लालसा के गर्भ से
पहले पहल जन्म लेगा विष ही
अमृत मंथन की संतान
अमृतघट का पता कहीं नहीं
हलाहल सबके भाग
खोजी के लिए जरूरी है कोशिश, काफी नहीं
बाहर निकलने से पहले
बाहर निकलने के बाद भी
फिर फिर दौड़ते रहना
भीतर-भीतर
भीतर-बाहर
बाहर-भीतर
भटकन के लिए जरूरी है बाहरी भूगोल, पर्याप्त नहीं
कि पर्यटन अन्वेक्षण का पर्याय नहीं
प्रेम में आकुलाहट होगी
सदाशयता का खुलता दरवाजा
और विदा में हिलता हाथ भी
प्रेम में होना आत्महंता होना है
ईर्ष्या बस आत्मावलोकन की भूलभुलया
कि प्रायोजित समाज, साहित्य-कला
और तमाम झंझटों के बीचों बीच
अब भी प्रायोजित किया जाना बाक़ी है -प्रेम
कि प्रेमी पिंजरे में रहते नहीं
अनहोनियों के जंगल में
वटवृक्ष की कतर-ब्यौंत नहीं होती
जीवन में उलट है पाठ्यक्रम
नहीं है सीधी नीतिकथा
धूसर स्मृति और उबड़खाबड़ जीवन के बीच
फिर एकबार
अंत के मुहाने बैठा है आरम्भ
फिर एकबार
हरे की इच्छा से तर है आत्मा का कैनवस
कल नया दिन होगा
नयी रोशनी होगी
कि काल की गति नहीं रूकती
कहानी कहीं ख़त्म नहीं होती
कथा सिर्फ कहवैया की गुनने की सीमा है
जीवन का महाआख्यान नहीं.....
***

bahut sunder abhivyakti
ReplyDeleteगहन भाव
ReplyDeleteजीवन का महा आख्यान तो सिर्फ मौत के ही साथ आता है पर तब भी काल की गति नहीं रूकती ... गहन अभिव्यक्ति है ...
ReplyDeleteshabdon ka bejod mel hai... khubsurat abhivyakti ke sath ek behtareen kavita kah sakta hun...
ReplyDeleteकई पंक्तियां तो सूक्तियों की तरह हैं इस कविता में। मसलन प्रेम में होना आत्महंता होना है और इसीलिए इसे प्रायोजित किया जाना मुमकिन भी नहीं है अभी तक।
ReplyDeleteऔर आपसे मुलाकात होते-होते रह गई। अंतिका प्रकाशन पर पता चला, आप आई थीं।
@धीरेश कुछ इत्तफाकन कहीं से कहीं के रास्ते २-३ दिन दिल्ली के पुष्तक मेले का संयोग बना. इसी बहाने कुछ हिंदी की किताबें खरीद लायी, हिंदी साहित्यक समाज की हलकी सी एक झलक मिली.
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