"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Mar 18, 2012

कथा सिर्फ कहवैया की गुनने की सीमा है


लालसा के गर्भ से
पहले पहल जन्म लेगा विष ही
अमृत मंथन की संतान
अमृतघट का पता कहीं नहीं 
हलाहल सबके भाग
खोजी के लिए जरूरी है कोशिश, काफी नहीं
बाहर निकलने से पहले
बाहर निकलने के बाद भी 
फिर फिर दौड़ते रहना 
भीतर-भीतर
भीतर-बाहर
बाहर-भीतर
भटकन के लिए जरूरी है बाहरी भूगोल, पर्याप्त नहीं
कि पर्यटन अन्वेक्षण का पर्याय नहीं
 
प्रेम में आकुलाहट होगी
सदाशयता का खुलता दरवाजा
और विदा में हिलता हाथ भी
प्रेम में होना आत्महंता होना है
ईर्ष्या बस आत्मावलोकन की भूलभुलया
कि प्रायोजित समाज, साहित्य-कला
और तमाम झंझटों के बीचों बीच
अब भी प्रायोजित किया जाना बाक़ी है -प्रेम
कि प्रेमी पिंजरे में रहते नहीं
अनहोनियों के जंगल में 
वटवृक्ष की कतर-ब्यौंत नहीं होती

जीवन में उलट है पाठ्यक्रम
नहीं है सीधी नीतिकथा 
धूसर स्मृति और उबड़खाबड़ जीवन के बीच
फिर एकबार
अंत के मुहाने बैठा है आरम्भ
फिर एकबार
हरे की इच्छा से तर है आत्मा का कैनवस
कल नया दिन होगा
नयी रोशनी होगी
कि काल की गति नहीं रूकती
कहानी कहीं ख़त्म नहीं होती
कथा सिर्फ कहवैया की गुनने की सीमा है
जीवन का महाआख्यान नहीं.....
***

6 comments:

  1. जीवन का महा आख्यान तो सिर्फ मौत के ही साथ आता है पर तब भी काल की गति नहीं रूकती ... गहन अभिव्यक्ति है ...

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  2. shabdon ka bejod mel hai... khubsurat abhivyakti ke sath ek behtareen kavita kah sakta hun...

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  3. कई पंक्तियां तो सूक्तियों की तरह हैं इस कविता में। मसलन प्रेम में होना आत्महंता होना है और इसीलिए इसे प्रायोजित किया जाना मुमकिन भी नहीं है अभी तक।

    और आपसे मुलाकात होते-होते रह गई। अंतिका प्रकाशन पर पता चला, आप आई थीं।

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  4. @धीरेश कुछ इत्तफाकन कहीं से कहीं के रास्ते २-३ दिन दिल्ली के पुष्तक मेले का संयोग बना. इसी बहाने कुछ हिंदी की किताबें खरीद लायी, हिंदी साहित्यक समाज की हलकी सी एक झलक मिली.

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