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Jul 2, 2011

धूप


           

पतझड़ के बाद
शहर हुआ है सलेटी
सियाह
रंग रोशनी से महरूम
आह, कितना उदास
महीनों महीनों…

इस शहर सरीखे कई शहर
समयकाल से परे
सूरज की आस
धूप के ख्वाब में ऊंघते हैं
महीनों महीनों...

बारिश, बर्फ़,और धुंध के बीच
जो खिली आती है चटक धूप कभी
कनपटियाँ तपती
खिल उठती रूह
धूप का नाम होता
खुशी
हंसी
उम्मीद...
***

4 comments:

  1. ... और इसी
    खुशी
    हंसी
    उम्मीद.....
    में हमारी ज़िन्दगी कटती जाती है।

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  2. बारिश.. बारिश.. और धुंध के बीच
    खिल आती है चटक धूप भी कभी
    धूप का नाम है
    खुशी
    हंसी
    उम्मीद.....

    बहुत सुन्दर ..उम्मीद ही जीने की प्रेरणा देती है

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  3. अच्छे प्रतीक-भावों से युक्त एक अप्रतिम कृति..हार्दिक बधाई सम्मानिया स्वप्नदर्शी जी !

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  4. सुन्दर रचना

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