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Dec 12, 2010

शब्द

शब्द मेरे पास आओ तो
सारे कौतुक छोड़ आना
न आना बुझोवल की तरह
अजमाए जुमलों की शक्ल में न आना
न आना बिन दाने के  झुनझुने की तरह
पथराई पृथ्वी पर पानी की एक बूँद सी न आना
न गुजरना नारे की तरह
काले स्याह पनियल बादल सा आना
आओ तो अपने पूरे अर्थ में आना

बिसार देना शब्दकोष और कुंजियाँ
बहा देना व्यंजना ब्याकरण किसी नदी के तीर
छोड़ आना अटरम-पटरम किसी बेस कैम्प पर
पामीरी पठार की चोटी तक न बने
तो भी कुछ ऊंपर तक चले आना

नहीं तो अलफाज़   शोर भर होते है
मनभावन गीत  नहीं बनते
भाषा की दीवार लांघ निशब्द चले आना
उदासी और उल्लास की तरह 
सपनों और खुमारी की रंगत में 
अपने अंतर का संगीत लिए
किसी राग की तरह आना

5 comments:

  1. कई अर्थो की कई परते...कभी-कभी हम क्या -क्या चाहते है..स्याह बादल पूरे वेग से भले न फटे..कभी बस बरस भर जाये तो भी महक -महक जाती है धरती..

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  2. सुषमा जी, बहुत गहरी बात कह दी आपने। दिल को छू गयी।

    बधाई।

    ---------
    दिल्‍ली के दिलवाले ब्‍लॉगर।

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  3. बहुत सुंदर कविता। मुझे पता नहीं था आप कविता में भी इतने सुंदर ढंग से बात करती हैं। सचमुच प्‍यारी।

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  4. बराहे इस सुंदर कविता वाली पोस्ट के नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ:-)

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  5. शब्दों के आह्वान के लिये सुन्दर शब्दों का प्रयोग किया है आपने.
    बहुत खूबसूरत रचना

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