"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Feb 14, 2011

मातृत्‍व

                    
 माँ अपनी धुन में एक चेहरा बुनती
नाकनक्श चुनती
जैसे हो उसका अधिकार
फिर उस भीतर बसे अजाने की
कल्पना में हंसती
लिली की पहली पंखुड़ी खुलती
एक साथ पलटते कई सूरजमुखी 
दूर तक बहुरंगी एक तितली उड़ती

अपना पहचाना शरीर झरना बन बहता
जाने कौन दिशा कौन डगर पहुंचता 
मन को सुधी नयी नज़र मिलती
एक मीठेपन में मनुष्यता घुलती
आत्मा के अतल में साझापन गहराता
निश्चित दायरों, दरीचों के बाहर खड़ी
प्रवासी, एक सांवली औरत  
अपने समय के चौतरफा युद्ध, नफ़रत,
और बंदज़हनी से बचती 
सन २००३ में न्यूयॉर्क के किसी कौने  
पक्ष प्रतिपक्ष की रैलियों के बीच गुज़रती
सुनती फ़ॉक्स, बी.बी.सी., सी.एन.एन. 
फ्री स्पीच, डेमोक्रेसी नाऊ, एन.पी.आर.
और हॉवर्ड जिन्न, अज़ीज़, अरुंधती
रोज किसी माँ की आह के बीच ठिठकती
धीमें बुदबुदाती एक प्रार्थना
“किसी भी माँ की कोख से जाये के लिए
जीवन सुन्दर हो, संभव हो ”
पिता सपने बुनता
भीतर फूटता अनजाना कोई सोता
लिए प्रेम, सचेतनता, कोमलता
जिसमे लिपटकर माँ अपने दिन गिनती

9 comments:

  1. निश्चित दायरों, दरीचों के बाहर खड़ी
    प्रवासी, एक सांवली औरत
    अपने समय के चौतरफा युद्ध, नफ़रत,
    और बंदज़हनी से बचती
    सन २००३ में न्यूयॉर्क के किसी कौने
    पक्ष प्रतिपक्ष की रैलियों के बीच गुज़रती
    सुनती फ़ॉक्स, बी.बी.सी., सी.एन.एन.
    हॉवर्ड जिन्न, अज़ीज़, अरुंधती
    रोज किसी माँ की आह के बीच ठिठकती
    धीमें बुदबुदाती एक प्रार्थना
    “किसी भी माँ की कोख से जाये के लिए
    जीवन सुन्दर हो, संभव हो ”

    पिता सपने बुनता
    भीतर फूटता अनजाना कोई सोता
    लिए प्रेम, सचेतता, कोमलता
    जिसमे लिपटकर माँ अपने दिन गिनती


    बेमिसाल...........

    कविता के भीतर की शक्तिया महसूस होने लगती है .....शब्द वाकई ईश्वर ने केवल मुष्य को दिए है

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  2. बहुत बहुत बहुत बहुत अच्छी कविता
    किन शब्दो मे तारीफ करू इस बेमिशाल कविता की

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  3. • आप रचनात्मक ऊर्जा से भरी हुई हैं। यह कविता किसी तरह का बौद्धिक राग नहीं अलापती, बल्कि अपनी गंध में बिल्‍कुल निजी हैं, जिसमें जीवन की विविधता की अंतरवस्‍तु सांस ले रही है ।

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  4. अपना पहचाना शरीर झरना बन बहता
    जाने कौन दिशा कौन डगर पहुंचता

    sach..

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  5. manoj ji jis nijipan ko kah rahe hain, pakad pa raha hu mai bhi.

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  6. मां के ही एक अन्‍य रूप को समर्पि‍त कवि‍ता http://rajey.blogspot.com/ पर

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  7. बहुत सुंदर ..... अंतर्मन के भावों को दिए बेहतरीन शब्द ...... खूब लिखा आपने ...

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