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Apr 24, 2013

रंग-ओ-गुल

साल के शुरू में किताबों, कापियों और जिल्द के भूरे बांस पेपर के साथ हर साल टिन का सस्ता सा वाटर कलर का डिब्बा भी आता, गोल बारह रंगों की टिकलियाँ,  एक सस्ती कूची, और एक बिना लकीरों वाली ड्राइंग नोटबुक. सेब, अमरुद, केला, अंगूर, से लेकर बरगद और खज़ूर का पेड़  बनता,  फूलों में हमेशा कमल का फूल होता, फूल हमेशा बंद, कमल के फूल जैसे ही दुसरे फूल होते,  अदल बदल कर कमल जैसे फूल और तरह-तरह की पत्तियों के साथ फिर 'साड़ी की  किनारी ' वाला डिजायन होता. किताब से देखकर बनाया खजूर का पेड़ अपने आस-पास किसी पहाड़ में नहीं दिखता, 'साड़ी की  किनारी' वाली साड़ी और कमल के जैसे फूल भी कहीं आस-पास नहीं दिखतें, आठ मील पैदल चलते हुए नानी के गाँव जाते समय भी नहीं ...

स्कूल जाते हुए फूलों से ढके बुरांश, मेलू, गुरय्याल, कचनार, अनार, आडू, पुलम, खुबानी के पेड़ दिखतें,  बशिंग, बनफ्शा, हिसर, किलमोड़े की फूलों लदी लकदक झाड़ियाँ दिखतीं,  डाडामंडी से लौटते हुए नदी किनारे मीलों चलतें या मरख्वल गाँव  से डाबर गाँव जाते हुए नदी किनारे बेर की लाल-नारंगी झाड़ियाँ दिखती,  फिर जब नदी नहीं रहती, बलुई जमीन पर बड़े कैक्टस पर उगे सुर्ख फूल दिखतें, और आते जाते पहाड़ी खेतों की हरी नम भीत पर हजारों  छोटे-छोटे बैंजनी फूल अप्रेल में और सफ़ेद फूल बरसात में खिलतें, दादाजी इन्हें वनस्पति कहते.  कचनार की कलियों का अचार, बुरांश के फूल का शरबत, हर बरसात में तोड़े-सुखाये वनस्पति साल भर दवा की तरह, चाय में मसालें की तरह काम आते. हमारे जीवन में इतने गुंथे, पहचाने फूल किताब में नहीं थे, इन्हें बनाने की जगह ड्राइंग की नोटबुक में नहीं थी...

सेब, अमरुद, केला, अंगूर, और कमल के फूल रंगते हमेशा वाटर कलर फ़ैल जाते, रुई के फाहे से रंग पोछते हुए कागज फट जाता,  टीन  के डिब्बे  में गोल रंगों की टिकलियाँ घिस जातीं,  रंग इधर उधर मिल जाते, अंत में मटियाये रंग के धब्बे बचतें, कूची होते होते फिर गंजी हो जाती,  नोटबुक के पन्नों के बीच साल के आखिर में बना  'साड़ी का कोई किनारा' साबुत बचता, लाल रंग के कमल के फूल और हरी पत्तियों वाला और माँ को दिखाकर कहती अगली बार  ऐसी किनारी वाली साड़ी खरीदना....



7 comments:

  1. :-)

    अहा...पढ़ा,कुछ इन्द्रधनुष सा...

    अनु

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  2. ये स्मृतियाँ... नवजात शिशु की तरह कहीं भी, कैसे भी, जिंदगी की ताकत देती लगती हैं...

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  3. चंद चराग यादों के न हो, चंद सफे खुशबुओं से महकते गर न खुलें तो जीना बेअसर ठहरा सुषमा, बकौल जानिसार अख्तर:

    " हम ने हर गाम सजदों के जलाए हैं चराग,
    अब तेरी रहगुज़र रहगुज़र लगती है !"

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  4. फिर आयीं याद भूली बिसरी बातें

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  5. भावपूर्ण और कुछ पुरानी यादें ताज़ा करता खूबसूरत शब्दावली से सजा लेख | आभार

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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  6. बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति!
    साझा करने के लिए धन्यवाद!

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