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Mar 24, 2011

समय हमारा-दो पाठ




ग्लोबल गाँव अब वर्चुअल संसार है 
सोशल नेटवर्किंग है...
ओलों सी बरसती है सामाजिकता
वैसे ही खत्म होती है कुछ देर बाद 
छोटे छोटे बुलबुलों के बीच बसे है
कई कई 'नेशंस विदाऊट बोर्डर्स' 
लोग बस इत्तेफाक से 
लालबत्ती पर खड़े ट्रेफिक से टकराते है
 बस ज़रा सी देर में निकल भी जाते है
सब तरफ चेहरे....नाम
और पहचान (बहुवचन) के जंगल है
वर्चुअल संसार में पनपती है 
बदलाव की उम्मीद 
इंटरनेट...विकीलीक्स...फेसबुक 
दिखते  नयी चेतना के औज़ार

रीयल वर्ल्ड में 
बिला जाता है सलौना ग्लोबल गाँव
दुनिया फिर बंटी रहती है कई हिस्सों में
खून की नदी बन बहता है पूरा रेगिस्तान 
बहरीन से लीबिया...इराक से अफगानिस्तान
वर्चुअल संसार में उठता है वीडियोगेम्स का रोमांच
ग्लोबल दुनिया में लड़ाई हर कहीं लोकल है 
अपनी अपनी अकेली लड़ाई में टूटता है प्रतिरोध
खत्म होती है हाशिए की अस्मिताएं
सूचना तंत्र के विस्फोट के साथ
पीछे छूटता जाता है रीयल वर्ल्ड
सिर्फ और सिर्फ मुनाफ़ा होता रहता है ग्लोबल 
  


Mar 12, 2011

तीन पुराने "प"


परवाज़
मन के ही
फड़फडाते है पंख पहले 
मन में  उभरती है 
पुरानी  इक इबारत 
"लुक अप एंड लिव "
मन ही गिरता है खाईयाँ  खाईयाँ  
उंचाईयों  में उठने से पहले 
परवाज़ बाद की बात है


प्रेम
ज़रा सी जगह में 
ज़रा सी  रोशनी में
बहुत बहुत नम किसी  कौने

क़िरमिज़ी किरणों का रंग लिए 
खिलते है कनेर के  फूल 
हवा में घुलता 
मिट्टी तक फैलता जाता है लाल रंग



प्रतीक्षा 
गुले सुर्खी  सी तेरी याद थी 
ओठों पर उग आयी काँटों की चुभन 
दिल अम्ल का रिसता झरना
गलती रही  इच्छाएं 


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Mar 10, 2011

दायें या बाएं

बेला नेगी की फिल्म "दायें या बाएं " बहुत दिनों से चर्चा सुनती रही हूँ. आज देखने का मौक़ा मिला.  शायद सपने और हकीक़त के बीच जितना फासला है, आदर्शवाद का जमीन में पटका जाना, उसकी निर्ममता, करुणा को बखूबी हास्य के पुट में पैक किया है, पर फिल्म का अंत बॉलीवुड के जाने पहचाने रस्ते से ही हुआ जिसने  कुछ हद तक फिल्म की मौलिकता को कोम्प्रोमाईज़ किया.
 
कहानी का लब्बोलुआब नायक के शहर से गाँव लौटने की, और गाँव में अपनी गुजर की संभावनाओं की तलाश की कोमेडी है. फिल्म में गाँव में पला बढ़ा और कुछ दिनों शहर में रहने के बाद गाँव लौटा लड़का नज़र नहीं आता. अपने घर लौटता कोई व्यक्ति  नहीं दिखता. जबकि उसका परिवार गाँव में रहता है. गाँव की इस दुनिया में कोई एलियन लौटा दिखता है.

पता नहीं क्या तो हुआ  अपने देखे भूगोल को पहचानने के बाद भी आत्मा बहुत जुडी नहीं.  किसी भी पुरुष  पात्र  की बॉडी लेंग्वेज में पहाडीपन नहीं है, गिर्दा जो इतने भरपूर थे अपनी भाव भंगिमाओं में, स्टेज पर और आम बातचीत में वो भी कहीं नज़र नहीं आते उस तरह से. भाषा में कुछ मीठापन हो सकता था, जो इतनी प्रचुर मात्रा में पहाड़ की भाषा में है. उसका रस भी नहीं है बहुत ज्यादा. पहाड़ का ग्रामीण जीवन जितना औरतों के इर्द गिर्द है, उसकी बहुत मार्मिक झलक नहीं दिखती. बेवजह बहुत सा समय बेरोजगार, लड़कों की चौपाल के आस-पास घूमता है, एक ही कोण में उसकी भी कोई अलग समझ उनके निकम्मेपन के अलावा बन नहीं पाती. शराब की घुसपैठ दिखती है, नहीं दिखता तो उससे नष्ट संसार, संभावनाएं, बच्चों और औरतों का त्रासदीपूर्ण जीवन. ये भी हास्यास्पद लगता है कि शराब इस तरह से स्वीकृत दिखती है कि कोई सवाल उठाता नही , बीबी झगडा नहीं करती. शहराती सी कुछ औरतें धूम्रपान के विरोध में प्रदर्शन करती दिखती है, जब कि धूम्रपान की ऐसी कोई उपस्थिति फिल्म में  नहीं है,   शराब का बहुत सशक्त विरोध का इतिहास रहा है पहाड़ में, वो भी बड़ी संख्या में ग्रामीण औरतों की भागीदारी वाला. तो पता नहीं ये लोगों की राजनैतिक चेतना पर फब्ती कसी गयी है या पहाड़ की महिलाओं के बिन  बात पर झंडा उठा लेने का बिम्ब है.. फिल्म में शायद विलन की, मौत के कुंएं की मौजूदगी भी कोई नए आयाम नही जोडती, शायद उसकी ज़रुरत भी नही थी.

गाँव के रेफ़रन्स में एक अनामी शहर है, सम्पूर्ण, संभावना भरा, समस्या विहीन, बिना नाम का. अच्छा होता नाम का एक कस्बा होता आस-पास, गाँव के बच्चे जो अल्मोड़ा, नैनीताल जैसे पर्यटक शहरों में पहुँचते है, उसकी कोई झलक होती, कि वहां भी क्या संभावनाएं है उनके लिए? किसके लिए है?. शहर और गाँव के बीच भरम की दीवार भी टूटती, जिसे कुछ हद तक गाँव के लोग पहचानते भी है. सारे पहाडी शहर एक मायने में एक जैसे है, जिनमे  सैलानियों के लिए  कुछ होटल, कुछ खाने की दुकाने, छोटा सा बाज़ार, एक केंट एरिया, दो तीन स्कूल और हर विभाग के सरकारी दफ्तर. गाँव से आये हाशिये की शिक्षा लिए नौजवानों के लिए रोज़गार की संभावना होटल, में नौकरी करने के अलावा कोई  दूसरी नहीं है. तो पलायन नज़दीक के शहर कसबे में नही, हमेशा से दिल्ली, बंबई, लाहोर से लेकर ढाका तक में पहाड़ से हुआ है, फौज में हुआ है.
  जीवन अपनी सम्पूर्णता में,  सीमित संभावनाओं में, बीहड़पन, सामाजिक संरचना में खुद इतना बड़ा विलेन है पहाडी गाँव के परिवेश में, कि सारी सद्दिच्छा के बाद भी एक अकेले व्यक्ति को शीर्षआसन करवाएगा, बार बार जमीन पर पटकेगा. रूप के स्तर पर पहाड़ का भूगोल, वेशभूषा, और प्रकृति के कुछ सीन सुहाने है, कथ्य बहुआयामी है पर  गहराई इसमें नहीं है.    

कला को किस तरह देखा जाय इसकी बहुत समझ मेरी है नहीं. एक आम दर्शक की तरह इतनी अपेक्षा जरूर रहती है कि कला सिर्फ सतह की झलकियाँ दिखाने के इतर कुछ परते खोलने का काम भी करे, उस बहुत कुछ को जो मन कि तहों में एक हलकी छाप सी बसती है, को मूर्त कर दे, अपने कुछ जाने पर अपह्चाने जीवन की, परिवेश की कुछ और पहचान बढ़ा दे.  जिन लोगों ने करीब से पहाड़ न देखा हो, उनके लिए ज़रूर कुछ नयी खिड़की खुलती होगी. मेरे लिए कुछ ऐसा रहा कि बड़ी आस में किसी मित्र से मिलने जाओ और दरवाजे पर ताला  देखकर वापस लौट आओ. कुछ निराशा हुयी फिल्म देखकर.