"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Jun 25, 2013

उत्तराखंड

उत्तराखंड को छोड़े हुए अब मुझे बीस वर्ष से ज्यादा का समय हुआ, वहां की खबर बीच बीच में छुट्टी का समय बिताने, परिवार व मित्रों से ही मुझे मिलती है, अब समाचार पत्रों और इन्टरनेट से. पिछले बीस वर्षों में किसी बाहरी इंसान की तरह ही मैंने उत्तराखंड को दूर से देखा है, लेकिन किसी भीतर वाले की नज़र से, यहाँ वहां माइक्रो स्कोप लेकर भी. इन वर्षों में बार बार विस्थापन की दुखदायी प्रोसेस के बीच बार बार अपने घर को याद किया, गाँव को याद किया, दुनियाभर में जब भी पहाड़ देखें, उस तरह के भूगोल में लोगों को चैन से सारी संभावनाओं के साथ देखा, घर याद आया, उत्तराखंड याद आया और लगता रहा कि काश हमारे परिवेश में भी ये सब होता तो यूँ इतने सारे लोगों को दर -दर नहीं भटकना पड़ता. बचपन के शुरुआती वर्षों का पहाड़ पर बिताया अच्छा समय था , उसकी भोली याद अब तक मुझे पहाड़ से जोड़े रखती है. लेकिन ये फिर अवचेतन की बात है.

चेतन दिमाग हमेशा से जानता था, अब भी जानता है कि ये काश ..काश , मेरे जीवन में संभव नहीं ही होने वाला है. जब से होश आया, मुझे उत्तराखंड के गाँवों, कस्बों और छोटे शहरों का बाहरी दुनिया से बेतरह कटे होने की कोफ़्त, वहां किसी भी तरह के अवसरों का अभाव हमेशा से न सिर्फ दुखी करता रहा, बल्कि मुझे लगा कि मेरी स्थिति पिंजरे में बंद किसी जानवर जैसी, या कुंए में गिरे किसी जानवर की है, जहाँ ठीक से खड़े होने की कोशिश करना भी सर टकराने जैसा है. उत्तराखंड के आम लोगों के भाग्यवादी होने से, उनकी धार्मिक जकड़न, जातिगत भेदभाव से हमेशा चिढ़ रही है, औरतों की दोयम दर्जे की नियति से गहरी नफ़रत रही है, हमेशा कोफ़्त हुयी, औरतों के वर्त-उपवास की दुनिया से, मर्दों के ज़ाहिलपने से, मूढ़ता से और उनके दंभ से नफ़रत रही है. उससे दूर कहीं और, किसी बेहतर जगह लगातार भागने का मन बना रहा, और लगातार भागती रही हूँ. हमेशा से पुरानी दुनिया के टूटने की मंशा लिए रही हूँ, मनाती रही आधी उम्र कि कोई बड़ी टूटफुट हो, उत्तराखंड बदले, बेहतर हो.

अब पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से उत्तराखंड बदला है, और जैसी टूटफूट हो रही है, वो अब आँखों के सामने घटित दुस्वपन है ..., उसे कैसे सहा जाय ?

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