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Mar 31, 2013

जाग नगर का राग -न्यूयॉर्क 02

 मारिया से कुछ बात करते मेट्रो में बैठी, मारिया कोलंबिया युनिवर्सिटी के स्टॉप पर उतर गयी, मुझे अभी अपटाउन के लगभग आखिरी छोर पर जाना हैं,  सिलसिलेवार तरीके से पहले ओर्थोडोक्स यहूदी, फिर आज हरे रंग में  'सेंट पैट्रिक डे' मनाते आयरिश, फिर हिस्पैनिक, और काले चेहरे मेट्रो में चढ़ते -उतरते हैं, अंदाज़ लगती हूँ कि किस इलाके में किस तरह के लोगों का बाहुल्य है.  मेरे ठीक बगल में एक डोमेनिकन बूढा खड़ा है, जिसके आगे के तीन दांत टूटे हैं, और ऑलमोस्ट बहुत पुराने, लगभग फट चुके कपड़ों में खड़ा है, उसके मुँह  से किसी सस्ती शराब की दुर्गन्ध आती है, लेकिन अपने व्यवहार में संजीदा है.  मेट्रो से उतर कर सड़क पर तिरपाल के तम्बू के नीचे सब्जियों के वैसे ही ठेले दिखते हैं,  एक बार को लगता है शायद करोल बाग़ या देहरादून सी कोई जगह है.  सड़क पर सिर्फ हिस्पैनिक और काले लोग. ग़ुरबत साफ़ दिखती है. हिन्दुस्तानी लोग अधिकतर न्यूजर्सी के सबर्ब  में रहतें हैं, इन इलाकों में नहीं रहते. इन इलाकों में आने में मेरे हिन्दुस्तानी मित्रों को असुरक्षा का भय सताता है, रात के वक़्त यहाँ आने की बात उनमें से बहुतों के लिए अवांछित है.  मेरी दोस्त सुजाता जो लेटिन अमेरिकी राजनीति की एक्सपर्ट है, यहाँ रहती है. सुजाता फ़र्राटे से स्पेनिश बोलती है, हिन्दी, अंग्रेज़ी भी और इस लेटिन अमेरिकी परिवेश के साथ घुलीमिली है. पिछली बार किसी तरह हिम्मत बाँध कर यहाँ पहुंची थी, अबकी बार मुझे डर नहीं है.

पांच वर्ष बाद फिर मिल सकने की खुशी है, सामने दो खेलते हुए बच्चे है, जिन्हें मैंने अब तक सिर्फ तस्वीरों में देखा है. पांच वर्ष की बच्ची चाहती है की उसे खोज निकालूँ, घर में घुसते ही हमारा खेल शुरू. फिर उसके लिए सोते समय किताब पढ़ना, मज़े की बात वही किताबें जो इसी उम्र का मेरा बेटा पढता है, 'टग बोट स्क्फी' और 'रेड कबूस'. उसेमें रवि की फोटो और वीडियो दिखाती हूँ, वो कहती है 'दिस इस योर सिली बॉय'.  रोहन बड़ा है तो 'बिग बॉय'. सुजाता मुझे कहती है की किस तरह छोटे बच्चों के साथ मीटींग में जाना संभव होता है? मुश्किल होता है, हम सब के लिए जो छोटे बच्चों के माता-पिता हैं. फिर धीरे धीरे उसी के बीच आप रास्ता बनाते हैं. शायद मीटिंग में आ सकना बहुत सरल काम है, दो बच्चों और नौकरी के साथ सुजाता ने जो तीन अच्छी किताबें लिख मारी है, वो बहुत बड़ी बात है. मालूम नहीं कैसे किया. 
  
सड़क पर रात भर चहल-पहल है, लगातार बाहर से आवाजें छन कर आ रहीं हैं, आवाज में नींद मुझे नहीं आती, इसीलिए किसी भी महानगर में नींद नहीं आती. पूरा जीवन अधिकतर सन्नाटे और सुनसान के बीच ही सोने की आदत बनी. मेरे लिए रात के समय, हवा का शोर, या बारिश और बर्फ के गिरने की आवाज ही सबसे पहचानी हुयी आवाज है.  स्टडी रूम में किताबों से घिरे होने का सुख है, सूजी और माइक का खजाना टटोल रही हूँ, एक रात कम है, कितनी तो किताबें हैं, और कितनी फिर उनके बीच वो भी है, जिन्हें २-३ वर्षों से पढने का सोच रही हूँ, लिखने का आलस है, अपनी यादाश्त पर अब बहुत भरोसा नहीं है, एक्स-रे मेमोरी लगता है अब किसी और जन्म की बात है, किसी दुसरे के जीवन का प्रसंग था.  शुक्र है फ़ोन है, क्लिक क्लीक. नींद नहीं आयी, सुबह  'The Dew Breaker'  पलटते हुयी.

सुजाता के घर पर नोर्मा और एंजेला से मुलाकात हुयी, नोर्मा क्यूबा में लिट्रेसी इनिशिएटिव प्रोजेक्ट के शुरुआती कार्यकर्ताओं में से है. सन साठ में आजादी के साथ क्यूबा में सब लोगों को साक्षर बनाने का अभियान शुरू हुआ और जिस किसी को भी पढना आता है, उसे किसी अनपढ़ को साक्षर करना है के फलसफे से साथ  और कुछ ही वर्षों के भीतर सभी लोगों को पढना लिखना आ गया. अब जब पचास वर्ष बाद अमेरिका में 'नो चाईल्ड लेफ्ट बिहाइंड' और इसी तर्ज़ पर भारत में 'सर्व शिक्षा' अभियान का नारा चला है, तो ये देखना और समझाना  ज़रूरी है कि बिना किसी तामझाम किस तरह दुनिया का अकेला लिट्रेसी प्रोजेक्ट सफल हुआ.  फ़िल्मकार कैथरीन मर्फी  ने इस पर फिल्म 'Maestra'  बनायी है. लिट्रेसी प्रोजेक्ट के सिलसिले में नोर्मा न्यूयॉर्क आयी है. नोर्मा अब जेंडर आईडेंटिटी, और रेस एक्वेलीटी पर काम कर रही एक्टिविस्ट है. एंजेला पैतीस वर्ष पूर्व जमैका से न्यूयॉर्क आयी थी, तब से इस इलाके में ही रहती है.  

सुजाता और दुसरे दोस्तों से हिपहॉप बैंडस के बारे में सुनती रही हूँ. सुजाता ने हालिया अपने ऑस्ट्रेलिया में बड़े होने के अनुभव और पिछले बीस वर्षों से क्यूबा, लैटिन अमरीका, और नार्थ अमरीका की घुमायी, रिसर्च करते हुए मन की हिप हॉप पगडंडियों पर भागते हुए अपनी तीसरी किताब  'Close to the Edge'  हिपहॉप म्यूजिक पर मेमॉयर की तरह लिखी है.  किताब को एक समान्तर जीवनअनुभव की तरह पढ़ना मेरे लिए पर्सनल लेवल पर दिलचस्प है. अपने अठारह वर्ष की मित्रता और बीच बीच में हुयी बातचीत के बरक्श, किताब की तरह पढना, फिर नए सिरे से मेरे लिए सुजाता को जानना भी है.  सन सत्तर के बाद, वियतनाम युद्ध, सिविल राईट आन्दोलन के बैकड्रॉप में हिपहॉप संस्कृति दमित अस्मिताओं की आवाज और अभिव्यक्ति की तरह उभरी, न्यूयॉर्क के अश्वेत बहुल इलाकों में इसकी शुरुआत रैप सिंगिंग, ब्रेक डांसिंग, बी-बोयिंग, मून-वाकिंग, ग्रेफ़िती आर्ट की तरह हुयी जिसने सत्तर के बाद की दो पीढीयों को ग्लोबली अपनी चपेट में लिया.  मेरा मन हिपहॉप में कभी नहीं रमा.  हिपहॉप की पोलिटिकल अंडरकरंट से भी मेरा कोई परिचय और कोई गठजोड़ नहीं बना. लेकिन ये मजेदार है कि मेरी पीढी की बैचैनी का ये ग्लोबल म्यूजिक हिपहॉप, भारत में संभ्रांत क्लास के बीच पॉपुलर हुआ, हाशिये की अस्मिताओं से उसका कुछ लेना देना नहीं था, एक संपन्न और ऑलमोस्ट लफंगी पूरी तरह समाज के संघर्षों से कटी जमात का फैशन था हिपहॉप. मेरे किशोरवय और यूनिवर्सिटी के दिनों में जाने पहचाने उन चेहरों को याद करने की कोशिश करती हूँ  जो नैनीताल की मॉलरोड या बरोड़ा के कैम्पस कोर्नर में ब्रेक डांस और मून वाक करते नज़र आते थे, उनमें कोई राजनैतिक नहीं था, दमित नहीं था. हॉस्टल में जिन लड़कियों के कमरे में माइकल जैक्सन और मडोना के पोस्टर थे, सब अमीर घरों की कंजुमरिस्ट लडकियां थी.

फिलहाल आज 'रेगे'  सुनने का मौका बना, ठीक न्यूयॉर्क के अश्वेत केंद्र हार्लेम के बीचों बीच. नोर्मा, एंजेला और सूजी तीनों बीच बीच में थिरक रहे हैं, नोर्मा और एंजेला को साठ पार की उम्र में ख़ुशी के साथ ग्रेसफुली थिरकना देखकर खुशी होती है, सोचती हूँ मेरी माँ होती तो क्या करती?  अब तक इधर उधर बॉब मारले के अलावा बाकी कुछ नहीं सुना, उन्हें भी टी.वी. और रेडियो पर ही सुना, फिर पिछले वर्ष बनी डोकुमेंटरी फिल्म मारले के मार्फ़त कुछ और जाना. जमैका के इन दो गायकों को सुनकर यही लगा कि  जहाँ से भी ये संगीत आया है, बहुत दुःख और पीड़ा के बीच घूम कर आया है, बहुत नाराज़ है ये संगीत, बैचैन हैं धुनें. मानव इतिहास के त्रासदी, और समाजों की पीड़ा एक समय के बाद ख़त्म भी हो जाती है, परन्तु चेतना में वो कई पीढीयों तक बची रहती है; करुणा बनकर, गुस्से के बुलबुलों सी भीतर भीतर उबलती...,

दुबारा हो सकता है फिर किसी हिप हॉप संगीत को सुनने जाऊं, हो सकता है अपने बड़े होते बच्चों के साथ रॉक, मेटेलिका सुनने भी जाना हो, गयी तो फिर कुछ उत्सुकता में ही जाऊगी, मन के चैन के लिए नहीं. मेरे मन की संगत भारतीय क्लासिकल या फिर लोकधुनों के साथ ही बैठती है,  देशी लोकधुनों जैसे ही आयरिश लोकधुनें, दक्षिण अमेरिकी हाइलैंड की धुनें, हवाई की धुनें, थाईलैंड और पूर्वी धुनें और अमेरिकी ब्लू ग्रास को सुनते हुए ही आनंद आता है. अच्छा होता की कुछ भारत में रहते हुए संगीत सीखा होता. बचपन के दिनों में पिता की हर दो साल बाद तबादले वाले जीवन में संभव न हुआ, बाद के सालों में शायद पांच वर्ष लखनऊ में रहते रिसर्च के समय सीख सकती थी, तब दूसरी धुन थी. अब बच्चों के साथ कुछ कर्नाटक शैली का संगीत सीखने की कोशिश करती हूँ, हिन्दुस्तानी सिखाने वाला कोई होता तो ज्यादा सहज होता,  लेकिन संस्कृत की जितनी भी बची खुची याद है, और ब्राहमण घर की परवरिश के बीच धार्मिक शास्त्रीय साहित्य की सुनी कहानीयों की याद, उससे कुछ भजन समझ में आते हैं,  बीच बीच की तमिल /तेलगु और कन्नड़ बिना समझे गा लेना विचित्र लगता है. गलत गा लेने की झेंप नहीं लगती क्यूंकि शायद गाना सीखने का जीवन में यही एक मौका है,  भजन गा लेने और सीख लेने से मेरी नास्तिक समझ पर कोई असर नहीं पड़ता. अच्छी बात ये भी कि किसी प्रगतिशील जमात के सामने मुझे भजन गाते दिखने या सीखने  में अब शर्म नहीं आयेगी. संगीत शब्दों से परे, फिर जिस वजह से भी बना हो बाहरी दिखावे से ज्यादा मन की चीज़ भी है.  जैसे हिन्दी लिखने का ब्लॉग मेरे लिए एक मौका है, लाख वर्तनी की गलतियाँ हो, व्याकरण का लोचा हो, किसी तरह का क्राफ्ट मेरे लिखे में न हो, फिर भी भाषा के साथ मेरे मन की संगत का ये एक जरिया है, नहीं लिखूंगी तो इस भाषा को भूल जाऊँगी, और लिखते लिखते शायद मेरी अशुद्धियाँ कम होती जायेंगी, शायद मेरे भीतर ये भाषा बची रहेगी....  

सुबह तैयार होकर नाश्ता कर रही थी कि  बच्ची ने चिल्लाकर मेरा परिचय ग्रैंडमाँ सावित्री से करवाया, सावित्री घर के काम में मदद के लिए आने वाली पचास पार की उम्र की महिला है, सावित्री कहती है 'माई रूट्स आर इन इंडिया'. सावित्री उन गिरमिटिया हिन्दुस्तानियों की वारिस है जो डेढ़ सौ वर्ष पहले भारत से मजदूरों की तरह करीबियन में लाये गए थे.  मैं सावित्री से कहती हूँ कि  फिर कभी मुलाकात होगी, मुझे मेट्रो और फिर आगे की यात्रा के लिए बस पकड़ने की जल्दी है. जल्दी से सबको अलविदा कर, फिर  सड़क पर. पोर्ट ऑथोरिटी, 42nd स्ट्रीट पर इस मुगालते में मेट्रो से उतर गयी हूँ कि  बस ग्रे हाउंड की होगी,  इमेल खोलकर टिकेट खोला, तो पता चला की ये कोई मेगा बस है, 34th स्ट्रीट से जायेगी. सुबह का समय है, धूप है, इसीलिए पैदल चलकर बस स्टॉप पर पहुंची. न्यूयॉर्क डेस्पेरेट शहर नज़र आता है, हर किसी के भीतर मानों कुछ ज़ल्दबाजी, कुछ बैचैनी की ऊर्जा भरी हुयी है, तीर की तरह भीड़ एक क्रासिंग से दूसरी क्रोसिंग पार करती, दौड़ती है, और ये भीड़ कितने तरह के लोगों की भीड़ है, बहुतायत में काले, भूरे, चीनी, दक्षिण एशियाई, देशी लोगों की भीड़. लगता है कहीं भारत या लेटिन अमेरिकी  किसी देश में हैं, अचानक से ये अहसास होता है कि मैं भी  इस भीड़ से अलग नहीं इसी भीड़ का हिस्सा हूँ, इसी में आसानी से मिल गयी हूँ. शायद इसीलिए ये शहर अपना लगता है, इस पर कुछ क्लेम करने की कसरत नहीं करनी पड़ती. बाक़ी छोटे यूनिवर्सिटी टाउन के भीतर मैं हमेशा भीड़ से अलग नज़र आती हूँ, कोई भी काला या भूरा इंसान अलग से नज़र आता है, भले ही रहते रहते एक तरह की कम्फर्ट ज़ोन में आप पहुँच जाते हैं, आपके इन शहरों में दोस्त बन जाते हैं. और कुछ वर्षों बाद आप को खुद अपना भीड़ से बाहर होने का इल्म नहीं रहता,  लेकिन न्यूयॉर्क कुछ सेकेण्ड के भीतर ही अटपटे तरीके से क्लेम करता है. अलविदा प्यारे शहर फिर लौटूंगी, बार बार लौटूंगी ...  

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2 comments:

  1. टूट कर(मतलब बड़े मन से ) और तफसील से लिखा है!

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  2. बहुत प्यारी , नॉस्टैल्जिक पोस्ट। फ़िर से पढ़ने आयेंगे।
    ये हिस्से बहुत अच्छे लगे:
    1.मानव इतिहास के त्रासदी, और समाजों की पीड़ा एक समय के बाद ख़त्म भी हो जाती है, परन्तु चेतना में वो कई पीढीयों तक बची रहती है; करुणा बनकर, गुस्से के बुलबुलों सी भीतर भीतर उबलती...,

    2.हिन्दी लिखने का ब्लॉग मेरे लिए एक मौका है, लाख वर्तनी की गलतियाँ हो, व्याकरण का लोचा हो, किसी तरह का क्राफ्ट मेरे लिखे में न हो, फिर भी भाषा के साथ मेरे मन की संगत का ये एक जरिया है, नहीं लिखूंगी तो इस भाषा को भूल जाऊँगी, और लिखते लिखते शायद मेरी अशुद्धियाँ कम होती जायेंगी, शायद मेरे भीतर ये भाषा बची रहेगी....

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