"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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May 24, 2011

पहाड़ डायरी ०५- नक़्शे के बाहर का एक गाँव



ये मध्य हिमालय का एक गाँव है
जो ढूढे मिलता नही
डिजिटल अर्थ या  भारत के नक़्शे में कहीं
इस जगह का अनुमान सौ मील दूर क़स्बे से लगता
कच्चे और अधकच्चे रास्ते हैं दूर तक फैले हुये
अठारह मील की सिर्फ़ खड़ी चढ़ाई
बाहरी भूगोल में स्‍थानीय बाशिंदों की बहुत गति नही..

इस प्रदेश के ज़िक्र के बिना अधूरे
रामायण..
महाभारत..
कथा-उपनिषद..
पुराण..
इस प्रदेश का बस इतिहास नही...

आसमान से होड़ करती ऊँचाई पर
बित्तेभर जगह में
जंगली बकरी सी चढ़ती-उतरती हैं औरतें
जुटाती जाती जीवन संसाधन
अब तक हैं  पहुँचतीं दुलहिन
डोले में बैठ एक छोर से दूसरी छोर
और बहुत सी बहुयें झूल जाती रही किसी ठूंठ पर
जीवन की अदम्य चाहना और दुःख के बीच उपजे
हर ठूंठ- पेड़- पणधार के गीत है

दूर तक नही है अब भी स्कूल
पहुँचतें लोग अस्पताल चल मीलों मील
ये सन दो हज़ार दस का अफ़गानिस्तान नही  
यहाँ बम नही गिरा कभी
महाशक्तियों के बीच नही लड़ाई हुयी
बीस साल से तो कोई चोरी भी नही हुयी
वो भी हुयी थी सिर्फ ज़रा सा गुड़-चावल की  
भूखी बहुओं ने किसी कोने बैठ खीर खाई थी

लकड़ी प्रदेश..
नदी प्रदेश..
बिजली प्रदेश ये..  
मूलभूत सुविधाओं से वंचित
नागरिकता से बहिष्कृत
शाईनिंग इंडिया का कोना है
नखलिस्तान नही..  
मेरा अपना ही घर है...

***



(फोटो: उत्तरकाशी के एक गाँव की, पहाड़ के दुसरे बहुत से गाँवों की तरह,  साभार जयप्रकाश पवांर)

5 comments:

  1. गहरे चित्र बनाती जाती है कविता

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  2. रचना पढने पर सभी चित्र सजीव हो उठते हैं...और मन मचलने लगता है उन्हीं वादियों में जाने के लिए....

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  3. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच

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  4. खोयी, अनजानी जगहों पर गुमनाम रहना अच्छा है या नक्शे पर जाने पहचाने महानगर या उससे कुछ छोटे जिला शहर में? कवि मन को लगता है कि पहाड़ों के ऊपर बहुत दूर खोयी जगह में कैसी शान्ति होगी जो कहीं अन्य नहीं मिलेगी, वहाँ रहना कितना सुन्दर होगा. फ़िर घुटने के दर्द के दर्द का सोचो और १८ किलोमीटर नीचे एसप्रिन की गोली के लिए यात्रा की सोचो तो अचानक पहाड़ों का रोमानी सपना क्यों उतना रोमानी नहीं लगता?

    आप बहुत सुन्दर लिखती हैं सुषमा जी.

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