"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Feb 16, 2010

औरत का घर

घर में नहीं, देश में नहीं
लड़की जन्म लेती है एक शरणार्थी शिविर में
जिसमे में रहना है उसे
जब तक नहीं मिलता उसे घर का पता
लड़की घर में नही पलती
घर लड़की के स्वपन में पलता है ....

घर के स्वपन में ढली
परायेपन की हवा में पली,
कुछ चाह में, कुछ अनचाहे
कुछ हड़बड़ी में, कुछ आहिस्ता से
निर्वासित हुयी हैं लड़कियां
किसी दुसरे घर में, जहाँ के लिए बनी थी
बनायी थी घर और समाज ने लडकियां


धीरे-धीरें खुलता है घर का मतलब
अँधेरे बंद सतखंडे गर्भगृह की तरह
रिसते-रिसते रिसता है जीवनरस
रोज़-रोज़ कुछ ख़त्म होती है लड़की,
रोज़
रोज़ कुछ बनती है औरत
कई जन्म लेती है स्त्री घर के भीतर...

बड़ी सहूलियत से एक साथ घर से दाखिल
और खारिज़ है औरत
नींद में दौडती है घर का स्वप्न लिए
और
फिर-फिर लौट आती है
उसी
घर जहाँ के लिए बनी है औरत,
जहाँ
ज़रुरत है औरत....

भरेपूरे घर में, स्नेह बांटती,
बंजरमन के बीहड़ में हुलसती औरत जानती है
कि सोख ली है घर ने उसकी आत्मा की आद्रता
नहीं फूटते स्नेह अंकुर अब अपने लिए
नही उड़ते आँख की कोरों में स्वपन
किसी क़र्ज़ की तरह अब घड़ी-घड़ी चुकता है जीवन

औरत को सहेजना है घर, बड़े करने है बच्चे
चुकाना है किसी और के जन्म का क़र्ज़
करना है किसी और के पुरखों का श्राद
नष्ट होने से पहले उसे करनी है
एक
लम्बी ढलान की यात्रा
घर के भीतर, घर का स्वप्न लिए,
धीरे-धीरे शेष होती है औरत.............

12 comments:

  1. क्या बात है लाजवाब प्रस्तुति , आपने सच में नारी के इर्द गिर्द घुमती बहुत ही उम्दा कविता लिखी , बधाई स्वीकारं करें ।

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  2. बहुत खूब लिखा आपने .....

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  3. भरेपूरे घर में, स्नेह बांटती,
    बंजरमन के बीहड़ में हुलसती औरत जानती है
    कि सोख ली है घर ने उसकी आत्मा की आद्रता
    नहीं फूटते स्नेह अंकुर अब अपने लिए
    नही उड़ते आँख की कोरों मैं स्वपन
    किसी क़र्ज़ की तरह अब घड़ी-घड़ी चुकता है जीवन
    Bahut Sundar....Badhai!!
    http://kavyamanjusha.blogspot.com/

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  4. सुन्दर कविता है...बधाई।

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  5. i think u r exaggerating ! this kind of rhyme-less poetry makes me uncomfortable. yes it is ur domain and u can write what u like , but i think u glorify melancholy.

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  6. बहुत सधे शब्दों में आपने स्त्री के मनोभावों को शब्द दिए हैं।
    घुघूती बासूती

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  7. @Munish
    Thanks for coming here and expressing your opinion.
    I do not intend to glorify melancholy, I indeed try to bring out the melancholy that is hidden behind the glorified image of woman as we know them in our society as lovely Mother, wife....etc. and hope that someways these images will be replaced.

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  8. अच्छी अभिव्यक्ति

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  9. लड़की घर में नही पलती
    घर लड़की के स्वपन में पलता है ....

    एक लड़की की जिंदगी की पूरी दास्तान लिख दी है....बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति....

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  10. ख़ूब" चमकदार" कविता

    भरेपूरे घर में, स्नेह बांटती,
    बंजरमन के बीहड़ में हुलसती औरत जानती है
    कि सोख ली है घर ने उसकी आत्मा की आद्रता

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