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Mar 12, 2011

तीन पुराने "प"


परवाज़
मन के ही
फड़फडाते है पंख पहले 
मन में  उभरती है 
पुरानी  इक इबारत 
"लुक अप एंड लिव "
मन ही गिरता है खाईयाँ  खाईयाँ  
उंचाईयों  में उठने से पहले 
परवाज़ बाद की बात है


प्रेम
ज़रा सी जगह में 
ज़रा सी  रोशनी में
बहुत बहुत नम किसी  कौने

क़िरमिज़ी किरणों का रंग लिए 
खिलते है कनेर के  फूल 
हवा में घुलता 
मिट्टी तक फैलता जाता है लाल रंग



प्रतीक्षा 
गुले सुर्खी  सी तेरी याद थी 
ओठों पर उग आयी काँटों की चुभन 
दिल अम्ल का रिसता झरना
गलती रही  इच्छाएं 


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4 comments:

  1. हो सकता है कि कवि की निगाह में कोई / कई पुराने संदर्भ हों लेकिन विचार व शिल्प के नजरिये से इनमें जो ताजगी है वह बाँधती है। सचमुच!!

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  2. तीनों क्षनिकाएं अच्छी लगीं ..प्रतीक्षा बेहद पसंद आई

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  3. परवाज़ बाद की बात है...... उठने से पहले गिरना..... खूबसूरत.... !!!

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