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Feb 22, 2012

पुरानी कार

बारह बरस चलने के बाद
यूँ ही बस ज़रा सी देर में
हमेशा के लिए बैठ गयी है अब पुरानी कार

जब नयी थी, पहाड़ी रस्ते पर
बिन आवाज चलती चली गयी
बरस-दर-बरस
जैसे बिन  सांस फूले
बिन शिकायत
कई दिन चलते, चढ़ते, उतरते रहे हम भी

आधा ऑफिस, आधा घर थी कार
कभी बियावान में एक तम्बू 
अकसर एक खिड़की
जिससे दिन झांकता
रात उतरती 
वो आवारगी के साल थे
संगी थी पुरानी कार ....


 

   

5 comments:

  1. आधा ऑफिस, आधा घर थी कार
    कभी बियावान में एक तम्बू
    अकसर एक खिड़की
    जिससे दिन झांकता
    रात उतरती
    वो आवारगी के साल थे
    संगी थी पुरानी कार ....
    ...bahut hi sundar...beete dinon ki sundar baangi..
    Holi ki hardik shubhkamnayen!!

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  2. bahut sundar kavita hai aapki.likhna to main chahataa hoon par shayad apne talent se limited hoon. aataa rahoongaa aur haan aapki kitab bhi order zaroor karoonga....www.aahang.wordpress.com

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  3. This comment has been removed by a blog administrator.

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  4. @ rajneesh, aapka shukriya! likhte likhte hii ham sab likhnaa seekh jaayenge kisii din...

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