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Aug 25, 2010

गिर्दा हमेशा हमारे बीच ही रहेंगे




गिर्दा अब हमारे बीच नहीं रहे कहने का साहस मन में नही है. २२ अगस्त को 11.31 AM को गिर्दा अब किसी 
दूसरी यात्रा पर निकल चुके है. गिर्दा जो हमेशा से अपने समूचेपन में लोगो से प्यार करते थे, गाते थे, लिखते थे, और सड़क पर उतर जाने में कभी संकोच नही किये, जन पक्षधरता  जिनकी अकेली पक्षधरता थी, हमेशा कई कई रूपों में बार बार हमारे बीच बने रहेंगे.
गिर्दा बखूबी फैज़ को कुमायूनी में उल्था कर गाते थे. उसी का एक मुखड़ा उनकी याद में ..... 

Aug 17, 2010

लौटना पहाड़

लौटना पहाड़

फिर फिर  मन की भूली बिसराई
सर्पीली पनीली हरी संकरी पगडंडी पर होगा
ठीक ठीक किसी भूगोल में नहीं होगा
किसी  समय में नहीं होगा
भटकन की बहत्तर कहानियां घेरेंगी 
कुछ छितरे चमकीले बिम्ब होंगे
कुहासे, धुप और बारिश के बीच
अठखेलियाँ करते