Copyright © 2007-present by the blog author. All rights reserved. Reproduction including translations, Roman version /modification of any material is not allowed without prior permission. If you are interested in the blog material, please leave a note in the comment box of the blog post of your interest.
कृपया बिना अनुमति के इस ब्लॉग की सामग्री का इस्तेमाल किसी ब्लॉग, वेबसाइट या प्रिंट मे न करे . अनुमति के लिए सम्बंधित पोस्ट के कमेंट बॉक्स में टिप्पणी कर सकते हैं .

Jun 19, 2013

उत्तराखंड नोट्स

बद्रीनाथ 
दादी और दादाजी एक बार सौ किलोमीटर से ज्यादा की पैदल यात्रा करके बद्रीनाथ गए थे, दादी की उम्र साठ और दादाजी की पचहतर थी, उनके साथ जो बीस लोग आस-पास के गाँव के थे वो भी उसी उम्र के थे.  सभी यात्रियों के पास मुश्किल से दो जोडी कपड़े, पानी का  तामलेट (तांबे की बोतल) और गुड के अलावा कुछ नहीं था.  पैदल चलते हुए जिस गाँव में पहुँचते वहीँ रुक जाते, गाँव के लोग ही उन्हें खाना-पीना खिला देते, जिन गाँवों से होकर आये थे उनकी खैर खबर लोगों को देतें.  महीने भर बाद लौटकर आये तो बद्रीनाथ का प्रसाद हर गाँव में बांटते हुए घर पहुंचे. गाँव के लिए भी कुछ प्रसाद था.  मुझे हथेली पर कुछ कच्चे पीले चने के दाने और चीनी के इलायची दाने की याद है. तामलेट में गंगाजल कई सालों तक घर में रहा ......

केदारनाथ
Southside of temple, Kedernath, Garwal, 1882.
घर के पुराने अल्बम में पिता जी की एक ब्लैक एंड वाइट तस्वीर जाड़ों के महीनों में केदारनाथ मंदिर के सामने की है,  सन सत्तर के दशक की तस्वीर, चारों  ओर बर्फ से सफ़ेद पहाड़ों के बीच काला भव्य मंदिर.  पिता जी कई वर्ष तक रुद्रप्रयाग, केदारनाथ, चमोली, गोपेश्वर में पोस्टेड थे, उस पूरे इलाके के चप्पे चप्पे को सालों तक उन्होंने पैदल छाना हैं.  केदारनाथ के साथ  यति मानव और अंगारों पर चलने वाले बाला साधु के किस्सों  की बहुत धुंधली याद  मेरे जहन में बची है. यति मानव के किस्से पिताजी ने भी सिर्फ सुने थे, दादा जी कहते थे की उनके गुरु ने सचमुच यति देखा था.  बाला  साधु को पिता ने देखा था, उससे बातें की थी.  मानव विज्ञानियों के पास फिलहाल हिमालय में होमो सेपियंस के अलावा किसी दूसरी मानव सदृश जाति के होने का कोई प्रमाण नहीं है. बीसवीं सदी की शुरुआत में सचमुच में हिमालय के जंगलों में जानवरों के बीच पला किशोर लोगों को मिला था, जिस के आइडिया को लेकर रुडयार्ड किल्पिंग ने जंगलबुक लिखी, और उसका हीरो मुगली रचा.
मै कभी केदारनाथ नहीं गयी, जब भी सोचा केदारनाथ के बारे में हमेशा यति मानव और बाल साधु को सोचा, बर्फ से ढके सफेद पहाड़ों के बीच पत्थर के भव्य काले मंदिर के बारे में सोचा .. ..


1 comment:

  1. अब बस स्मृति शेष है -

    ReplyDelete

असभ्य भाषा व व्यक्तिगत आक्षेप करने वाली टिप्पणियाँ हटा दी जायेंगी।