Copyright © 2007-present by the blog author. All rights reserved. Reproduction including translations, Roman version /modification of any material is not allowed without prior permission. If you are interested in the blog material, please leave a note in the comment box of the blog post of your interest.
कृपया बिना अनुमति के इस ब्लॉग की सामग्री का इस्तेमाल किसी ब्लॉग, वेबसाइट या प्रिंट मे न करे . अनुमति के लिए सम्बंधित पोस्ट के कमेंट बॉक्स में टिप्पणी कर सकते हैं .

Jan 2, 2012

गिनती के दिन


चांदी सी चमकती रेत थी कहीं
एक नदी थी  नदी सी
एक नाव थी नाव सी
एक-दो-तीन
गिनती के दिन 
बाक़ी चौबीस दांतों के बीच  घिरे
दिन थे,  रात थी 
और हस्बेमामूल कहन थी... 
***

3 comments:

  1. सुंदर सी खूबसूरत कविता किसी विस्मृत सपने की चाँदी की छोटी-छोटी घंटियों सी मधुर लगती है..जो चौबीस दाँतो से घिरे होने पर भी कभी बरबस सपना याद मे आ जाने से रुनझुन बजने लगती हों..

    ReplyDelete
  2. सच कहा अपूर्व ने

    ReplyDelete

असभ्य भाषा व व्यक्तिगत आक्षेप करने वाली टिप्पणियाँ हटा दी जायेंगी।