"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Sep 15, 2013

ऑक्सफ़ोर्ड-पहला दिन

 हवाई जहाज़ की खिड़की  से लन्दन शहर दिखता है, शहर अपने अधिकतम सचुरेशन में बसा हुआ, एक दुसरे से सटी बहुमंजिला इमारते, आई ऑफ़ लन्दन, लन्दन ब्रिज, बीच में हाईड पार्क की बड़ी खुली जगह,  इस ठसाठस को देखकर फगोश होती है,  यूं ही नहीं हुआ कि ये लोग नयी जमीनों, नयी दुनिया की तलाश में इतनी आक्रमकता के साथ निकले…

हीथ्रू से ऑक्सफ़ोर्ड की राउंड ट्रिप बस टिकट ली.  बिना ग्रीटिंग और बिना मुस्कान के बस ड्राइवर ने कामकाजी तरीके से मेरी अटैची रखी, टिकिट दिया.  अमरीकी ड्राइवर अधिकतर खुशमिजाजी से मिलते हैं,  बातचीत के बीच हालचाल पूछते हुए अपना काम करते है.

बादल घिरे हैं, धूप  नहीं है लेकिन धुंध भी नहीं है, ठण्ड के साथ कुछ कम रोशनी वाला दिन है,  हीथ्रू से ऑक्सफ़ोर्ड जाते हुए, बस से एरियल व्यू का विलोम दिखता है; सड़क के दोनों ओर हरियाली, एक फार्म, घोड़ों का एक तबेला, एक जगह बंधी गायें, कुछ खुले घास के मैदान, मेरा क्लोस्टरोफोबिया कम हुआ.  पेड़ बहुत एकसार है, अमेरिकी वेस्ट कोस्ट के घने रेडवुड और डगलस फर और बूढ़े चीड़ -चिनारों के मुकाबिले बहुत बोने, झाड़ीनुमा नज़र आते हैं.   

ऑक्सफ़ोर्ड हज़ार साल से ज्यादा पुराना शहर,  लाल ईंट और खपरैल की छत वाली, आइवी की लतर से ढकीं इमारतें, इमारतों का खाका लखनऊ की रेजीडेंसी के खंडहरों की याद दिलाता है , जिन दिनों वो साबुत रही होंगी, शायद कुछ इसी तरह का दिखतीं होंगी.  बीच बीच में बहुत पुरानी पत्थर और मिट्टी की चिनाई वाले कुछ भवन और पुरानी दीवार भी दिखती है जो दसवीं-ग्यारवीं सदी की हैं.  इनके मुकाबिले ईंट-खपरैल के मकान नए और ज्यादा पहचाने हुए लगतें हैं .

हाई स्ट्रीट,क्वीन्स लेन बस स्टॉप, पर उतरकर मैप में  कोर्पस क्रिस्टी कॉलेज तक जाने का रास्ता ढूंढती, रोड़ी बिछी, संकरी  मेग्पई लेन से होते हुए अपेक्षाकृत चौड़ी, लाल कॉबलस्टोन की मरलॉट स्ट्रीट तक अटैची को घसीटना तकलीफ दे रहा है, अच्छा होता अगर बैकपैक लायी होती.

मेग्पई लेन, एक संकरी गली, असमतल सड़क पर अटैची को घसीटना तकलीफ दे रहा है, अच्छा होता अगर बैकपैक लायी होती.  मरलॉट भी लाल कॉबलस्टोन की बनी पुरानी संकरी सड़क है जिसके वाकवे पर पत्थर की स्लेट बिछी हैं, मरलॉट स्ट्रीट के दोनों किनारे  सटी हुयी,  एक के बाद एक इमारतें, और बीचों बीच पुराना भव्य चर्च है.  चर्च और इमारतों के मुख्य द्वार लकड़ी के बने मध्यकालीन किले के दरवाजों की तरह बड़े है, जिनके बीच एक आदमकद छोटा दरवाजा खुला है,  ये दरवाजे किसी कॉलेज या संस्थान के खुले दरवाजे नहीं लगते, इनके भीतर जाते हुए हिचक होती है, किसी अपरिचित घर में घुसने का अनमनापन होता है. इन इमारतों के नाम कहीं साफ़ साफ़ बड़े बोर्ड पर नज़र नहीं आतें, बल्कि एक तरह से इन नामों को खोजना पड़ता है.  ऑक्सफ़ोर्ड एक सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी न होकर लगभग ३९ स्वायत कॉलेजों का समुच्चय है, और इन कॉलेजों की भी अपनी अलग से परिधि नहीं है, इतना कह सकतें हैं कि एक मोहल्ले के भीतर अमुक इमारतें इस कॉलेज की हैं,  बाकी दो किसी दूसरे कॉलेज की टाईप, मेरे अब तक जाने पहचाने यूनिवर्सिटी के डिजायन से अलहदा अनुभव… 

मरलॉट स्ट्रीट  के आखिरी सिरे पर कोर्पस क्रिस्टी कोलेज की इमारत है, आज रविवार हैं, लगभग सन्नाटा है,  बड़े किलेनुमा द्वार के भीतर एक संकरे गेट से निकलकर पोर्टर मुझे गेट से सटे एक छोटे कोठरीनुमा ऑफिस में बुलाता है, दो चाबियाँ और एक पर्चे पर NB32 लिखकर देता है, एक मैप पर फिर मरलॉट स्ट्रीट के बीच निशान बनाकर छोड़ देता है.  पोर्टर   के चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं, सपाट चेहरा, नपे तुले शब्द, कोई उत्साह नहीं,  अमूमन अमेरिकी लोग उत्साह से मिलते हैं, हालचाल पूछते हैं और किसी तरह कैम्पस में हुयी दिक्कत के बारे में पूछते हैं.  यहाँ लगता है कि किसी कोड के साथ किसी आले में चाबी टंकी होती और मुझे उसके इंस्ट्रक्शन होते तो वो भी इतना ही इम्पर्सनल अनुभव होता.  ऑफिस की एक कोने की मेज पर एक बच्चा कम्पुटर पर खेल रहा है, इस पूरे सीन के बीच यही बात जानी पहचानी लगती है.  मैप और न्यू बिल्डिंग के नाम के आधार पर मैं एक होटल की बिल्डिंग में पहुंचती हूँ, दरबान अंदाज से दूसरी इमारत का इशारा करता है ,  मकानों के बीच कोर्पस क्रिस्टी की न्यू बिल्डिंग है, लोहे के दरवाजे की एक चाबी से गेट खोलकर अंदाजे से पत्थर के अहाते को पारकर एक छोटी चौमंजिले मकान के तीसरे फ्लोर के कमरे तक जाती हूँ, फिर कमरा मिलता है,  भारत में कोंफ्रेंस होती तो कोई स्टूडेंट ही  इस भूलभुलैया में किसी विजिटर को छोड़ आता,  अमेरिका में भी शायद अमूमन कोई हेल्प होती, नहीं तो ज्यादा साफ़ इंस्ट्रक्शन होते.   डोरमेट्री के छह कमरों के बीच एक टायलट और एक शावर है, दोनों में मुश्किल से एक आदमी के खड़े होने की जगह है, हिलने-डुलने की तो बिलकुल नहीं.   टॉयलेट में सीट कवर नहीं, वाश बेसिन में ठंडे और गर्म पानी का अलग अलग नल,  हाथ पोछ्नें के लिए एक पुराना टॉवल है, एयर ड्रायर या पेपर टॉवल नहीं है.   अमेरिकी यूनिवर्सिटी के डोरमेट्री के टॉयलेट्स इसके मुकाबिले शायद आठ से दस गुना बड़े, ज्यादा रोशन, होते हैं,  अमूमन भारत के भी जिन होस्टलों में मेरा रहना हुआ है, इन जगहों से वो भी तीन गुना ज्यादा बड़ी हैं.

लेकिन अमेरिकी यूनिवर्सिटीयों की कहानी महज २०० से १५० साल की है, भारतीय यूनिवर्सिटीयों की भी अधिक से अधिक सौ साल पुरानी.   ये हज़ार साल पुराने इतिहास के साथ तालमेल बनाते हुये, बिना ज्यादा छेड़छाड़ के एक लिमिट के भीतर नए खांचों को फिट करने की कोशिश का नतीजा है.
 पुरानी परम्परा, पुराने आर्किटेक्चर और पुराने संस्कारों के साथ ताल मिलाते हुए नए को जितना ज़रूरी है सिर्फ उतना जोड़ने की बात है, यहाँ पुराना अमूल्य है, प्राथमिकता उसके साथ किसी तरह की छेड़छाड़ न करने की है,  नये का जुड़ना इस परिवेश में अदृश्य होने, पुराने में समा जाने की की शर्त पर है….  

चर्च और मोनेस्ट्री की परम्परा की छाप अब तक ऑक्सफ़ोर्ड पर बनी हुयी है,  उसी परम्परा में पढाई-लिखायी, रिसर्च और तमाम तरह के बौद्धिक सिलसिले आगे बढे हैं,  पुराने और धार्मिक बौद्धिक परम्परा के सिलसिले  से निकले आज के ज्यादा सेक्युलर संस्थान हैं,  धार्मिक बौद्धिक परंपरा की स्वीकृति यहाँ की नींव है, आधुनिक शिक्षा उसके नकार पर नहीं खड़ी  है.

भारतीय आधुनिक शिक्षा भारत के पारम्परिक दर्शन, ज्ञान, परम्परा के नकार पर खड़ी  है, बाहर से थोपी गयी है.  इसीलिए ये शिक्षा संस्कार नहीं बदलती, पुराने के साथ जूझ सकने की कुव्वत, वहां की अच्छी चीजों के साथ आगे बढ़ने के दिशा में हमारी मदद नहीं करती.  शायद भारत में  संस्कृत की सघन बौद्धिक परम्परा,  हिन्दू-बौद्ध-जैन  तर्क-वितर्क की पुरानी परम्परा के सिलसिले, सूफीयों के दर्शन के सिलसिले में अगर हमारे शैक्षिक संस्थान होते,  तब  आधुनिक संस्कारों के लिए भी एक सहज सिलसिला होता,  एक संगत रास्ता  बनता.  अभी जो जनमानस की भाव और धार्मिक संस्कार की दुनिया है वो किसी तरह शिक्षा और बौद्धिक डिस्कोर्स के बीच जगह नहीं पाती, उसका विस्तार, उसका संस्कार नहीं बनता, उसके भीतर सवालों की जगह नहीं बनती, वो बंद की बंद दुनिया है, बंद दुनियाओं  के बीच ही लम्बे समय तक अज्ञान, अंधविश्वास, और विकृतियाँ छिपी रहती है.   ताश के पत्तों की तरह हमारी सेक्युलर स्टेट शायद इसीलिए भरभरा कर गिर जाती है …    

3 comments:

  1. अच्छा सुन्दर लेख/संस्मरण!

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  2. bahut hi acha sansmaran h medam,padte hue bahut acha laga

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