"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Nov 28, 2011

"जहाँ तेरे नक़्शे-कदम देखते है, खियाबां-खियाबां इरम देखते है"*


भले ही जियोलोजिकल टाइमस्केल में इंसान की उम्र एक ज़र्रे से भी कम हो, तब भी अपनी कामनाओं, दुश्चिंताओं और अचरज के मिश्रण में जीवन सान्द्र है, सघन है, विरोधाभासी भी.  पृथ्वी भी ऎसी ही है , विपरीत चीज़ों के बीच साम्य का भ्रम खड़ा करती. जैसे पहाड़ और दर्रे (canyons/gorges) बिलकुल एक सा वितान, एक सरीखे, जमीन दरकती है, दर्रे बनते है, और बचा रह गया प्लेट्यू पहाड़ का भ्रम.  फिर टूटते-दरकते पहाड़ लगातार नए दर्रे बनने का सबब बनते है. सबसे ऊँचे पहाड़ और सबसे गहरे दर्रे हिमालय में ही है, पर आम लोगों की पहुँच से बाहर, दुर्गम. बहुत छोटे-छोटे दर्रे मध्य हिमालय में सब तरफ बिखरे हुये, भुरभुरे, भूरे-सिलेटी,  हरे पहाड़ों के बीच, जिन्हें मैं ठीक से पहचानती हूँ. जिन्हें बचपन के और बाद के वर्षों में भी कुछ पैदल नापा है, एक पैर रखने की जगह में, दोनों हाथों से जपकाते हुये जाना है,. कई दफ़े भुरभुरी रेत हाथ में आयी है,. बचपन के दिनों में  दर्रों के बीच चमकती चट्टानों की खानों में चट्टानों को पठाल/स्लेट में ढलते देखा है, जिनसे पहाड़ी घरों की  छत और आँगन बनते.  इन्ही स्लेटों पर आँगन के एक कोने बैठे दादाजी को ज्योतिष गणना करते देखा है, और बड़े कारिज़ के मौकों पर  भोज में बैठे मित्र-संबंधी, बारात की पंगत भी. कोयले से इन पर आड़ी-तिरछी रेखाएं खींची हैं, गंदा करने पर डांट खायी है. उन भोले दिनों में मन के लैंडस्केप की बुनियाद भी ऊबड़-खाबाड़ ही पडी, चोटियों और खड्डों से भरी-भरी....


पिछले कुछ दिन कोलंबिया रिवर गोर्ज में बीते, जो अमेरिकी उत्तरपश्चिमी भूभाग का वो हिस्सा है जो आइसऐज़ के ख़त्म होने के बाद महाजलप्रलय के असर में बना है . आईसएज  के अंत में तेज़ी से पिघलते ग्लेशियर्स के कारण नदियों और झरनों में आयी बाढ़,  तीव्र रफ़्तार से बहते पानी ने ज़मीन का वृहद् हिस्सा दर्रों में तब्दील किया.  जो हिस्सा या तो सीधे पानी से बचा रहा या अपनी ख़ास संरचना के कारण पानी के दबाव को झेल सका वों क्लिफ्फ़ बन गया. जो बह/कट  गया, जो परते पानी में घुल गयी, उनकी जगह खड्ड/ दर्रे बनते रहे. ये प्रक्रिया कई बार हुयी  है. इसके अलावा, बदलते मौसम में बार बार चट्टानों के बीच रिसते पानी का बर्फ़ बनना, फिर पिघलना, फिर जमना, एक अनवरत प्रक्रिया भी चट्टानओं को तोडती है, धीरे-धीरे.  पानी, हवा, से हुये भूक्षरण, ज्वालामुखी और भूकंप से हुये  विध्वंस सबने लाखों-करोड़ों वर्षों में इस विहंगम लैंडस्केप को गढ़ा है. इसे देख कुछ देर आँखें फटी रहती है, मन हक बक होता है हर बार. धरती  अजब अनोखी, जाने किस किस रंग को समेटे है, ठीक ठीक कभी मौका बनेगा कि सतह भर को ही पूरा देख सकूंगी?
 
पहाड़ और दर्रे का साम्य, अजीब खेल करता है.  तेज़ हवा और बहुत तेज़ पानी की मिलीजुली आवाज़, हड्डियों को चीरती ठण्ड बीच हिमालय में कहीं होने का अहसास बनता है, कुछ ही देर को सही, मैं घर से बहुत दूर घर जैसी किसी जगह में पहुँच जाती हूँ. कोस-कोस पर झरने और दरों के बीच बहती नदियाँ. नोर्थवेस्ट की हिमालय से समरूपता यहां के पोधों में भी है; लंबे घने बाँज, फर, चीड, हेमलक, बिर्च, चिनार, और देवदार के सुदूर तक फैले जंगल. हालांकि ये सब अब प्लान्ड फोरेस्ट्री का फल है, प्रकृति की सीधी उपज नही है. न यहाँ, न बहुत से हिमालयी हिस्सों में. उन्नसवीं सदी के मध्य से यहाँ और हिमालय दोनों के नेटिव पेड़ों का भारी मात्रा में कटान हुया है. और जैव-विविधता का नुकसान भी. सिर्फ व्यवसायिक नज़रिए से ही यहाँ तेज़ी से बढ़ने वाले वृक्ष लगाए गए है. फिर भी अमरीका के इस छोर की एशिया के कुछ हिस्सों से समानता है. बहुत से चीन में पाए जाने वाले और हिमालयी पोधों के जीवाश्म (fossil), जॉन डे , ओरेगोन में मिलते है,, और अनुमान है कि ये फोसिल एक तरह से २५० मिलियन वर्षपूर्व  पैनेंजिया के अस्तित्व के महत्त्वपूर्ण प्रमाण है.

क्लाइमेट सामान होने से बहुत से हिमालयी पोधे यहां फलफूल रहे है. आज लंबे घने बाँज, फर, चीड, हेमलक, बिर्च, चिनार, भोजपत्र, और  देवदार के पेड़ों के बीच हिमालय की खुशबू तिरती है. पहली दफ़े जब २००८ में ओरेगोन आयी थी तो जगह जगह सड़क के किनारे, नदी के किनारे, और यहाँ तक कि घर के आँगन में भी हिमालयन ब्लेक बेरी के कंटीले झाड, हिसालू और जगह जगह बुरांश के पेड़ दिखे.  लूथर बरबैंक  ने ब्लेक बेरी के बीज भारत से मंगवाए थे और १८८५ में इसे अमेरिका में इंट्रोड्यूज किया था. आज ब्लेक बेरी , की खेती मुख्यत: ओरेगोन और कैलिफोर्निया के कुछ हिस्सों में होती है. ओरेगोन में दुनियाभर में सबसे ज्यादा  ब्लेक बेरी  उगायी जाती है (~ 56.1 million pounds on 7,000 acres in २००९). कई वर्षों की ब्रीडिंग से ब्लेक बेरी  की ढ़ेर सी उन्नत किस्में ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी ने डेवेलप की है. इसी तरह बुरांश के भी बहुत से रंग लगातार ब्रीडिंग का नतीज़ा हैं. हिमालय में सिर्फ २-३ रंग देखे थे, यहां लाल और सफ़ेद और पीले, नीले , बैंगनी हर शेड में बुरांश और अज़ेलिया के फूल दिखते है. 
नोर्थवेस्ट में रहते हुये बचपन के दिनों के घर की बहुत याद आती हैहालांकि अब घर यहीं है, और बचपन का घर अब अस्तित्व में भी नही है, फिर भी मन भागता है उसी की तलाश में. कितनी दूर जाकर भी कितने पीछे लौटा ले जाता है मन.
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*- ग़ालिब 

Nov 11, 2011

बहक

सुनहरी उकाब का एक पंख है
मिट्टी, बारिश, और धूप के रंग है इसमें
खुशबू सुदूर की
पंख है पैना
पंख है टूटा
गीली मिट्टी में बो दूं?
कि लहलहाती  सुनहरी एक झाड़ उग आये 
कि सचमुच ही उस पर बैठ कोई चिड़िया गाये...


Nov 5, 2011

सच और सपने के पार

दुनिया का तसव्वुर उतना ही बनता, जितनी बड़ी देखे की दुनिया होती, देखे-पहचाने लोगों से, चीज़ों से, पेड़-पोधों से,  कीड़े-मकोड़ों से, पंछियों-पशुओं  से... अनुभूती, हमें जाने पहचाने कोनों में, अपनी अपनी आत्म-गुफाओं के सुरक्षा के घेरे में बाँध लेती. मामूली होने से बचाती, उतना ही दुनिया का वितान होता सचमुच की दुनिया का, जिसको हेंडल करने की हमारी सामर्थ्य  होती है.

फिर इस देखे की दुनिया, जाने पहचाने के बीच दुनिया का सपना होता, जो हम सचमुच अपने लिए चाहते होते. जो पढ़ा होता, सुना होता है, तस्वीरों और फिल्मों  के मार्फ़त हमारे संज्ञान में आता. वो अंश-अंश के घालमेल, जागे में,  नींद में भी. सुनी बातें, लिखे शब्द, बुने हुये बिम्ब- सच से बहुत दूर, मायावी, परानुभूति  सपनों  की  ज़मीन बुनती...
बहुत कम लेकिन कभी ऐसा भी होता है कि सच से दूर,  कोई परानुभूती का अंश अपने साथ दृष्टी भी साथ लाता है. रोज आदत की तरह हमारे जीवन में सहजता से शुमार काम,  आस-पास  रोज देखे जाने वाली चीज़ों  के अपह्चाने सत्य कला उद्घाटित करती है.  अनायास ही किसी कैमरे की नज़र, किसी घनीभूत पीड़ा के स्वर , व्यक्त किसी की छटपटाहट हमें मानो फिर से खुद को मिला देती है. अदेखे की दुनिया ही हमारे लिए सपनों की समान्तर दुनिया बुनती, जिसमे हमारी देखी दुनिया से बहुत बड़ी एक दुनिया है, कई तरह के लोग है,  जितना हम जानते है उससे भी बहुत आगे हर तरह के भले बुरे, वीभत्स, डरे हुये भी. ये अजानापन ही हमें हमारे जाने हुये की ऊब से बचाता है, जानी-पहचानी यांत्रिक, अमानवीय, तंगनज़र की सीमा से हमें आज़ाद करता है. आशा की एक खिडकी खुली रखता है, मन कहता है, ये सब पीछे छूटा रह जाएगा, दुनिया बदल जायेगी एक दिन, इस कुएं से बाहर जायेंगे, खुली घास के मैदानों की तरफ, ऊँचे पहाड़ों और समन्दर की तरफ कितनी विशाल है पृथ्वी ....

सच और सपने के पार  फिर सूचना होती,  हमें भयभीत करते अंक होते, कि बड़ी बहुत बड़ी दुनिया के बीच, विराट, बहुमुखी भूगोल के बीच हम टिनहा खड़े है. कि अपने  ताप और सपनों की भाप में जलते, हाथ-पैर पटकते, घुटनों पर सर किये. इस बड़ी दुनिया के बीच क्या मोल उसका ?