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Mar 4, 2010

अजनबी संसार की सड़क पर

अजनबी संसार की सड़क पर
मैं तुम्हारा नाम तक न पूछ सकी
न फिर मिलना होगा कभी
दो दिन बाद शक्ल भूल जाऊँगी
आवाज बिसरा जायेगी
महीने या साल भर बाद जो दिखे तुम
तो शायद अनदेखे आगे सरक जाऊंगी
सिर्फ  मन की गीली मिट्टी में बची रहेगी छाप
अलग शक्लो में जीवन के कई सोपानों में
बार बार यूं ही आते  हो अचानक
जब मैं लगभग आख़िरी बार हाथपैर मार रही होती हूँ
ठीक अँधेरे में डूबने से पहले
तुम आते हो किसी सुपरमेन की तरह नहीं
कभी बूढ़ी,  खोखली होती हड्डिया और हिलती काया लिए
कभी अपनी गर्वीली गरीबी के वैभव में
धरती पर अपने पैर फंसायें
जैसे  एक दाढ़ीधारी मुल्ला नमूदार होता है  बिजनोर से शहर में
कई कई दफ़ा आती है  एक सरल तरल घरेलु औरत
चौंकाती है अजनबी आवाज
और कभी यूं दिन दहाड़े कोई  ओरेगोनियन
ट्रैफ़िक  से लदरबदर सड़क के बीचों बीच
झोंक  देता है अपनी समूची ताकत मेरी कार को धकियाते हुये

कितनी भी अजनबी है ये धरती
अजाने अपहचाने है रस्ते
नाम, पते, रिश्तेदारियों समेत बेमतलब पहचानों के जंगल में
जब तक निकलोगे बारबार  अप्रतीक्षित कोनों से अज़नबी
अपनी सम्पूर्ण   मनुष्यता  के साथ
ये धरती रहने लायक जगह होगी
मैं फिर फिर निकलूंगी निर्भय
अजनबी संसार की सड़क पर

7 comments:

  1. बहुत उम्दा अभिव्यक्ति!

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  2. Very touchi.
    Wish you the best.
    www.cartoonsbyirfan.com

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  3. निश्चित तौर पर यह एक अच्छी लिखी हुई रचना है....आप अच्छा लिखती हैं

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  4. This comment has been removed by a blog administrator.

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  5. adbhutaas kavita.... humein yaad rakhiyega... bhul na jaiyega...

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  6. नाम, पते, रिश्तेदारियों समेत बेमतलब पहचानों के जंगल में
    जब तक रहोगे तुम,
    निकलोगे बार-बार अपह्चाने, अप्रतीक्षित कोनों से,
    रहेगी मनुष्य को मनुष्य की पहचान...

    अजनबी संसार की निर्भय सड़क पर ....मैं फिर चलूंगी निर्भय हो कर ....!!

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  7. बहुत दिनों से आपको पढ़ नहीं पाई थी.या कहो की फुर्सत में आपका ब्लॉग पढ़ती हूँ आज तो इसी कविता में अटक के रह गयी.कोई ताज़ा हवा चले तो मैं इसके जादू से निकलूं.

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