"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Jun 23, 2013

हिमालयी क्षेत्र को बिना संरक्षित किये तबाही को बचाना नामुमकिन है

"पर्बत वो सब से ऊँचा हमसाया आसमाँ का, वो सन्तरी हमारा वो पासबाँ हमारा"


भारत का तीन दिशाओं में तैनात प्रहरी हिमालय क्षतिग्रस्त हो गया है, किसी बाहरी दुश्मन ने नहीं किया, ये भीतरघात है, 16 जून को हुयी उत्तराखंड की तबाही हिमालय की बिलबिलाहट है, चेतावनी है.

इस गुपचुप भीतरी हमले की शुरुआत, हिमालय के जन जीवन पर आघात की कहानी, उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र के दोहन की कहानी वर्ष १८१५ में शुरू हुयी,  जब अंग्रेजों की सहायता से गढ़वाली और कुमायूं की सेनाओं ने गोरखा फौज को हराया और अपने क्षेत्र को आज़ाद किया.  लेकिन आजादी की कीमत अंग्रेजों के साथ हुयी संधि के तहत पूरा कुमायूं और गढ़वाल का एक हिस्सा सीधे अंग्रेजों के सुपुर्द हुआ.  अंग्रेजों ने पहाड़ की छानबीन की, यहाँ की बहुमूल्य लकड़ी पर खासकर उनकी नज़र गयी.  १८२३ में पहला वन अधिनियम आया, जिसने पहाड़ की जोत की जमीन के अलावा जो भी जमीन थी, सबको सरकारी घोषित कर दिया, जिनमें हर गाँव के सामूहिक चारागाह, पंचायती वन, नदी, तालाब और नदी के आस-पास की जमीन थी. १८६५ में अंग्रेजों ने वन विभाग की स्थापना की और पहाड़ की आधे से ज्यादा जमीन पर कब्ज़ा किया. अब उत्तराखंड की अस्सी प्रतिशत जमीन पर कई वन कानूनों के बाद वन विभाग का कब्ज़ा है.

पारम्परिक रूप से पहाड़ियों की जीवीका कई तरह की मिश्रित गतिविधियों से चलती थी,  खेती उसका एक बहुत छोटा भाग था.  नदी से मछली, जंगल से शिकार, और बहुत कंद -मूल-फलों, वनस्पतियों, मशरूम आदि के संग्रहण से पोषण होता था.  इसके अलावा पहाड़ के कई समुदाय खेती नहीं करते थें, बल्कि उनकी जीवीका का मुख्य आधार पशुपालन था, पशुपालक समुदाय तिब्बत, चीन, उत्तराखंड , नेपाल , लद्दाख , हिमाचल के बीच वर्षभर घूमते और लगातार चीज़ों को खरीदते-बेचते हुए अपनी गुजर करते थे और पहाड़ की आत्मनिर्भर, संपन्न, अर्थ व्यवस्था की रीढ़ थे. गढ़वाल का चांदी का सिक्का ('गंगाताशी') मुग़ल साम्राज्य के उत्कर्ष के दिनों में भी मुग़ल सिक्के से ज्यादा कीमत का था. अंग्रेज ने सिर्फ व्यक्तिगत सम्पति को ही वैध करार दिया और सारे पंचायती वन, चारागाह , नदी, नाले लोगों से छीन लिए. इस बदली स्थिति में जीविका के सारे रास्ते पहाड़ के लोगों के लिए बंद हो गए, पशुपालन मुमकिन न रहा.  बूढ़े, बच्चों और औरतों को छोड़ कर घर के जवान लड़के रोजगार की तलाश में मैदानों की तरफ दौड़े.  अब बची खेती को जोतने के लिए सिर्फ बूढ़े और औरतें ही बची.   हाकिम ने बड़े पैमाने पर पहाड़ियों की भर्ती फौज में करने के लिए इन्डियन मलेटरी अकेडमी की स्थापना भी देहरादून में की. पहाड़ के इसी इलाके में कुमायूं रेजीमेंट, गढ़वाल राइफल, गोरखा राइफल, इंडो-तिब्बत बोर्डर फ़ोर्स से लेकर हर तरह के सैनिक कार्यालयों और छावनियों की बसावट में पहाड़ी  शहर बसे.   बीसवीं सदी की शुरुआत से पहाड़ की आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे 'मनी ऑर्डर' व्यवस्था में बदल गयी.


इधर पहाड़ की लकड़ी बेचकर हाकिम के मुनाफे दिन दूना रात चौगुना हुआ.  पहले साल 1924-1925 में  फारेस्ट विभाग की आमदनी 5.67 करोड़ रूपये और सरप्लस में २ करोड़ की लकड़ी.  छ्पन्न वर्षों में ( 1869-1925 तक), लकड़ी बेचकर कुल मुनाफा 29 करोड़ और सरप्लस करीब  12 करोड़. बीस वर्ष बाद आजादी के समय तक अब तीस साल की कमायी एक साल में होने लगी, वर्ष 1944-45 में एक साल का लकड़ी बेचकर मुनाफा 12  करोड़ और सरप्लस करीब  5 करोड़.  आजाद भारत   के पिछले ६६ सालों का भारत सरकार का मुनाफा भी इस गरीब क्षेत्र से कम नहीं हुआ होगा (मेरे पास फिलहाल आंकड़े नहीं, अंग्रेजों का धन्यवाद की उनके आंकड़े  सहज उपलब्ध हैं ! ).  भारत सरकार व प्रदेश की सरकारों के खाते में खनन और हायड्रो इलेक्ट्रिक पावर प्लांट की कमायी भी जुड़ी. आजाद भारत ने पहाड़ के मानव संसाधन के लिए किसी दुसरे रोजगार की व्यवस्था नहीं की, वन विभाग की हथियायी हुयी जमीन को लोगों को नहीं लौटाया, न उसका इस्तेमाल पहाड़ के जन-जीवन के विकास और संरक्षण के लिए किया.  वर्ष १८२३ के बाद अब तक कई वन अधिनियम बने जिनका सार ये है कि उत्तराखंड का अस्सी प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा वन विभाग के कब्ज़े में हैं .  आज पहाड़ की सिर्फ ७% जमीन खेती की बची है, जिसमें पहाड़ की दस प्रतिशत आबादी भी गुजर नहीं कर सकती.  भारतीय फौज का बीस प्रतिशत आज भी दो प्रतिशत जनसँख्या वाले पहाड़ी इलाके से आता है. पहाड़ के लोगों के लिए विस्थापन विकल्प नहीं बल्कि जीवित बने रहने की शर्त है.

उत्तराखंड सरकार, चाहे किसी भी राजनैतिक दल की बने, उसकी नीतियाँ औपनिवेशिक लूट-खसौट के ढाँचे पर ही अब तक टिकी है.  भूमंडलिकरण या ग्लोबलाइशेशन के बाद और उत्तराखंड बनने के बाद हुआ सिर्फ इतना है कि लूट खसौट बहुत तेज़ और एफिसियेंट हो गयी है.  उत्तराखंड का हालिया तेरह वर्षों की विकास नीतियाँ सबके सामने हैं,  जिनके केंद्र में हिमालय के जीव, वनस्पति और प्रकृति का  संरक्षण  कोई मुद्दा नहीं, हिमालयी जन के लिए मूलभूत, शिक्षा, चिकित्सा, और रोजगार भी मुद्दा नहीं.  वे पूरे उत्तराखंड को पर्यटन केंद्र, ऐशगाह और सफारी में बदल रहे हैं.  निश्चित रूप से उत्तराखंड (सरकार का, माफिया व ठेकेदारों का) वन प्रदेश, खनन प्रदेश और ऊर्जा प्रदेश है.  इसीलिए जितनी भी नीतियां हैं,  वो जंगल, जमीन, और नदियों के दोहन की के लिए हैं. ये जन प्रदेश नहीं है, ये जन के लिए नीतीयाँ नहीं है.

पहाड़ के गरीब लोग पूरी एक सदी से ज्यादा समय से सिर्फ दिल्ली, लखनऊ, कलकत्ता, बंबई ही नहीं बल्कि ढ़ाका , लाहौर और काबुल तक होटलों में बर्तन मांजते और भटकते रहे हैं.  सौ साल में पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की भटकन में उनका भला न हुआ तो अब बीसवीं सदी में चारधाम के छह महीने से भी कम समय तक खुले होटलों के सर्विस सेक्टर उनका क्या भला करेंगे?   पर्यटन उधोग के नाम पर जिस अंधाधुंध तरीके से अनियोजित इमारतों के निमार्ण, सड़कों का चौड़ीकरण, नदी नालों और तालाबों के मुहाने पर कूड़ाकरण हुआ हैं, उसने पापियों को भले ही पावन न किया हो, हिमालय को सिर्फ न दूषित कर दिया है, बल्कि अब क्षतिग्रस्त भी कर दिया है.

जिन्हें हिमालय घूमना है, या तीर्थ दर्शन करनें हैं , वो अपने तम्बू लेकर घूमें, या पर्यटन एजेंसी तम्बू किराए पर दें, अपना खाना खुद बनायें,  या दुनियाभर के घुम्मकडों की तरह पैकैज्ड फ़ूड ले जाएँ, पाप धुलें न धुलें,  यायावरी का सुख और स्वास्थ्य जरूर पर्यटकों के हिस्से आयेगा.

 
उत्तराखंड राज्य सरकार को सिर्फ दैवी आपदा प्रबंधन नहीं करना है,  उत्तराखंड सरकार को इस राज्य का प्रबंधन ठीक करने की ज़रुरत है. उत्तराखंड की तबाही को प्राकृतिक या दैवीय आपदा कह कर टालबराई  से आने वाले सालों में आपदाओं की ही बाढ़ आयेगी.  उत्तराखंड और हिमालय की संरचना, और यहाँ के जन जीवन और एतिहासिक समझ की संगत  में विकास नीतियाँ बनाने और उनके क्रियान्वन की ज़रुरत है. हिमालय भुरभुरे मिट्टी के पहाड़ों से बना है, यहाँ के पेड़ों की जड़ें इस मिट्टी को नम और बांधे रखती हैं. जंगलों के कटान के साथ ही तेज हवा, और पानी के वेग का सीधा आघात पहाड़ पर पड़ता है. और भीतर से सुरंगों के जाल बिछ जाने से पहाड़ों की प्रकृति के आघातों को झेलने की क्षमता नहीं बचती. लगातार कटाव के फलस्वरूप नंगे हो गए पहाड़ों, भीतर से लागातार खोखले हो गए पहाड़ों में बाढ़ व भूस्खलन का खतरा बढ़ता ही जाएगा. ये प्रकृति का नहीं विकास के मॉडल का कसूर है .

पहाड़ की बिजली का विकल्प सौर ऊर्जा हो सकता है,  शहरी इलाकों की जीवन पद्दति में कुछ परिवर्तन से बिजली की ज़रुरत कम की जा सकती है,  लेकिन हिमालय का कोई विकल्प नहीं हैं, उसे रिपेयर करने की हमारी औकात नहीं है.  नदियों और पहाड़ों का सृजन हम नहीं कर सकतें. किसी भी सरकार और किसी भी एन.जी.ओ. की इतनी भी सामर्थ्य नहीं है कि वो हमारे पूर्वजों के हाड़तोड़ मेहनत से बनाये गए सीढ़ीदार खेतों की ही ठीक से मरम्मत कर सकें.

हिमालयी क्षेत्र को बिना संरक्षित किये तबाही को बचाना नामुमकिन है,  ग्रैंड कैनियन, यलो स्टोन पार्क आदि  प्राकृतिक साइट्स की तरह हिमालय को भी मनुष्य जाति  की धरोहर की तरह बचाना ज़रूरी है. पहाड़ नहीं बचेंगे तो मैदान भी नहीं बचेंगे, पूरा देश नहीं बचेगा. ..

8 comments:

  1. "हिमालय का कोई विकल्प नहीं हैं, उसे रिपेयर करने की हमारी औकात नहीं है. नदियों और पहाड़ों का सृजन हम नहीं कर सकतें. किसी भी सरकार और किसी भी एन.जी.ओ. की इतनी भी सामर्थ्य नहीं है कि वो हमारे पूर्वजों के हाड़तोड़ मेहनत से बनाये गए सीढ़ीदार खेतों की ही ठीक से मरम्मत कर सकें. हिमालयी क्षेत्र को बिना संरक्षित किये तबाही को बचाना नामुमकिन है। हिमालय को मनुष्य की धरोहर की तरह बचाना ज़रूरी है. पहाड़ नहीं बचेंगे तो मैदान भी नहीं बचेंगे, पूरा देश नहीं बचेगा...."

    बेहतरीन, सुलझा हुआ, सरल भाषा में कड़क बातें कहता, हमें जगाने के लिए काफी है यह आलेख। धन्यवाद स्वप्नदर्षी।

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  2. This valuable comment is from Asad Zaidi ji on FB (I am saving it here as things ob fb get lost after a while)

    Sushma Naithani आपकी टिप्पणी प्रभावशाली और शिक्षाप्रद है। मैं लगभग पूरी तरह इससे सहमत हूँ। बस, एकाध बात अपनी तरफ़ से जोड़ने की अनुमति चाहता हूँ।

    हिमालय भारत ही नहीं, पूरी मानवता, ख़ासकर दक्षिण एशिया, पूर्वी एशिया और मध्य एशिया की सम्मिलित धरोहर है। वृहत्तर हिमालयन क्षेत्र, इसकी बसावट और यहाँ पली संस्कृतियों को हर तरह के राष्ट्रवाद से मुक्त शांतिक्षेत्र बनाना बहुत ज़रूरी है। आख़िर बीसवीं सदी से पहले यह क्षेत्र मोटे तौर पर अंदरूनी सीमाओं से रहित था और एक इलाक़े से दूसरे इलाक़े के बीच आवाजाही और अंतर्निर्भरता सदियों से चली आती थी।

    दुर्भाग्य से अब यह दुनिया के सबसे ज़्यादा कटे-फटे और सैन्यीकृत क्षेत्रों में है, और सैन्यीकरण कुल मिलाकर तबाही लाता है। इस क्षेत्र को भारत, चीन, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, अफ़ग़ानिस्तान, और मध्य एशिया के नव-गठित देशों (ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान और कज़ाख़स्तान) की विनाशकारी सैनिक, अर्धसैनिक उपस्थिति, सैनिक अड्डों, हरबा-हथियार, गृहयुद्ध, सरकारी और ग़ैरसरकारी आतंकवाद, सीमावर्ती सैनिक झड़पों, और बरसों से जारी अमरीकी बमबारी ने छलनी कर रखा है। इससे यहाँ का जनजीवन विकृत और बरबाद ही हुआ है। जो कसर रह गई थी उसे जंगल, जल और ज़मीन के संसाधनों के अनियंत्रित दोहन, औपनिवेशिक विकास और पर्यटन के नवधनाढ्य मॉडल ने पूरा कर दिया है। संपूर्ण वि-सैन्यीकरण और पर्यावरण-संरक्षण के बिना हिमालय का कोई भविष्य नहीं है।

    हिन्दुस्तान और नेपाल के पहाड़ों और वादियों में बसी जनता इस स्थिति में है कि अंधराष्ट्रवाद और धार्मिकता के संगठित, शोषणकारी और विराट स्वरूपों के भुलावों से आज़ाद होकर अपनी स्वायत्त और बहुलतापूरण हिमालयी जीवनशैली के निर्माण का बीड़ा उठाए। इस काम में पूरी दुनिया के लोग उनके साथ होंगे।

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  3. पूरा देश बिना किसी प्लानिंग के, बिना किसी नियम कानून के व बिना किसी अंकुश/मर्यादा के चल रहा है। इन सब से उलट प्रत्येक व्यक्ति, वस्तु, स्थान संसाधन का दोहन शोषण व स्वार्थपूर्ति सब के मूल में है। जागरूकता से कोसों तक वास्ता नहीं। दायित्व्बोध तिलांजलि दे देने की वस्तु है। तो ऐसे में यह सब तो होगा ही।

    अभी जो लोग रो कलप रहे हैं महीने-भर बाद वे और देश दुनिया फिर से उसे ढर्रे पर चलने लगेंगे, बिना कोई सुधार किए या बिना कोई परिवर्तन किए। कोई अपने को रत्ती-भर बदलना नहीं चाहता। ऊपर से सबके लिए अतिक्रमण के दरवाजे भारत ने खोल रखे हैं। तो बांगलादेश से लेकर तिब्बत, नेपाल तक से दिन-रात हजारों लोग घुसे आते हैं। एक वोट के लालच में उन्हें राशनकार्ड दे कर यहीं बसाने का स्वार्थी खेल चलता आ रहा है। वे दिन दूनी रात चौगुनी गति से बच्चे पैदा कर रहे हैं। अतः स्थान व संसाधन कम पड़ रहे हैं, दोहन व हाहाकार बढ़ रहा है, अनैतिकता चरम पर है, मर्यादा व अपरिग्रह आदि चीजों के लिए कोई स्थान नहीं है। फिर आगे क्या अच्छे की आशा की जाए। यह सब तो उसी का फल है, भुगतना होगा ही। रो धो कर फिर उसी ढर्रे पर लग जाएगी जनता। कोई बदलने को तैयार नहीं।

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  4. आपने पहाड़ों की विकराल होती समस्या के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को सामने रखा ! निरंतर क्षरण और ह्रास की क्लेशभरी कहानी है यह!

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  5. आपने पहाड़ों की विकराल होती समस्या के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को सामने रखा ! निरंतर क्षरण और ह्रास की क्लेशभरी कहानी है यह!

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  6. अच्‍छा और सुलझा हुआ लेख है। दरअसल ि‍हमालय को बचाने का सवाल राजनीि‍तक सवाल है। जो राजनीि‍तक व्‍यवस्‍था जल, जंगल, जमीन की लूट पर आधाि‍रत है उससे ि‍कसी तरह की उम्‍मीद बेमानी है। उत्‍तराखण्‍ड ही नहीं ि‍हमांचल और जम्‍मू काश्‍मीर में ि‍वपदाएं आ रही हैं। काश्‍मीर में पहाड़ों को छेद ि‍दया गया है। अभी कल ही प्रधानमंत्री ने एक रेल सेवा को हरी झंडी ि‍दखाई है। रेल पहाड़ों के ि‍लए घातक है। अब जंगल और पहाड़ की लूट मैदान में लाना आसान होगा। ि‍वकास के नारे पर ि‍वनाश के यही उपक्रम बरबादी की वजह हैं। इस ि‍लए जरूरी है ि‍क पहाड़ से आवाज उठे ि‍क उसे इस तरह का ि‍वकास नहीं चाि‍हए।

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  7. उत्तराखंड सरकार, चाहे किसी भी राजनैतिक दल की बने, उसकी नीतियाँ औपनिवेशिक लूट-खसौट के ढाँचे पर ही अब तक टिकी है. भूमंडलिकरण या ग्लोबलाइशेशन के बाद और उत्तराखंड बनने के बाद हुआ सिर्फ इतना है कि लूट खसौट बहुत तेज़ और एफिसियेंट हो गयी है. उत्तराखंड का हालिया तेरह वर्षों की विकास नीतियाँ सबके सामने हैं, जिनके केंद्र में हिमालय के जीव, वनस्पति और प्रकृति का संरक्षण कोई मुद्दा नहीं, हिमालयी जन के लिए मूलभूत, शिक्षा, चिकित्सा, और रोजगार भी मुद्दा नहीं. वे पूरे उत्तराखंड को पर्यटन केंद्र, ऐशगाह और सफारी में बदल रहे हैं. निश्चित रूप से उत्तराखंड (सरकार का, माफिया व ठेकेदारों का) वन प्रदेश, खनन प्रदेश और ऊर्जा प्रदेश है. इसीलिए जितनी भी नीतियां हैं, वो जंगल, जमीन, और नदियों के दोहन की के लिए हैं......इसलिये जरुरत है सिस्टम बदलने की, जिसके बगैर कुछ भी संभव नहीं।

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