"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Jun 6, 2013

पेन्सल्वीनिया की मार्च डायरी-2013

दस बजे न्यूयॉर्क से स्टेट कॉलेज के लिए बस पर सवार हुयी, बस पहले ही आधे घंटे लेट चली, आधे रस्ते पहुंची तो स्नो स्टॉर्म शुरू हो गया, जो फिर अगले  ७ घंटों तक बना रहा. एक ही देश के भीतर, पांच दिन के भीतर, किसी दूसरी दुनिया में, किसी दुसरे मौसम में दाखिल हो गयी हूँ, घर छोड़ते समय चेरी और प्लम के पेड़ों पर फूल खिल गए थे, और आँगन में  डैफ़ोडिल्स   और ब्लू बेल्स...

कछुए की रफ़्तार से गाड़ी चल रही है , कभी-कभी सिर्फ दस किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से, मेरे पीछे की सीट पर बैठी औरत का किसी वकील मित्र के साथ पीट्सबर्ग मिलना तय था, अब मिलना संभव नहीं, अगर मिलना संभव हुआ तो, लौटकर उस मित्र का घर पहुंचना असंभव दिखता हैं. वो औरत पीट्सबर्ग  में अपने किसी परिचित के घर रात में रहने की गुजारिश कर रही है.   इतने तूफ़ान के बीच फॉर्मल तरह की  गुजारिश के संवाद सुनना दिलचस्प है, ये भी कि लोग किस तरह बराबर अपने आस-पास दूरियों का भूगोल व्यवस्थित रखतें है, दोस्तों को भी टेकन फॉर ग्रांटेड नहीं लेतें. लेकिन फ़ोन की बातचीत से दुसरे यात्री पक गए हैं, और उसे धीमें स्वर में बात करने को कहने लगे हैं.

इतनी बर्फबारी के समय बस से इस रास्ते जाना पहली बार हुआ है.  यूँ तकरीबन नौ वर्ष तक, इथाका से जब भी न्यूयॉर्क, न्यूजर्सी या वाशिंगटन डी. सी., जाना हुआ,  पेन्सल्वेनिया के बड़े हिस्से  से में ड्राईव करते हुए कई बार, अलग अलग मौसम में, गुजरना हुआ. शुरुआत के सालों में, खासकर दिसंबर -जनवरी के महीनों में ऐसा भी हुया कि रात में ड्राइव करते हुए जब बिंगहेमटन के आस-पास पहुंचे तो मीलों तक इतनी घनी धुंध और सिर्फ धुंध मिली कि अपने आगे की गाड़ी की मंद लाल बत्ती के अलावा कुछ न दिखा, न सड़क, न सड़क के दायें-बायें, न सामने से आती कोई कार या ट्रक, सिर्फ गहरा स्लेटी और काला, जिसके बीच पांच से दस किमी प्रति घंटे  की रफ़्तार से घंटे भर कार चलायी.

उन दिनों के खौफ का ही साया होगा जो अब तक सपनों में मुझे फिर घेर लेता है.  सपने में अक्सर इसी जाने पहचाने भूगोल में खुद को हाइवे पर कार चलाते हुए पाती हूँ, और आँखे हैं कि खुलती नहीं, आखों को खोलने की कड़ी कोशिश चलती रहती है, रुकने की कोई सुविधा नहीं, गाड़ी के स्टेरिंग पर हाथ, अंदाज़ से कार चलाती हूँ, डरी  हुयी कि अब किसी खड्ड में गिरे .., अब किसी ट्रक से टकराए ...

अब उस तरह से रात के समय लम्बी ड्राइव भी कितनी पुरानी बात हो गयी है, पिछले नौ वर्षों से बच्चों के साथ, किसी भी सूरत में रात में लम्बी ड्राइव ख़त्म हो गयी.  दिन में फिर अमूमन दोगुने समय के बजट के साथ ड्राइव का सिलसिला बना,  बीच में किसी पार्क में रुक गए, किसी रेस्टोरेंट में रुक गए, मतलब हर घंटे दो घंटे में रुकने की जो भी जगहें  हैं, उनका नक्शा दिमाग में बन गया.  बारिश और बर्फबारी के समय कहाँ से बचना और किधर से निकल लेना है का भी गणित बना.  फिर जैसे न्यूजर्सी  से हर तीन-चार महीने एक दफे भारतीय ग्रोसरी के लिए जाना रहता था, वापस लौटते हुए पेन्सल्वेनिया के बाहर आउटलेट मॉल  से कपड़ों की खरीद के लिए जाना भी शामिल हुआ .   ऑरेगन  आने के कुछ महीनों पहले एक दफे सेसमी स्ट्रीट जाना हुआ, बड़े बेटे को उसकी कुछ याद है, छोटा वाला सिर्फ चार महीने का था. वो कभी कभी सिर्फ एल्मो, कुकी मॉन्स्टर आदि की फोटो देखकर खुश  होता है . बच्चों के लिए शायद ये सचमुच के ही केरेक्टर  है,  मुझे हमेशा लबादे के भीतर बंद अपनी जीवीका की जुगत में लगे लोग दिखतें हैं, माँ और बाप जो बड़े वयस्क हैं, उनका भी बच्चों की ही तरह उनपर झपट पड़ने का अति उत्साह हमेशा कुछ उदास करता है, बहुत से बौने लोगों को इस बहाने काम मिलता है, सिर्फ इस वजह से भी तसल्ली नहीं होती, सतह की चहल पहल के नीचे बाज़ार की नींव पर खड़ी दुनिया सचमुच बहुत उदास करने वाली दुनिया है ...

बस यात्रा के साढ़े चार घंटे आखिर में सात घंटों में तब्दील हुई.  बहन के घर पहुंची, पार्किंग लॉट की बर्फ देखकर वो दिन याद आये जब आयोवा में कार के एंटीना पर रिबन बाँध देती थी, क्यूंकि सुबह तक कार बर्फ से ढक जाती थी, और अपनी कार पहचानना मुश्किल होता था.  घर पहुंचकर झोली-भात, भात-चूर्कानी, और चौलाई की भुज्जी खायी, फिर ऐसी नींद आयी, जैसे अपने माता-पिता के घर पहुँचने पर आती है.  सारे डिफेन्सेस, सारी सतर्कता, चिंता, चेतना पता नहीं कब झर गयी, भाई बहनों के घर पर भी संभवत: माता-पिता की अदृश्य छाया होती ही है. बहुत दिनों बाद सुबह नौ बजे तक सोती रही.....


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