सांत्वना और प्रार्थना में साथ-साथ
बुद्ध की शरण में लौटती रही
निर्वाण के लिए नहीं
निर्वाण के लिए नहीं
जीवन से ही है मोह भरपूर
अहिंसा की चाह नहीं
अहिंसा की चाह नहीं
भीतर बस ज़रा सी ही सहेजी हिंसा
चौतरफा बाहर फ़ैली रही जो
यथाशक्ति किया उसका प्रतिकार
कभी चुपचाप दूसरी दिशा चली
अंधकूप में आत्मा बिलबिलाती रही
ठस हुयी संवेदना
समतल हुआ भाव संसार
ख़्वाब जाने किस अरगनी टांकती
ख़्वाब जाने किस अरगनी टांकती
निस्संग बनी नीलतारा बुद्धत्व में लौटती रही..
हे बुद्ध! बीतें, बिखरे हैं ढाई हज़ार साल
खत्म हुयीं सभ्यतायें
बिसरा गयीं बोलीयां
लोप गयीं भाषायें
बीतें पूरब-पश्चिम के रेनेसां
दर्ज हुये अनगिनत युद्धों के काले दस्तखत
रक्त की नदियों के बीचों-बीच फहराए गए शांति परचम
जिजीविषा की हज़ार कथाओं के बीच
तुम्हारी कथा में भटकती श्वेततारा
बुद्धत्व में लौटती रही..
सामने हैं बहुत सी काली दीवारें
उनके आरपार देखना असंभव
उदास है समय, व्यथा एकसार
नहीं बचा रहा कोई महाद्वीप, न कोई देश
नहीं बच सका कोई एक छुटका टापू ही
सब जगह बिखरे हैं बुद्ध के भग्नावशेष
जिन्हें टटोलती हरिततारा
बुद्धत्व में लौटती रही..
आगे हैं
अदेखी संभावनायें
असुनी विपदायें
ख्वाबों-ख्यालों में विचरती रही
कि क्या सचमुच कभी
रेत के महल सरीखे सब प्रपंच ढहे जायेगें
होंगे हम निष्पाप, बेपर्दा
होंगे हम निष्पाप, बेपर्दा
आत्मा तक पारदर्शी
नमक की डली सरीखे घुले जायेंगे
पराजय..
अपमान..
डर..
दंभ..
क्षुद्रता के सब दंश
निर्विकार होगा मन
समूचे हम मुक्त होंगे
समूची होगी सभ्यता..
सांत्वना और प्रार्थना में साथ-साथ
छाती में जब तब गिलहरी सी कूदती-फांदती
बची रह गयी तारा बार-बार बुद्धत्व में लौटती रही...
***
बहुत गहन रचना ..
ReplyDeleteअद्भुत .....विशेषकर
ReplyDeleteभीतर बस ज़रा सी ही सहेजी हिंसा
चौतरफा बाहर फ़ैली रही जो
यथाशक्ति किया उसका प्रतिकार
कभी चुपचाप दूसरी दिशा चली
अंधकूप में आत्मा बिलबिलाती रही
ठस हुयी संवेदना
नमस्कार
ReplyDeleteमैं पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ , और सच कहू बहुत अच्छा लगा, आपकी इस कविता में जो यथार्थ है और उसकी संवेदना आपने जिस प्रकार अपने शब्दों में जाहिर की है , वो सच में कबीले त्तारीफ़ है . बुद्धत्व अब बहुत ही जरुरी है .
धन्यवाद.
बधाई !!
आभार
विजय
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कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html
एकदम से अलग सी कविता.
ReplyDeleteघुघूती बासूती
hindizen.com said...
ReplyDeleteनयी पोस्ट कहाँ गयी!? मैंने उसपर यह कमेन्ट करने का प्रयास किया था:
बहुत सुन्दर कविता! आज सुबह की सबसे बढ़िया अनुभूति!
तिब्बती बौद्ध धर्म में श्वेत तारा और हरिता तारा देवियाँ हैं न?.
bahut sundar sarthak rachna...
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