफेक्ट के बतौर देखना ज्यादा उचित होगा।
वैश्वीकरण की आर्थिक व्यवस्था ने पुराणी पीढ़ी के मुकाबिले, आज की पीढ़ी के लिए कामगार से लेकर, कस्टमर सेण्टर और दूसरे अनेक तरह के रोजगार खोल दिए है। सरकारी नौकरियों से ज्यादा, एन जी ओ, की नौकरिया आकर्षक हो गयी है। एक ऐसे समय मे पुरुषो के लिए पुरोहिताई, बहुत आकर्षक नही है। समाज मे ये जो जगह खाली हुयी है, इसी को स्त्री पुरोहितो से भरा जा रहा है, और इसीलिये, ये न सही तो ये सही, की तर्ज़ पर सिर्फ़ स्त्री ही नही, दलित, और गैर-ब्राहमण जातिया भी इस पुरोहिताई का हिस्सा बन गयी है, जो उनके लिए सदा से वर्जित था। सो इसे सिर्फ़ स्त्री स्वतंत्रता के मुद्दे की तरह न देखा जाय। ये सिर्फ़ मांग और आपूर्ती का मामला है। और स्त्री के बराबरी और उसके मानव अधिकारों से इससे कुछ हासिल होगा, ये कम से कम मुगालता मुझे नही है।
ये गैर-बरहमन , और स्त्री पुरोहित भी कट्टर रूप से जातिवादी, और साम्प्रदायिक ही है, ऐसी धारणा इनमे से कुछ को देख कर मेरी बनी है। मानव मात्र की समानता की भावना इनमे नही है। जब आज ऑफिस जाती औरत, विमान चलाती औरत, और रास्ट्रपति औरत स्वीकार्य है, तो फ़िर पुरोहित औरत तो मुह मे घी-शक्कर है, इस पित्र्सत्ताक समाज के लिए ।
फ़िर भी इस संभावना को सिरे से नकारा नही जा सकता है की शायद स्त्री और दलित की भागीदारी से धरम को लेकर एक नया मंथन तीव्र हो जायेगा, और जाती-द्वेष से मुक्त एक नए मानवीय और बड़े आयाम लिए धर्म का उदय हो सकता है, जो जाती-विभाजित समाज मे नए समीकरणों के तहत एका ला सकता है। आखिरकार मीरा ने भी धर्म की शरण मे जाकर, जाति और लिंग भेद और उससे उपजे द्वेष को मध्ययुग ललकारा था। औरत के स्वतंत्र निर्णय, धर्म मे सीधे दखल के नए आयाम खोले, धर्म को भी सिर्फ़ रूप और कर्मकांडो तक की सीमा से बाहर निकल कर आत्म मंथन के लिए विवश किया। मीरा ने ज़हर पीकर भी, धर्म की अंतर्वस्तु को ललकारा, और उसके मनुष्य मात्र के लिए समान होने का दावा किया। पंडित को हटाकर रैदास से पूजन करवाना भी मीरा की हिम्मत और उनकी धर्म को लेकर मानवता वादी सोच का परिचायक है। और मेरा ये विश्वास मजबूत होता है, की अगर एक तरह की असमानता टूटेगी, तो दूसरी समांतर चल रही असमानताओं पर भी कुठाराघात देर सबेर ज़रूर होगा। दलित और स्त्री संघर्ष के इसी धरातल पर एक बार फ़िर से पुरोहिताई मे उनके दखल को भी देखना होगा।
दूसरा बड़ा सवाल ये भी है की क्या स्त्री एक शोषक व्यवस्था का एक अंग बनकर बराबरी पा सकती है ? या फ़िर दूसरे शोषितों के लिए उम्मीद की कोई किरण ला सकती है? या फ़िर एक ज़र्ज़र व्यवस्था को जीवनदान दे कर आज़ादी की राह को जाने-अनजाने और कठिन बना देंगी? क्या ये औरते, उन वैदिक मान्यताओं और रूढियों पर भी सवाल उठाएगी जो औरत की अस्मिता और स्वाभिमान पर वार करती है? क्या कभी ये कन्यादान जैसी प्रथा का, दहेज़ विरोध और घरेलु हिंसा का प्रतिकार भी करेंगी? इन स्त्रीयों को जो पुरोहित है, और जिन्हें नया-नया ये मुल्लापन नसीब हुया है, को स्वीकारना मर्दवादी समाज के लिए वरदान है। एक तो इनसे जुड़े परिवारों के लिए सीधा आय का साधन। और वृहतर समाज के लिए अपनी सविधा को बनाए रखने का आसान तरीका।
अगर भारत के इतिहास को देखा जाय तो इससे मिलता जुलता उदहारण अभी पुराना नही पड़ा है। ब्रिटिश रूल के समय, भारत मे इतने ब्रिटिश नही थे जो उनके तन्त्र को और भारत के बड़े समुदाय को परतंत्र रख सकते। इसीलिये, उनकी पुलिस , आर्मी, और प्रसाशन तंत्र मे तमाम भारतीय थे, जो उनकी इस गुलामी की व्यवस्था को सम्भव बनाते थे। सिर्फ़ आदेश और कमांड ब्रिटिश हाथो मे था, जिस पर भारत का एक बड़ा हिस्सा अपनी वफादारी, जान तक लगाने को तैयार था। पर क्या उस व्यवस्था का अंग बनकर, भारत को या सिर्फ़ उन भारतीयों को भी आजादी मिली? आज़ादी तो उस व्यवस्था को चुनौती देकर, अवरोध खड़े करके, और अवज्ञा से ही हासिल हुयी है।
धार्मिक विद्रोह और स्त्री मुक्ती.
दूसरी तरफ़ एक झटका समाधान है की "अगर स्त्री धर्म से (या कहे तो धार्मिक अन्धविश्वाशो से) अगर मुक्त हो गयी तो वाकई मुक्त हो जायेगी".
मेरी राय मे नही होगी, क्योंकि धर्म कोई अलग थलग चीज़ नही है। धर्म, संस्कृति, विज्ञान, कला, कहावते, मुहवारे, और हमारा जीवन, इतिहास , सब एक तरह से आपस मे गुंथे हुए है, एक का बदलाव दूसरे को प्रभावित करेगा, और इनमे से कुछ भी जड़ नही है, ये सब लगातार बदल रहा है। ये किस दिशा की तरफ़ रुख किए है, इसे ही सचेत रूप से पहचानने की ज़रूरत है। और अगर ज़रूरत हो तो सचेत रूप से अपनाने या रिजेक्ट करने की भी।
धर्म का भी जो रूप आज हमारे सामने है, वों पहले इस तरह का नही था। त्योहारों का जो बाजारू रूप समाने है, शादी व्याह जो भयंकर जलसों मे बदल चुके है, उसका भी शहरीकरण, तकनीकी, और खर्च करने की क्षमता से, और भारत के एक बड़े हिस्से का गाँव से बेदखल होने, कृषक समाज की जड़ो से दूर होने से जितना रिश्ता है, उतना रिश्ता अब धर्म से नही बचा है। ये ज़रूर है, की ये सब धर्म के नाम पर चल रहा है। पर धर्म की और धार्मिक मान्यताओं की इस ऐतिहासिक यात्रा पर, बदलते स्वरुप पर भी बात होनी चाहिए।
अक्सर लोग धर्म की काट विज्ञान को और विज्ञान सम्मत दर्शन मे खोजते है। जिसके अपने फायदे है, और अपने नुक्सान है। विज्ञान ओब्जेक्टिविती के चलते, परमाणु बम बना सकता है, विनाश भी ला सकता, है, पर उस विनाश से बचने के लिए, जो मानवीव संवेदना है, मनुष्य मात्र के लिए सेवा का भाव है, उसे नही उपजाता। जिस तरह से धर्म का इस्तेमाल सत्ता, और राज्य ने इतिहास मे किया है, वही इस्तेमाल विज्ञान का भी हुया है, दूसरे समाजो को गुलाम बनाने के लिए, अपनी सत्ता को मजबूत करने के लिए।
बलशाली के लिए, विज्ञान और धर्म दोनों हथियार है, और निर्बल के लिए उम्मीद।
मैं ख़ुद किसी तरह के पूजा पाठ मे भरोसा नही करती, और और किसी ईश शक्ती से ये संसार संचालित होता है, ये भी नही मानती। पर जो मानते है, उनकी सुनने मैं, और उनके विश्वाशो को लेकर मुझे परेशानी नही है। धार्मिक आस्था को मैं निर्बल की उम्मीद की तरह देखती हूँ, और सबल की लाठी की तरह। अगर समाज के हाशिये पर खड़ी औरते, किसी तरह धर्म से अपने संबल लेती है, जीवन से हार नही मानती, और एक व्यक्तिगत स्पेस उन्हें धर्म से मिलता है, तो कुछ हद तक ये धर्म की सार्थकता है। उसी बहाने मशीन की तरह घर मे जुटी औरत को दो घड़ी का डाईवर्जन मिलता है। मन्दिर जाने के लिए ही सही घर से बाहर निकलती है, एक वृहतर समाज का हिस्सा बनती है।
धर्म और विज्ञान को लेकर मेरे अपने जीवन मे बड़ी कशमकश रही है। कभी एक सीधा सरल विश्वास था कि धर्म का विकल्प विज्ञान सम्मत दर्शन है। मेरे अपने जीवन के ज्यादातर फैसले इसी सोच के तहत आते है, पर इसकी सीमा रेखा का भी मुझे ज्ञान है। कभी कभी नयी उम्मीद और असंभव के सृजन के लिए, यथार्थ से ज्यादा कल्पना की डोर पकड़नी पड़ती है। यथार्थ को और वस्तुपरक ज्ञान को, जिसकी निश्चित काल से बंधी सीमा है, को लांघना पड़ता है, अंधे की तरह।
धर्म का जो सेवा भावः है उसके लिए सम्मान अभी भी मेरे दिल मे है। और जो आडम्बर है, साम्प्रदायिकता है, उसके लिए बेहद नफरत। और शायद हर व्यक्ति भीतर से जानता है की वों क्या कर रहा है, और जो ढोंगी है, वों धर्म का, रिश्तों का, और हर चीज़ का सिर्फ़ ढोंग करेगा। वों इतना शातिर होगा, चाहे स्त्री हो या पुरूष की उसके लिए हर चीज़ सिर्फ़ हथियार से ज्यादा मानी नही रखेगी.
धर्म का, धार्मिक मान्यताओं का, और सामाजिक मान्यताओं का भी, फैशन का, और प्रगतिशीलता का भी, लगातार मूल्यांकन ज़रूरी है। कसौटी पर बार बार, सर्वजन हिताय, और व्यक्तिगत आज़ादी , दोनों के पैमाने से। सर्वजन हिताय जहा सामजिक न्याय की कसौटी है, वही पर व्यक्तिगत आज़ादी, सर्जन और नयी संभावनाओ की। जहा भी इन दोनों के बीच सामजस्य नही है, वों समाज रोगी है। किसी भी एक कि दूसरे के कीमत पर अति, समाज के स्वास्थ्य के लिए और विकास के लिए बाधक हो जाती है.
मीराबाई का चित्र यह्ना से लिया गया है ।