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Mar 18, 2012

कथा सिर्फ कहवैया की गुनने की सीमा है


लालसा के गर्भ से
पहले पहल जन्म लेगा विष ही
अमृत मंथन की संतान
अमृतघट का पता कहीं नहीं 
हलाहल सबके भाग
खोजी के लिए जरूरी है कोशिश, काफी नहीं
बाहर निकलने से पहले
बाहर निकलने के बाद भी 
फिर फिर दौड़ते रहना 
भीतर-भीतर
भीतर-बाहर
बाहर-भीतर
भटकन के लिए जरूरी है बाहरी भूगोल, पर्याप्त नहीं
कि पर्यटन अन्वेक्षण का पर्याय नहीं
 
प्रेम में आकुलाहट होगी
सदाशयता का खुलता दरवाजा
और विदा में हिलता हाथ भी
प्रेम में होना आत्महंता होना है
ईर्ष्या बस आत्मावलोकन की भूल-भुल्लैया
कि प्रायोजित समाज, साहित्य-कला
और तमाम झंझटों के बीचों बीच
अब भी प्रायोजित किया जाना बाक़ी है -प्रेम
कि प्रेमी पिंजरे में रहते नहीं
अनहोनियों के जंगल में 
वटवृक्ष की कतर-ब्यौंत नहीं होती

जीवन में उलट है पाठ्यक्रम
नहीं है सीधी नीतिकथा 
धूसर स्मृति और उबड़खाबड़ जीवन के बीच
फिर एकबार
अंत के मुहाने बैठा है आरम्भ
फिर एकबार
हरे की इच्छा से तर है आत्मा का कैनवस
कल नया दिन होगा
नयी रोशनी होगी
कि काल की गति नहीं रूकती
कहानी कहीं ख़त्म नहीं होती
कथा सिर्फ कहवैया की गुनने की सीमा है
जीवन का महाआख्यान नहीं.....
***