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Jan 17, 2011

साझेदारियां

परिधि पर खड़ी हूं मैं
तुम भी थे दोस्त यंही कहीं
कभी कुछ दूर, कभी दूसरी दिशा में
अपने माईक्रोकॉस्म के अँधेरे में उतरते
प्रकृति के इस सूत्र पर रीझते
व्यवस्था के उस खेल पर खीझते
भूले खुद को जाने क्या कुछ खोजेते
आपाधापी में कब होता है कि
लिखते एक तसल्ली भरा पत्र
पूरी करते आधी छूटी कविता
कुछ दिन रहते सुरज की संगत में
नहीं कहते खिन्न बेसऊर बातें
नहीं रखते ज़ख्मो को मुकुट के मानिंद

याद है पहली बार डी. एन. ए. की ट्यूब लिए
बावरा सा भागा था लड़का कोई
माईक्रोस्कोप से झांकती खुशी रंग बिरंगी
दो बर्नर्स के बीच सधे कठपुतली से हाथ
हौले से शुरू हुआ था कभी जो मीठी तान सा
अनवरत धमक में बदलने से पहले
कहाँ मालूम था
मन मगन नहीं नाचती कठपुतली कभी
नहीं होते स्वतंत्र वैज्ञानिक के हाथ भी