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Jul 16, 2010

अपने हिस्से के आखर


विस्मृति की गाढ़ी अंधेरी खोह में
टटोलती हूँ  अपने हिस्से के कुछ आखर
जैसे जुगनू की रोशनी में
ज़िद्दी हाथ चढ़ा हो ज़रदोज़ी का काम
कौन सूत कपास है
कहां  ज़री की तार
सकपकाए उलझती हूँ कहीं रेशम रेशम...

उनींदे  रात रात भर पूछती हूँ  
उन्ती  लाख वर्ष पीछे छूटी  किसी पुरखन से
किस दोशीजा ने रेशे-रेशे बुनी मन के करघे चादर
कैसे बनते  बिगड़ते बने बिम्ब
कैसे बनी बोली, भाषा कोई
कब  कब भूले ?अर्थ का अनर्थ किये  
कितनी कितनी बार गढ़े आखर


सपने और  खुमारी के बीच
सुनती हूँ, बुझती हूँबीनती हूँ आखर
बिम्बों के बीच बुनती हूँ भाषा
जागे में रेत  हुये जाते फिसलते है आखर
खो जाती है भाषा, बेचैनियाँ बची रहती हैं
मन के तलघर तक की दौड़ में कभी उड़ती
कभी गिर गिर गहराती हूँ 
क्षय होती हूँ मद्धम मद्धम .....













10 comments:

  1. दिल की गहराई से लिखी गयी एक सुंदर रचना , बधाई

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  2. बहुत उम्दा अभिव्यक्ति!

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  3. जैसे चींटियां लौटती हैं बिलों में / कठफ़ोड़वा लौटता है काठ के पास …….
    ओ मेरी भाषा ! मैं लौटता हूं तुम में
    जब चुप रहते-रहते अकड़ जाती है मेरी जीभ
    दुखने लगती है मेरी आत्मा ।

    -केदारनाथ सिंह

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  4. पहले शीर्षक अपनी ओर खींचता है ....फिर विम्ब अपनी अपनी सीडिया चढ़कर अपने अपने मायने बताते है .......

    जिद्दी हाथ चढा हो ज़रदोज़ी का एक काम
    कौन सूत कपास है?
    कहां ज़री की तार?
    उर्दू में विम्बो का इस्तेमाल जितना आसान है .हिंदी में उतना ही मुश्किल......क्यूंकि कविता की पठनीयता बनी रहे इसके साथ ये भी महत्वपूर्ण रहता है के कविता अपना अर्थ न खोये ......आप सफल हुई है .....मसलन.....
    सिर्फ मन के तलघर तक
    गोल चक्कर भर की दौड़ हैउसी में कभी उड़ती
    कभी गिर गिर गहराती हूं
    क्षय होती हूं मद्धम मद्धम .....

    and this one too........


    उनींदे रात रात भर पूछती हूं
    उन्तीश लाख वर्ष पीछे छूटी किसी पुरखन से

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  5. आप सबका धन्यवाद.
    अनुराग जी,
    मैं कभी हिंदी और उर्दू के फर्क को लेकर चैतन्य नहीं रही, शायद फर्क कर भी नहीं सकती. कुछ इसी मिलीजुली ज़बान जिसे आप हिन्दोस्तानी कह सकते है, में बातचीत की आदत है. वैसे भी हिंदी को संस्कृत के छोर पर ले जाकर खड़ा करना और उर्दू में खोज खोज कर अरबी के छोर तक जा पहुंचना दोनों हमें भाषाई रूप से दरिद्र ही बनाएगा. कुछ फनी भी
    एक मर्तबा मेरे पास किसी दोस्त का उर्दू में लिखा ख़त था. बहुत सालों संभालकर रखा. लिखने वाले ने भी जान बूझ कर लिखा था कि ऐसे ही इसका जोकर बनाता हूं टाईप. पढ़ नहीं पायेगी. बहुत सालों के बाद एक लेबनान की दोस्त जिसे अरबी पढनी आती थी, कुछ मुश्किल से उसे पढ़ा पर उर्दू का एक भी शब्द उसे समझ नहीं आया. मुझे लिपि पढनी नहीं आती थी, पर कुछ दर्ज़न भर मीर तकी मीर के शेर थे.

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  6. अगर मैं कहूं कि आप संस्‍कृत,हिन्‍दी और उर्दू की खालिस ऊन से अपनी रंग-बिरंगी गर्म अहसासों वाली रचना बुनकर हमारे मन को पहनाती हैं तो अतिश्‍योक्ति नहीं होनी चाहिए।

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  7. उन्तीश लाख वर्ष पीछे छूटी किसी पुरखन ..कितने कितने अर्थ हैं इस पंक्ति में ।

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  8. Aap jis bhasha mein apne lekho ko sundar swaroop deti hain atulneeya hai Hats Off to u.

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  9. Shabdo ka aisa samnwaya atulniya hai,

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