"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Jul 20, 2012

विनयर्ड्स & वाइन-मेकरस

"है यह बरसात वह मौसम , कि 'अज़ब क्या है, अगर
  मौज-ए-हस्ती को करे फैज़-ए-हवा, मौज-ए-शराब "
---मिर्ज़ा ग़ालिब  


ग्रेप जेनोमिक्स की मीटिंग के आखिरी दिन दो विनयर्ड्स  में जाने का मौका मिला. अभी ऑरेगन में एक तरह से गरमी शुरू ही हुयी है, और अंगूर की बेले फूलों से लदी हुयी हैं, इसके मुकाबिले यूरोप के अधिकतर विनयर्ड्स  में अंगूर के झुम्पे लदे होंगे, और जल्द ही उनके हारवेस्ट की तैयारी होगी. इन दोनों विनयर्ड्स में तरतीब से लगी  अंगूर की झाड़ियाँ मीलों मील फैली हैं, जिनके चारों तरफ खाली जगह, उसके बाद घने डगलसफर, रेडवूड, चिनार और चीड़ के पेड़ और उसके पार हरी पहाड़ियां. कुल मिलाकर एकान्तिक मनोरम लैंडस्केप. मैंने चूँकि विनयर्ड्स अमेरिका में ही देखे तो इसी तरह का साम्य मुझे ईस्ट कोस्ट के विनयर्ड्स में भी दिखता रहा है.  मेरे यूरोपीय मित्रों ने इस तरह के खुले, बहुत बड़े विनयर्ड्स नहीं देखे थे, और खासकर विनयर्ड्स के चारों तरफ वुडेड फोरेस्ट उनके लिए रूमानी बना.  उनके अनुसार यूरोप के अधिकतर विनयर्ड्स आपस में सटे हुये है, और अपेक्षाकृत बहुत छोटे हैं.  

इन्ही विनयर्ड्स के भीतर एक या अधिक इमारतें हैं, जहाँ वाइन बनती है, उसकी एजिंग होती है, फिर उसे पैक कर बाज़ार में भेजा जाता है. एक छोटे से कमरे में एक सेल काउंटर भी होता है, जहाँ से लोग अपनी पसंदीदा वाइन खरीद सकतें हैं. कमोबश हर वाइनरी साल में कई दफ़े पर्यटकों के लिए या विधार्थियों के  टूर करवाती है, जिसका अंत फिर कई तरह की वाइन टेस्टिंग के साथ होता है.  इसी तरह  सेब, नाशपाती, स्ट्राबेरी, और दूसरे बेरी के बगीचों के टूर भी अमरीका में आमचलन में हैं, जहाँ आप  भरपूर फल मुफ्त खा सकतें हैं, अलग-अलग वेरायटी चख सकतें हैं,  अधखाया फेंक सकतें हैं,  सिर्फ जितना अपने साथ ले जाना चाहे वही खरीदना पड़ता हैं. यही हाल ट्यूलिप के खेतों का हैं, लोग घूम फिर सकतें हैं, बच्चे मेले का आनंद  पा सकतें हैं, और फार्म की आमदनी फल-फूल के अलावा पाकिंग की कीमत, खान-पान, आइसक्रीम, और साज सामान के सामान की बिक्री से होती है. 
Oak barrels used for the aging of wine

चूँकि वाइन में अल्कोहल की मात्रा ३-१२.५% तक ही होती है, इसीलिए वाइन ड्रिंकिंग यूरोप और अमेरिका में नशे के लिए नहीं बल्कि मुख्यत: स्वाद के लिए, नेटवर्किंग या फिर सोशलाइजिंग के लिए है. इसीलिए वाइन में स्वाद, महक, और टेक्सचर प्रमुख है,  जो उसमें मौजूद अम्ल और सुगर के  अनुपात, फिनोलिक कंपाउन्ड्स की उपस्थिति से तय होती है,   और इसी तरह प्राकृतिक रंगत भी विशेष महत्त्व रखती हैं. वाइन मकिंग की प्रक्रिया में अंगूर के रस  में सबसे पहले यीस्ट मिलाया जाता है जो फर्मन्टेशन की प्रक्रिया के दौरान रस में मौजूद सुगर को एथेनॉल में बदल देता है, परन्तु १८% तक अल्कोहल की सांद्रता ही इस प्रक्रिया से प्राप्त की जाती है, बाक़ी सुगर बची रहती है, और स्वाद को प्रभावित करती है. सुगर की मात्रा अगर बहुत अधिक है तो वाइन की गुणवत्ता कम हो जाती है. इसके लिए अलग-अलग प्रजाति के अंगूर विशेष तरह की वाइन बनाने के लिए इस्तेमाल होते हैं. इसके साथ ही अपने अनुभव से वाइन मेकर सीखते जातें है कि पकने की किस स्टेज में अंगूर तोड़े जायें ताकि उनके मनमाफिक उत्पाद बन सके. फर्मेंटेशन की प्रक्रिया कुछ ही दिन की होती है, इसके बाद इसे बाँझ की लकड़ी के बने बड़े पीपों में भर दिया जाता है, और दो या अधिक वर्षों तक वाइन की एजिंग होती है, जिसमें फ्लेवर, महक और स्वाद, रंग और टेक्चर धीरे-धीरे विकसित होता है. लगभग हर वाइनरी के अपने सीक्रेट होते हैं, जो उनकी वाइन को ख़ास बनाते हैं.

इन दोनों वाइनरी में मुख्य वाइन मेकर औरतें ही थी. पहली वाइन मेकर की शिक्षा गणित और कम्प्यूटर की थी, सो उसका पूरा ध्यान इस बात पर था कि वाइन मेकिंग की प्रक्रिया को अब्सोल्युट गणितीय प्रक्रिया और प्रेडिक्टेबल कैसे बनाया जाय. दूसरी वाइनरी के लोग अपने यीस्ट के स्ट्रेन को लेकर ज्यादा सावधान थे, और बायोटेक की तकनीकी पी.सी.आर का इस्तेमाल माइक्रोब्स की शिनाख्त के लिए कर रहे हैं. शायद पी.सी.आर वाली ये दुनिया में पहली (अगर अकेली नहीं तो) वाइनरी होगी.

अपने अपने देशों के वाइन मेकिंग के अनुभव लोग सुनाते रहे, और वाइन टेस्टिंग के दौरान वाइन को कैसे परखा जाय और खासकर यूरोपीयन वाइन के बरख्स यहां की वाइन कहाँ स्टैंड करती है, को जानना रोचक रहा.  मुझसे भारत की वाइन के बारे में पूछा तो मेरी  मेरी अपनी परवरिश से इस तरह की कोई शिक्षा मेरे हिस्से नहीं आयी थी. एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने कुछ महीने केरल प्रवास  के समय ताड़ी पी थी, वही देर तक ताड़ी के बारे में और किंगफिशर के बारे में बताता रहा...

Jul 9, 2012

कथा में क्या चाहिए?

कला यथार्थ, और स्मृति को ही समग्र तरीके से समझने-गुनने उसके अंडर प्रोजेक्शन और ओवर प्रोजेक्शन का टूल है, जो यथार्थ को जड़ नहीं बने रहने देती, उससे पार पाने का सपना और संभावनाओं की खोज करती है, और उनका सृजन भी.   अकेले व्यक्ति के कुछ हद तक पूर्णता तक पहुँचने,  अनवरत का साध्य भर... 
 

 हालाँकि कहानी के सच होने का दावा कोई लेखक नहीं करता. पर कथाएँ विलक्षण रूप से जीवन के सच को उजागर करती हैं,  न देखे हुये,  न भोगे हुये दुःख-सुख को पाठक के जीवन का हिस्सा बना देती हैं, न देखी जगहों और न विचरे भूगोल के साथ अपनापा स्थापित करती हैं.  किसी दुसरे लोक, किसी दुसरे भूगोल,  किसी दूसरी जमीन में बसे  किरदार  बहुत-बहुत अलहदा होते हुये भी मनुष्य की तरह किसी साझी जमीन पर मिलते हैं.  पढ़ने वाले के मन में ही कल्पना, संवेदना, स्मृति और आशा के मिलेजुले रसायन की नदी बहती है जिसमें तैर कर पाठक किताब के भीतर एंट्री लेता है, और  अजानी दुनिया को एक्सप्लोर करता है.  और जब लौटता है तो अपना एक हिस्सा वहां छोड़ आता है, किताब का कुछ हिस्सा अपने भीतर सहेजकर लौटता है.  ऐसे ही कोई दोस्तोवस्की, ओसिमोव, चेखव, टॉलस्टाय, मार्खेज, टैगोर, ओस्त्रोवस्की, प्रेमचंद, रेणु, राँगेव राधव, विलियम सरोवन, पामुक के किरदार याद रहते हैं.      

कहानी से क्या चाहिए ?  कोई बनी बनायी अपेक्षा शायद नहीं रहती,  मैं किसी नए की उम्मीद में, अपने रूटीन से एस्केप के लिए  किताब की तरफ जाती हूँ. उन भूगोलों में टहलने जहाँ जाना सचमुच में संभव न रहा हो, उन नामों को सुनने जिनका सही उच्चारण न पता हो, अपने अंतरंग से बाहर किसी दुसरे अंतरंग स्पेस में किसी दुसरे समय में, किसी और टीस में.  और जब लौटी हूँ तो तो  दुःख और सुख में नहायी,  अपने जीवन और परिवेश  को किसी  नयी  नज़र से देखती, कई दिनों और कई सालों तक कुछ नशे में रहती, अच्छी कहानियां और उपन्यास यही करते हैं .

लेकिन फिर अच्छी कहानी को अपने सन्दर्भ, भूगोल में गहरे धंसा होना होता है, भले ही वो आज से दो हज़ार साल आगे की हो या पीछे की, तब भी जब किसी ऎसी जगह की हो, जो है ही नहीं, लेकिन ये दुनिया लेखक की अपनी होती है, या जिसे वो मन प्राण से समझता है, 


कहानी के लिए चैलेन्ज हमेशा कहन का और मौलिक कंटेंट का ही रहेगा.   कहानी यदि  सिर्फ इमिटेशन, और उथली कल्पना के ही सहारे खड़ी  है, तब कहानी का झूठ, जीवन के झूठ से ज्यादा आसानी से पकड़ में आ जाता है. 

और यदि कहानी कल्पनाशून्य हो, यथार्थ का एकहरा, उथला सिलसिलेवार किस्सा तब जुगुप्सा और फ्रस्टेशन के अलावा कुछ नया नहीं करती, कुछ नया अनुभव, ख़ुशी  पाठक के हिस्से नहीं आते. उसका समय नष्ट होता है.
.....

(खुद से एक वार्तालाप, कुछ नयी कहानियाँ पढ़ते हुये, और पुरानी कहानियों को याद करते हुये ... )