"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Jun 30, 2013

कोलंबिया रिवर गोर्ज के बीच उत्तराखंड की याद


पेसिफिक नॉर्थवेस्ट में रहते हुए अब पांच वर्ष हुए, इस बीच करीब पांच हज़ार मील ड्राइव करते हुए इस क्षेत्र को देखने का मौका मिला है, इस क्षेत्र में कई झीलें, नदियाँ, प्रशांत महासागर का तट , ऊँचे पहाड़, गहरे दर्रे, सोये हुए ज्वालामुखी और अतीत में ज्वालामुखी विस्फोटों से बनी विशद घाटियाँ, झील और तालाब हैं. कोस-कोस पर झरने और दर्रों के बीच बहती नदियाँ.  बुराँस, बाँज, फर, चीड़, हेमलक, बर्च, चिनार, और देवदार के घने जंगलों में,
तेज़ हवा और पानी की मिलीजुली आवाज़, हड्डियों को चीरती ठण्ड के बीच हिमालय में कहीं होने का अहसास होता हैये साम्य, अजीब खेल करता है, कुछ ही देर को सही, मैं घर से बहुत दूर घर जैसी किसी जगह में पहुँच जाती हूँ. 
 
ये इलाका आइसऐज़ के ख़त्म होने के बाद महाजलप्रलय के असर में बना है. आईसएज  के अंत में तेज़ी से पिघलते ग्लेशियर्स के कारण नदियों और झरनों में आयी बाढ़ के पानी से कटकर ज़मीन का बड़ा हिस्सा दर्रों में बदल गया.  जो हिस्सा या तो सीधे पानी से बचा रहा या अपनी ख़ास संरचना के कारण पानी के दबाव को झेल सका वों क्लिफ्फ़ बन गया. जो बह/कट  गया, जो परते पानी में घुल गयी, उनकी जगह खड्ड व दर्रे बनते रहे. ये प्रक्रिया कई बार हुयी है.  इसके अलावा, चट्टानों के बीच रिसते पानी का बर्फ़ बनना, फिर पिघलना, फिर जमना की अनवरत प्रक्रिया भी चट्टानओं को तोड़ती रही है.  पानी, हवा, से हुये भूक्षरण, ज्वालामुखी और भूकंप से हुये विध्वंस सबने लाखों-करोड़ों वर्षों में इस विहंगम लैंडस्केप को गढ़ा है.

नोर्थवेस्ट में रहते हुये उत्तराखंड में बिताये हुए अपने जीवन के पहले बीस वर्षों की याद आती है,  यहाँ के भोगोलिक साम्य के बरक्स इस इलाके को किस तरह विकसित किया गया है,  इसकी देखरेख किस तरह से हुयी है, इस पर भी अक्सर नज़र जाती है, और कुछ अच्छी बातें देखकर एक सपना बुनती रहीं हूँ कि ये चीज़े काश हिमालयी क्षेत्र में भी संभव हो सके. अपनी जीवन पद्दती, गैजेट्स, और विकास और बाज़ार की अवधारणा तो  अमेरिका की नक़ल में ज्यादा विद्रूप के साथ हिन्दुस्तान अपनाता ही है, काश की अच्छी बातों और नीतीयों का भी कभी अनुकरण हो सकता. 
 
मेरे घर से दो घंटे की ड्राइव पर , पोर्टलैंड शहर के बाहर, कोलंबिया रिवर गोर्ज सीनिक एरिया है जो कोलंबिया नदी के दोनों तटों पर पसरा हुआ है. चूँकि कोलंबिया नदी ऑरेगन और वाशिंगटन राज्यों के बीच की विभाजन रेखा है, अत: ये क्षेत्र इन दो राज्यों के बीच पड़ता है, जिसमे ६ जनपद(काउंटी), १३ शहर-कस्बे, और चार नेटिव अमेरिकन रिजर्व आते है. कोलंबिया नदी जो पहाड़ों के बीच से बहती दिखती है , दरअसल ये समुद्र तल से भी नीचे बहती है, और जो पहाड़ हैं, वो पहाड़ न होकर जमीन का वो बचा हुआ हिस्सा है जो पानी की धार से कटा नहीं, घाटी महज एक बड़ा दर्रा है. पहाड़ और दर्रे बिलकुल एक सा वितान, एक सरीखे. ये इलाका देखकर और आइसएज़ के बाद बने तमाम क्षेत्रों को देखकर समझ आता है  कि पहाड़ हमेशा जमीन के ऊपर उठने से ही नहीं बनते, जमीन के भीतर कटाव से भी बनते हैं. जमीन दरकती है, दर्रे बनते है, और बचा रह गया प्लेट्यू पहाड़.  विपरीत चीज़ों के बीच साम्य का भ्रम, पृथ्वी ऐसी ही है.  

उन्नीसवीं सदी के मध्य में , हिमालय की तरह यहाँ भी नेटिव पेड़ों का भारी मात्रा में कटान हुआ और इस इलाके में लकड़ी के टालों  और आरा मशीनों के अलावा कोई दूसरा उधोग नहीं था.  नेटिव वृक्ष  जब कट गए तो सिर्फ व्यवसायिक नज़रिए से ही यहाँ तेज़ी से बढ़ने वाले वृक्ष लगाए गये. 
 पहले विश्वयुद्द के बाद, लगभग सौ साल पहले इस क्षेत्र को पर्यटन स्थल की तरह विकसित किया गया, यहाँ अमेरिका का पहला सीनिक हाइवे, कोलंबिया रिवर हाइवे, १९१३-१९२२ के बीच बना. पहली बार किसी हाइवे के निर्माण के लिए भारी मात्र में मेटल–बेस्ड संरचना का निर्माण किया गया, जो इस हाईवे को लंबे समय से टिकाये हुये है. जब ये हाइवे बन रहा था तो इस बात का बड़ी बारीकी से विशेष ध्यान रखा गया कि गोर्ज के साथ कम से कम छेड़-छाड़ हो, इस सोच के इर्द-गिर्द इस हाईवे का निर्माण हुआ, जिसका श्रेय  वकील सैम्युअल हिल और इंजीनियर सैम्युअल लेंकास्टर को जाता है . 
१९३० तक आते आते बहुत बड़ी संख्या में पर्यटक गोर्ज को देखने आये और गोर्ज में अंधाधुंध कंस्ट्रक्शन न् हो इसकी चिंता बनी. १९३७ में पेसिफिक नॉर्थवेस्ट के क्षेत्रीय कमीशन ने गोर्ज को राष्ट्रीय महत्तव का क्षेत्र घोषित किया और इसे संरक्षित पार्क बनाने की पेशकश की. कई सालों तक प्रकृति प्रेमियों ने इस एरिया के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध होकर तथाकथित विकास को दूर ठेले रखा. अंत में १९८० में पोर्टलैंड की एक गृहणी नेन्सी रसल ने जागरूक नागरिक मोर्चा बनाया और इस एरिया के संरक्षण की फेडरल गवर्नमेंट से मांग की. आन्दोलन करीब ६ साल चला, और नेन्सी रसल इस आंदोलन का चेहरा बनी, उन्हें बहुत सी व्यक्तिगत धमकियां मिली, कार का एक बम्पर स्टिकर भी पोपुलर हुआ Save the Gorge from Nancy Russel”.  १९८६ में तत्कालीन रास्ट्रपति  रीगन ने इस पर दस्तखत किये, और अब गोर्ज हमेशा के लिए विकास की आंधी से बच गया है. 

अब ये क्षेत्र २९२,५०० एकड़ का कोलंबिया नदी के दोनों तरफ फैला है.  अब इस एरिया के विकास और प्राकृतिक सौंदर्य को बरकरार रखने के लिए एक स्वायत्त कमीशन है जिसके १३ सदस्य है, ३ सदस्य ओरेगन का गवर्नर और ३ वाशिंगटन का गवर्नर मनोनीत करता है. और ६ सदस्य  अपने जनपद से आते है. एक सदस्य फोरेस्ट डिपार्टमेंट से आता है. 

हालांकि विकास और रोजगार को दरकिनार करके प्रकति को संरक्षित किया जाय तो लोग हाशिए  पर आ जायेंगे, इसीलिए बहुत सचेत तरह से विकास की ज़रूरत होती है. इस इलाके में पर्यटन सीमीत है, लगभग हर साल २० लाख पर्यटक गोर्ज में आते हैं. रहने के लिए कोई बड़ा होटल नहीं है, सिर्फ कुछ पुराने घरों में बेड एंड ब्रेकफास्ट की व्यवस्था है, बाक़ी लोग दिनभर यहाँ घुमते हैं, और वापस पोर्टलैंड चले जाते हैं.  सिर्फ कुछ पार्किंग लॉट हैं, बहुत से हाइकिंग ट्रेल्स है, वाटर सर्फिंग और विंड सर्फिंग के ऑउटडोर स्पोर्ट्स है.

आज इस गोर्ज में बहुत से हाईटेक, कंपनियां है, सौ साल पहले जहाँ जगह-जगह आरामशीनें थी, लम्बर कंपनियां थी, अब  बहुत सी इंजीनियरिंग की कंपनियां है. जैसे डालास वाटरफ्रंट पर जहाँ अलुमिनियम की भट्टी होती थी, अब गूगल का डाटा सेंटर है.  अब इस एरिया में बहुत से विनयर्ड्स भी है.. २००४ में इस एरिया को अमेरिकन विटीकल्चर एरिया की आधिकारिक स्वीकृति मिल गयी है. गोर्ज गाइड के अनुसार यहाँ पचास से ज्यादा विनयर्ड्स में अंगूर की लगभग तीस किस्में उगाई जातीं हैं. अंगूर के अलावा इस इलाके में बड़ी मात्र में हिमालयन ब्लेक बेरी , हिसालू, सेब, पल्म, नाशपाती, आडू, खुबानी भी उगायी जाती है.
 
गोर्ज को देखकर तसल्ली होती है कि आने वाली पीढीयों के लिए ये जगह बची रहेगी. 


केदारनाथ और उत्तराखंड के दुसरे इलाकों में हुयी भयानक तबाही के बाद भी क्या उत्तराखंड के नीतिनिर्माता कोई सबक लेंगें . पर्यटन और हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्लांट्स के इतर प्रकृति से मेल जोल रखने वाली होर्टीकल्चर  इंडस्ट्री और सॉफ्टवेर और हार्डवेयर की इंडस्ट्री का विकल्प सोचेंगे? उत्तराखंड के मानव संसाधन को शिक्षित और कुशल बनाने के लिए क्या राज्य कभी इन्वेस्ट करेगा या पिछड़ी खेती को ही नए वैज्ञानिक आयाम देने की कभी पहल होगी ? या सिर्फ पर्यटन का ही ढोल बजाएगा जहाँ लोग सिर्फ होटलों के सर्विस सेक्टर और खच्चर पर सामान ढोनें वाले मजदूर ही बने रहेंगे.


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