"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Apr 28, 2011

Women in Science

Biotechnology was still the future Buzz word in 1990 when I entered masters program in Biotechnology at MSU. Only 7-8 topmost Indian Universities offered this degree.  Like my fellow students I had some pride for being selected for DBT fellowship on the basis of All India Competitive examination. We were 8 girls in class of 14. Our senior as well as junior class had only three boys out of 14. Similar  ratios were common  in Chemistry and all other branches of life sciences in most  Universities across India. In research Institutions and Universities  representation of women graduate student who finished their Ph. D., published papers of equal merit were almost equal or more in comparison to male students. After two decades, that ratio of women majority is not reflected in Indian academia.

In India, there are less than 15% (sometimes less than 7%) women scientist employed in research institution and about 25% in Universities. I wonder where more than 50% of these bright girls have disappeared? Slowly, I came to know how gender discrimination played role in filtering out most women from science. There were many personal conversations with some male scientists who told me that women should not aspire for high achievements, should only work if they are unmarried, have a widowed mother, do not have a brother and so on. Some of my friends were told by a famous Vice Chancellor of a University that for a women working means extra pocket money and he will prefer to hire someone (a male) who is the provider for the family. I was personally reminded many times that women should have more tolerance.

Interestingly working hands of women scientists are prized as a graduate students, postdocs, technicians etc. (all short term positions) but their brain is not entrusted as much for leadership positions and permanent positions.

We looked at Western Society as a model of gender equality and hope. It’s been now 14 years since I am part of American Academia. There is again the same problem. the number of women postdocs and graduate students is not reflected in leadership positions.  Every now and then there is a gathering of women scientists ranging from graduate students to professors pondering on why women are in minority in science here as well? or how to survive and succeed in science? Typically, a successful Women professor narrates story of her struggle. The  end of the story is "I made through a route full of unfair deals, insults and negative attitudes,  so there is a light at the end of the tunnel".

I wonder what the meaning of these stories for young students is. If I have known those stories when I was 20, I may have embarked on path of secure and less struggling career. More than inspirations these stories give you blues, deprive you of hope and aspiration.  Academic achievements of women scientists should bring hope and sense of happiness to their life not a sense of martyrdom. Surprisingly no body talks about the structural changes that are  needed to make situation better for next generation. It is often a lesson given to individuals to cope with and continue.  Many successful model women scientist have successfully emulated the male behavior and have become one of the boys. I wonder if this is the idea of equality after all? 

Picture (source:Wikipedia): is of Nobel Laureate Barbara McClintock, who survived great difficulties, and excelled, often a great source of inspiration for all scientists).

Apr 24, 2011

टेक्सास: सेन अंतोनियो

सेन अंतोनियो शहर टेक्सास के बाकी शहरों से कुछ अलग है. बड़े शहरों के बीच  ख़ास पहचान और तकरीबन ३०० साल का इतिहास बचाए हुये भी. इतिहास की छवी और आधुनिकता सेन अंतोनियो नदी के  दोनों तरफ बड़े करीने से बसे   मनोहारी डाउनटाउन में साफ़ दिखते है. मुख्य आकर्षण  नदी के लेवल पर करीब ५ किलोमीटर (२.७ मील) सफ़ेद सैंड स्टोन की बनी हुयी वाकवे है जिसका विस्तार १३ मील तक करने की  योजना है. इस वाकवे के ऊपर सड़क, खूबसूरत इमारते, जीवन की बाकी चहल पहल है. मुश्किल से २० फीट चौड़ी नदी है यहाँ, उद्दगम के बहुत करीब, बाद में चौड़ी होती नदी अंतत: मेक्सिको की खाड़ी में मिलती है.  बहुत उथली हरे रंग के पानी से भरी साफ़ सुथरी. इतनी गर्मी, नमी के बीच भी पूरी तरह से मच्छर गायब, एक सुखद अहसास. नदी और उसके  ऊपर हर दो गज पर बनी वेनिशियन स्टायल की  पुलिया,  वेनिस  में होने का भ्रम कुछ पल के लिए देती है.  पूरे रस्ते पर बेला और चम्पा के फूलों की महक है, इधर उधर केले के पेड़, कुछ ट्रोपिकल दूसरे पोधे देखना कुछ अपनेपन से भरता है. कुछ बड़ी तरतीब से पूरे शहर में और नदी किनारे भी बहुत छोटे पाल्म के पेड़ है, दो फीट के, शायद खास तरह के लैंडस्केपिंग के लिए ब्रीड किये हुये, इस वक़्त फलों से भरपूर. ऊपर सड़क पर जितनी मारामारी है, नीचे वाकवे उतनी शांत है, नदी बहुत बहती नहीं दिखती पर मिलाजुला शोर पानी के बहने का पार्श्व में लगातार है, कुछ शायद फव्वारों और छोटे सजावटी  झरनों से पानी के गिरने की आवाज है.कुछ बतखें है... बीच बीच में पर्यटकों से भरी नाव गुजरती है बाकी हरे रंग का पानी शांत है.  रोहन ने मेरा ट्राईपोड   हथिया लिया है, और अपने कैमरे से कुछ शूटिंग उनकी चल रही है,  उसे पापा  के साथ आगे आगे भागना है. रवि को किसी पेड़ से गिरे कुछ फल मिल गए है, और पूरे रास्ते मिलते रहे. उसका काम उन्हें पानी में फेंक कर कुछ जलतरंग बनाना है, एक खेल करीब पौने घंटे तक उसे बहलाए है. चारो तरफ खिले फूल है. शाम धीरे धीरे उतर रही है...

अन्धेरा ढलते ही डाउनटाउन लगभग अपने पूरे शबाब पर है, रोशनी की झिलमिल से नदी भरी है, अब वो दिनवाली हरी नदी नहीं है, कुछ और है, अँधेरे उजाले का कोई आकर्षक खेल..... 
कुछ ४५ मिनट  की नाव में घुमाई है, और एक के बाद एक  नाव इस वक्त नदी में घूम रही हैं. हम भी एक नाव में सवार है. लगातार माईक पर कुछ पोपुलर किस्म की चीज़े कंडक्टर बता रहा है. कुछ  रेस्तरां के आगे  अच्छे बैंड्स परफोर्म कर रहे है. एक  मीठा मेक्सिकन बैंड है, रेड इन्डियन संगीत की धुनें बजाता, बांसुरी की लम्बी मीठी तान....

सेन अंतोनियो शहर पर गहरी छाप जर्मन, इटालियन और मेक्सिको की है, और सबका कुछ मिलजुल असर कुछ हद तक इस इलाके को बाकी शहर से अलग करता है. नदी है, संगीत है रोशनी है, एक खूबसूरत सी दीवाली है. नदी की सैर के बाद  बच्चे आईसक्रीम खाना चाहते है, एक जलेतो शॉप बगल में है, लगभग बंद होने वाली है, दुकानदार हमारी अंग्रेज़ी के जबाब लगातार इटेलियन में देता है, हमारे वेनिस  में रहने का भ्रम बनाए रखता है. टूरिस्ट अट्रेक्शन के लिए संजोया गया  बहुत से कोनों में से एक कोना ये भी है बहुत बड़ी बदसूरत एकसार  दुनिया के बीच. एक भ्रम...

टेक्सास समय हमारे ओरेगन के समय से दो घंटे आगे है, इसी असर में सुबह तीन बजे नींद खुल गयी है. होटल डरुरी के पांचवी मंजिल की बालकोनी से दिखता नदी नगर अँधेरे के कैनवस पर जगमगा रहा है. लगभग शांत.   सारा शहर शांत, सारे बजते हुये आर्केस्ट्रा, चलती हुयी नावे सब सोने गयी. बीच में सड़क पर रह रह कर  कोई कार गुज़रती है. रात के इस पहर  छिटकती रोशनी की एक परत  नदी पर बिछी है. अभी अप्रैल की कुछ नर्म, गुनगुनी, आद्र, अलसाई, हवा है.  मन करता है इस शहर में उम्र बीत जाय, न भी बीते तो कुछ साल रहा जाय. बचपन और किशोरवय की बहुत सी रातें नैनीताल की झील और उसमे पड़ती रोशनी को देखते बीती थी. सन्नाटे, रोशनी और पानी का अजब ज़ादू, कितना पहचाना. सुबह हो गयी है, इमेल करते, कुछ पढ़ते हुये, और कम से कम एक बार नदी किनारे फिर पैदल घूमे की इच्छा सर उठाती है. बच्चे अपने पापा के साथ स्वीमिंग पुल जाना चाहते है, मुझे दो घंटे का वक़्त है. इस अलसुबह कोई दुकान नहीं खुली, कुर्सिया रेस्तरा  के भीतर और बाहर उल्टी पड़ी है, कोई नहीं है दूर दूर तक सुबह की शांती और कुछ वीरानापन है, कुछ वैसा ही जैसे किसी शादी के निपट जाने के बाद अगले दिन लड़की के माता पिता का घर पर होता होगा, या नैनीताल में कोलेज इलेक्शन के अगले दिन केम्पस में होता था. कुछ वैसा भी जैसे दीवाली की अगली सुबह छोटे पहाडी कस्बों में होता था, हमारे बचपन के दिनों में, घर नए सिरे से साफ़ करना, और पडौसी, मित्र परिचितों के घर के लिए प्रसाद की छोटी छोटी पोटली माँ  का सुबह बनाते रहना. और बाकी लोगों का देर तक सोते रहना. सर पर घाम का चढ़ आना...

सड़क पर दुकाने है, ढ़ेर से म्यूजियम है, बहुत छोटी छोटी पर्यटक शहर की दुकाने है, खासकर मेक्सिको के बने क्राफ्ट से भरी. लगभग सब एक जैसी. एक दुकान के भीतर एक अधेड़ स्पेनिश औरत और उसकी किशोरवय की लड़की है, माँ सिर्फ स्पैनिश समझती है. कुछ बहुत ख़ास मिठास लिए माँ का चेहरा है, कुछ देर स्पैनिश में बोलती है. जबाब मैं दे नहीं सकती पर इतना समझ आता है कि सामान दिखा रही है. मुझे झल्लाहट अब  नहीं होती कि लोग मुझे मौक़ा दिए बगैर स्पैनिश में बोलना शुरू करते है,  अब इतने सालों में अपनी सूरत के  फरेब की मैं आदी हो गयी हूँ. शर्म आती है कि अब तक स्पैनिश नहीं सीखी. ख़ैर उसे कहती हूँ कि स्पैनिश नहीं आती, कुछ दो चार शब्द भर आते है. पर कुछ अपनापन सा बनता है, उससे कहती हूँ कि कुछ तस्वीर ले लूं उसकी दुकान की, इजाज़त मिलती है हंसी खुशी. बच्चों के लिए टी शर्ट और अपने लिए मेक्सिकन सिल्वर के झुमके खरीदकर उसकी दुकान से निकलती हूँ....

बाकी  दूसरे टूरिस्ट शहरों की तरह, सेन अन्तानियो  शहर के भी दो चेहरे है. टूरिस्ट के लिए शहर का एक चेहरा है, खूबसूरत, मौज से भरा, जिसके रस को आख़िरी घूँट तक पी लेना है,  एक ललचाता बाज़ार जहाँ  ज़ल्दबाजी है, कुछ लूट की तरह  खरीददारी करनी  है.  शहर के बाशिंदों के लिए दूसरा चेहरा, पर्यटक वाले चेहरे का विलोम. ये चेहरे नैनीताल, मसूरी, श्री रंगपट्टनम, वृन्दावन से लेकर नायग्रा फ़ॉल्स, और हर टूरिस्ट स्पोट पर लगातार दिखते है, पर्यटक भीड़ के चेहरे, और होटल के शीशे साफ़ करती, कमरे साफ़ करती, औरतों के चेहरे, दुकान के भीतर बैठे चेहरे, पूरी सर्विस कम्युनिटी  के चेहरे जिसपर ये पर्यटन उधोग टिका है.  इस विलोम पर कितनी दफ़े अटक जाती हूँ.  पर्यटक की मानसिकता जब कभी सर उठाती है, उसे दूर धकेलती हूँ.  बिना किसी लालच के, बिना लूट की मानसिकता के , इस शहर में घूमना है, इसे थोड़ा सा जानना है... थोड़ा अपने साथ बैठ लेना है....  

Apr 21, 2011

टेक्सास ट्रेवल

टेक्सास  १७वी स्टेट हुयी अमेरिका की जिसे कुछ नापने का मौक़ा मिला, जितना ८-१० दिन में हो सकता है . दूर दूर तक खुला समतल मैदान और वैसा ही सर के ऊपर आसमान भी. अच्छी सड़के, अनगिनत फ्लाईओवर्स एक के बाद एक, कितना लोहा, कितना सीमेंट लगातार. माने सभी बड़े अमरीकन शहरों के जैसा, और अब दुनिया के बहुत से दूसरे शहरों जैसा भी. शहर के भीतर और उसके बाहर जुड़े कई दूसरे शहरों तक लगातार गाड़ी में बैठे हाईवे में दिन गुजर सकते है, शायद  जीवन भी, घर बाज़ार और काम. सीमेंट का स्लेटीपन, जाने पहचाने एक जैसे दिखनेवाले छोटे बड़े बाज़ार, दुकाने, स्टोर्स, ...उनकी एकरसता, एक रंगरूप, हर शहर आपका पीछा करते है. ये साधारणपन, मॉस प्रोडक्शन का ख़्याल, और उसका इस तरह का विस्तार भीतर भीतर कुछ तोड़ता है. कहीं से कहीं जाना बेमतलब कर देता है. ग्लोबल लैंडस्केप अब हर शहर से उसका अपना कुछ जैसे छीन  लेता है, एक मायने में पहचान भी. बहुत सोचकर भी ऐसा कुछ दिखता नहीं है कि कहूँ कि ये ह्यूस्टन  शहर की याद है. होने को कितने ढ़ेर से म्यूजियम है, शायद बच्चों के साथ सबको देखना मुमकिन न होगा. एक बढ़िया एक्वेरीयम दिखा,  लिंडन जोनसन स्पेस सेंटर में एक दिन बीता, कुछ सपनों की कुछ देर को भरपाई, स्पेशशिप के भीतर जाने का अनुभव, नासा की घुमाई, मिसन कंट्रोल रूम की दिखाई.... नासा के केम्पस में बाहर से  सारी बिल्डिंग्स आम माचिस की डिब्बी वाली डिजायन की है. बहुत से बच्चों के खेलने वाले खेल अमूमन हर सायंस सेंटर में है.  नासा की ख़ास बात कुछ पुराने स्पेसशिप  एडवेंचर, सेटर्न, को रूबरू देख लेना,  छू लेना, और जी लेना कल्पना में ही सही उनकी एतिहासिक यात्राएं, और उपलब्धियां जो अभूतपूर्व है, मनुष्य जाति के लिए.


एडवेंचर के भीतर जाना कुछ समय के लिए ब्लेक एंड व्हाईट के जमाने वाले स्पार्क, केप्टन कर्क के स्टारट्रेक में जाने जैसा है. एक बीतगए की भावना फट से सर उठाती है. कुछ वैसे ही जैसे बीस पच्चीस साल के बाद मिला कोई बच्चा अचानक जवान होकर सामने आता है, और उस बचपने का जिसे हम पहचानते होते, कोई मेल नहीं बैठता. पर अपनी असमंजस के बीच भी स्मृति के जुड़े तार कुछ मन को भिगोते है. बचपन के दिनों में कोई एपीसोड स्टारट्रेक का मिस करने का मतलब बहुत कुछ छूट जाना होता..., उन दिनों अंग्रेजी बिलकुल समझ नहीं आती थी, कुछ पता नहीं रहता कि बात क्या हो रही है. पर बोलती फिल्म को मौन फिल्म की तरह देखकर कुछ कहानी बन जाती थी.

बाद के सालों में २००४ तक नियमित रूप से हर रात स्टारट्रेक-वोयाजर देखती रही.  स्टारट्रेक या फिर J. R. R. Tolkien  की लिखीThe Fellowship of the Ring, The Two Towers, and The Return of the King .जिसे उन्होंने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद लिखना शुरू किया था, को  कुछ हद तक सिम्बोलिक रूप में इस तरह भी देखा जाता रहा है कि यूरोप और एशिया के मुल्कों का समाजवाद अंतत: एकरूपता लाएगा, और  व्यक्ति के पास, सभ्यता के पास  भी गर्व करनेवाली जो  ख़ास बातें है वों ख़त्म हो जायेगी. न सिर्फ आज़ादी, और अभिव्यक्ति बल्कि रचनाशीलता भी, इतिहास भी...., सो स्टारट्रेक-वोएजर   इंडीविज्वलिज्म और कलेक्टिव (बोर्ग) की कभी ख़त्म न होने वाली लड़ाई का प्लाट है. एक ऑनस्क्रीन कोल्डवार. ये सब फिर बाद की बात हुयी. जिन दिनों या कि अब भी कभी स्टार ट्रेक देखने का मौक़ा मिला, तो उसे किसी दूसरे इमोशनल प्लेन पर देखने का मेरा आग्रह होगा, उसका मजा होगा. फिर जैसे टेक्नोलोजी डेटेड होगी, हमारी जानकारी में इजाफे होंगे, वोएजर भी बीती और बहुत पीछे छूटी बात होगा. कुछ वैसे ही जैसे २५-३० साल बाद भी याद रहता है कि बचपन के दिनों में ग्लूकोज बिस्किट का पैकेट और केरोमल की टॉफी ताउजी लाते थे. कोई दोस्त हॉस्टल के दिनों कितना मीठा गाना गाती थी.  ऐसी ही मिठास के साथ स्टार ट्रेक की याद रहेगी.

 स्टार ट्रेक से कुछ नयी डिस्कवरी नहीं होती थी, ज्यादातर ह्युमन इमोशनस  या बिहेवियर को एक दूसरे लैंडस्केप में देखना होता, अपने पहचाने परिवेश और समय के बाहर देखना होता. एक स्पेसशिप और जहाँ वों लैंड करता, घर का रास्ता ढूंढते हुये पूरे अन्तरिक्ष की टहल करता उसमे जीना होता.   घर लौटना सपने में होता, सच में रोज़ कहीं से कहीं निकलना होता... और बोर्ग के साथ मुठभेट होती जो सब कुछ एकरसता में समेट लेता, हर पहचान को रौंदता.  मेरे अपने जीने की तरह भी कुछ मायनों में. एक प्रवासी जीवन.

वोएजर की मैं कैथरीन या सेवेन आफ नाइन मैं न हुयी, पर लगता है बहुत करीब से बोर्ग से रोज़ सामना होता है, बोर्ग का नाम आज ग्लोबलाईजेशन है.....सब शहरों को,  भाषाओं को,  सभ्यताओं की विशेष पहचान को मिटाता ..... सब कुछ एकसार करता हुआ ...

Apr 8, 2011

अन्ना की इस पहल का समर्थन है... पर सपने कुछ बड़े हो इसकी कामना है

अन्ना की इस पहल का समर्थन है, और खुशी है कि लोग सामाजिक सरोकार के लिए घर दफ्तरों से निकल रहे है. जनतंत्र  बिना लोगो की भागीदारी के बेमतलब है. जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों को भी ये बताने की ज़रुरत है की जनता हम है, और तुम्हारा  दायित्व जनता के प्रति है. जनता के भाग्य विधाता तुम नहीं. अन्ना हजारे और उनके साथियों ने ये एक अच्छा बल्कि बहुत अच्छा काम किया है, लोगों को एक इशू पर गोलबंद किया है. सिर्फ एक बात को फोकस किया है. जैसा की दिखता है की लोकपाल बिल पास हो जाएगा, इसके भारतीय जनमानस में कुछ दूरगामी परिणाम होंगे. लोगों की सबसे पहले निराशा टूटेगी की हम कुछ नहीं कर सकते. और नयी पहलकदमी करने में लोग हिचकेंगे नही. सही तरह से जनतंत्र की ताकत को इस्तेमाल करने का सलीका हम सीखेंगे. ये भी सीखने की प्रक्रिया का ही हिस्सा है. ...

 लोकपाल बिल सिर्फ एक स्टेप है सही दिशा में. बाकी उसकी सीमा है, उससे हमारा समाज किसी बदलाव एकदम से जाने वाला नहीं है.  भ्रष्टाचार भी एकदम से नहीं जाने वाला. क़ानून और उस क़ानून का भी पालन इसी समाज में होना है, जाने पहचाने रास्तों से बहुत अलग नहीं होगा. परन्तु न्यायिक प्रक्रिया कुछ तेज़ी पकड़ेगी, और समय रहते कुछ हो सकेगा. सारी शर्ते मान ली जाय तो देश के कोष में कितना धन वापस आ सकता है, कितने की चोरी बच जायेगी.  पर ये हो सके इसके लिए भी लोगो को उस पर भी नज़र रखनी होगी. इस सीमा के साथ ही इस आंदोलन को देखना होगा.

बाकी मुझे कुछ आपत्ति भी है, जैसे कि भारत माता एक सम्भ्रांत हिन्दू जेवर और गहनों से भरी औरत है, अगर वाकई भारत का प्रतिनिधित्व ये औरत करती है तो फिर किसी भी आन्दोलन की ज़रुरत ही क्या है.  सब कुछ हंसी खुशी है, सपन्नता है. हालात ये है कि  स्वास्थ्य और शिक्षा और नागरिक अधिकारों में बहुसंख्यक औरते और बच्चे इस देश में सबसे निचले पायदान पर खड़े है. और उन सब लोगों के लिए जो इस देश में सबके लिए सामान अवसर और न्याय चाहते है.  भारत देश की भारत माता की तरह की  रोमानी कल्पना ये बताती है कि  ये  समझ कितनी अंधी गलियों की तरफ रूख कर सकती है, कितना सीमित इसका सपना है, कितनी सतही समझ है.  और कितने लोग इस भारत की कल्पना से बेदखल है. इन्ही बेदखल लोगों को भारत के नक़्शे के भीतर भरना है.  लाखों करोड़ों भारतीयों का चेहरा, जो सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार की मार सहते है, जिनके लिए कोई शिक्षा, कोई  सुविधा नही और जिनके हिस्से इस जनतंत्र में कुछ नहीं आया है.  अगर किसी भी जन जागृति से सबसे आख़िरी सीढ़ी पर खड़े, सबसे कमजोर मनुष्य को कोई उम्मीद नहीं नज़र आती तो उसका कोई मतलब नहीं है.  
भारत माता की जितनी भी बेटियाँ है, अधिकाँश इतने सुकून से नहीं है, हर जगह घर बाहर मारा मारी करती है, .,  सुरक्षित नहीं है, किसी को भी इस तरह प्रसन्नवदन आशीर्वाद देने की हालत में तो  बिलकुल नहीं है....
अन्ना के आन्दोलन को अपना समर्थन दे, परन्तु अपनी आपत्ति भी पहुंचाए...., 
इन मिलेजुले सपनों के धरातल को कुछ बड़ा बनाए...

Apr 7, 2011

फूल---------गोरख पांडे

 बसंत है, बहार है, और दुनिया भर में बदलाव के सपने सर उठाये हुए है, बोराये हुए है, गोरख पांडे की प्यारी सी कविता फूल शायद इन्ही दिनों के लिए लिखी है................


फूल हैं गोया मिट्टी के दिल हैं
धड़कते हुए
बादलों के ग़लीचों पे रंगीन बच्चे
मचलते हुए
प्यार के काँपते होंठ हैं
मौत पर खिलखिलाती हुई चम्पई
ज़िन्दगी
जो कभी मात खाए नहीं

और ख़ुशबू हैं
जिसको कोई बाँध पाये नहीं
ख़ूबसूरत हैं इतने
कि बरबस ही जीने की इच्छा जगा दें
कि दुनिया को और जीने लायक बनाने की
इच्छा जगा दें.

-------------गोरख पांडे 

Apr 1, 2011

इन्द्रधनुष के पीछे-पीछे

 Note: 14 Jun 2014:   आज अनुराधा नहीं रहीं, उनकी याद हमेशा रहेगी  .... 

२-३ सालों से अनुराधा का ब्लॉग बीच बीच में पढ़ती रही हूँ. उनसे पहचान ब्लॉग के जरिये ही हुयी, और पिछले साल दिल्ली में मुलाक़ात भी. तभी मुझे अनुराधा ने अपनी लिखी किताब  इन्द्रधनुष के पीछे-पीछे  भेंट की थी. दिन भर की भागदौड़ के बीच और एयरपोर्ट समय से पहुँचने के बीच कुछ घंटेभर से थोड़ा कम समय मैंने अनुराधा के घर पर बिताया.  छोटी सी मुलाक़ात में ये नहीं लगा की पहली बार मिलना हुआ. कभी भी फोन पर या इमेल पर भी अनुराधा का व्यवहार हमेशा बहुत इसी तरह रहा. आज सात महीनों के बाद एक सांस में बैठकर अनुराधा की किताब पढी. किताब की भाषा भी बेहद सरल तरल, बातचीत की भाषा है, किसी तरह का कोई खिलवाड़  उसमे नहीं है, पर जो जानकारी है, स्तन कैसर से उभरने की व्यक्तिगत यात्रा है, वो कई मायनों में सघन है, ज़रूरी है, और बहुत से लोगों के लिए संबल बनी रहेगी.
 जानकारी से अलग जो दो बाते बहुत ज़रूरी बाते सिर्फ केंसर मरीज़ के लिए ही नहीं बल्कि दुसरे कई मरीजों के लिए और यहाँ तक कि शारीरिक रूप से स्वस्थ परन्तु विपरीत परिस्थितियों से लड़ते किसी भी व्यक्ति का सबक है.  पहली बात अपनी आशा बनाए रखना, जितना भी हो सके अपनी कोशिश को नहीं छोड़ना, कम से कम ये जो जीवन मिला है उसका सम्मान करना. दूसरी बात ये कि परिवेश, परिजन और मित्र, इन सबकी भूमिका, किसी को मौत के पुल के इस पार खींच सकती है, और  अगर मरीज़ की खुशहाली वहां प्राथमिकता नहीं है तो कई बहुमूल्य जीवन ख़त्म हो जाते है. और इस मायने में हम सब जाने अनजाने एक दूसरे से जुड़े है, और जाने अनजाने कई दुसरे जीवन है हमारे साथ बंधे हुए. , विद्वान् न बने, बहुत अमीर न बने, पर अपने जीवन से जूझते हुए भी थोड़े से मनुष्य हम बने रहे.  इस किताब को तकनीकी जानकारी से ज्यादा हम सबके थोड़े से मनुष्य बने रहने में उर्वरक की तरह देखती हूँ.




इन्द्रधनुष के पीछे-पीछे

Author : आर. अनुराधा
Our Price$ 7.00 why is our price higer than the list price
ISBN8183610064
ISBN139788183610063
PublisherRadha Krishna Prakashan
Published In2007
BindingHardback