Copyright © 2007-present by the blog author. All rights reserved. Reproduction including translations, Roman version /modification of any material is not allowed without prior permission. If you are interested in the blog material, please leave a note in the comment box of the blog post of your interest.
कृपया बिना अनुमति के इस ब्लॉग की सामग्री का इस्तेमाल किसी ब्लॉग, वेबसाइट या प्रिंट मे न करे . अनुमति के लिए सम्बंधित पोस्ट के कमेंट बॉक्स में टिप्पणी कर सकते हैं .

Jul 16, 2010

अपने हिस्से के आखर


विस्मृति की गाढ़ी अंधेरी खोह में
टटोलती हूँ  अपने हिस्से के कुछ आखर
जैसे जुगनू की रोशनी में
ज़िद्दी हाथ चढ़ा हो ज़रदोज़ी का काम
कौन सूत कपास है
कहां  ज़री की तार
सकपकाए उलझती हूँ कहीं रेशम रेशम...

उनींदे  रात रात भर पूछती हूँ  
उन्ती  लाख वर्ष पीछे छूटी  किसी पुरखन से
किस दोशीजा ने रेशे-रेशे बुनी मन के करघे चादर
कैसे बनते  बिगड़ते बने बिम्ब
कैसे बनी बोली, भाषा कोई
कब  कब भूले ?अर्थ का अनर्थ किये  
कितनी कितनी बार गढ़े आखर


सपने और  खुमारी के बीच
सुनती हूँ, बुझती हूँबीनती हूँ आखर
बिम्बों के बीच बुनती हूँ भाषा
जागे में रेत  हुये जाते फिसलते है आखर
खो जाती है भाषा, बेचैनियाँ बची रहती हैं
मन के तलघर तक की दौड़ में कभी उड़ती
कभी गिर गिर गहराती हूँ 
क्षय होती हूँ मद्धम मद्धम .....