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Feb 22, 2010

तुम्हारे सवालों की उम्र बढ़ती रहे

अपनी कल्पना में सहज रचे बसे तुम
यूँ ही लेकर आते रहो रोज़ कई-कई सवाल
मेरे पास कुछ सीधे-सरल जब़ाब होंगे
फिर कुछ टेढ़े-मेढे उलझे अनुमान भर भी
और कभी मैं भी अवाक तुम्हारे साथ
उलझुंगी अबूझे सवालों से .............


कभी अकुलाया बेमतलब, अनमना मन होगा
घेरना मुझे तब भी अपने सवालों की झड़ी से
मेरे बच्चे यूं ही बरसते रहे तुम्हारे सवाल
भीगती रहूँ अचरज और नेह में बार-बार
ध्वनित हो, प्रतिबिंबित हो जीव-जगत का अप्रतिम सौन्दर्य
और उद्दघटित होते रहे हमारे होने के अबूझे अर्थ
मेरे हर एक जव़ाब पर उठे फिर नए सवाल
तब जब मेरे जब़ाब चुक जायें
पहुँचना दूसरे कई सोर्त्रों तक तुम .....

तुम अपनी जिज्ञासा की खोह में आजीवन
कुछ इस तरह
जैसे अपने छत्ते की शिनाख्त कर लेती है मधुमक्खियाँ
अपने अंतर में बसी सुगंध से
ढूँढ लेते है पक्षी उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक रास्ते
और व्हेल मछलियाँ लौट आती है
हर साल फिर एक ख़ास जगह महासागर को चीरते हुए
प्रणय की तलाश में .........

उन्मुक्त विचरती रहे तेरी कल्पना पंख पसारे
यूं ही क्षितिज के आर-पार
कई-कई हो तेरे सवाल
और बहुत लम्बी हो इन सवालों की उम्र
कि हर मोड़ पर मिलती रहे जिज्ञासा
चटकती रहे खांचाबद्ध सोच
कुछ बढ़ती रहे समझ
पर न बने सहूलियत कि अब सब जान चुके
बढ़ता रहे तुम्हारी दख़ल का घेरा
बढ़ती रहे तुम्हारे सवालों की उम्र

3 comments:

  1. बढ़ती रहे तुम्हारे सवालों की उम्र ..बहुत खूबसूरत बिम्ब है यह ।

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