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Sep 17, 2013

गिरीश तिवारी "गिर्दा"

गिर्दा उत्तराखंड के लोककवि हैगिर्दा की कविता और उनका जीवन सामाजिक सरोकार से सरोबार हैगिर्दा की कविता राजनैतिक और क्रांतिकारी कवियों से कई मायने मे बहुत अलग है. उनकी बुद्धिमता आपको चकाचौंध नहीं करती, ना ही निराशा भरती है, ही अंगार बरसाती है. गिर्दा की लोक की समझ, भावों की तीव्रता, सीधे सादे तरीके से मनुष्य के मन से संवाद बनाती हैआशा भरती है, पर निठल्लेपन की आशा नही, बल्कि सामाजिक जीवन के रंगमच पर बुलावा देती हैजो भी है उसे बाँटने का, बिल्कुल पहाड़ी तरीके से, जिसमे औपचारिकता की कोई गुंजाईश  नही है. गिर्दा की कविताओ को उनकी आवाज़ मे सुनना अपने आप एक सुखद अनुभव है. गिर्दा के प्रसंशकों ने कुछ वीडियो youtube पर डाले है. उनके लिए लिंक है.......



गिर्दा की एक कुमायूँनी कविता का हिन्दी अनुवाद आप सब के लिए.................



जैंता एक दिन तो आयेगा


इतनी उदास मत हो

सर घुटने मे मत टेक जैंता

आयेगा, वो दिन अवश्य आयेगा एक दिन


जब यह काली रात ढलेगी

पो फटेगी, चिडिया चहकेगी

वो दिन आयेगा, जरूर आयेगा


जब चौर नहीं फलेंगे
नहीं चलेगा जबरन किसी का ज़ोर
वो दिन आयेगा, जरूर आयेगा


जब छोटा-बड़ा नहीं रहेगा

तेरा-मेरा नहीं रहेगा

वो दिन आयेगा


चाहे हम ला सके 

चाहे तुम ला सको

मगर लायेगा, कोई कोई तो लायेगा

वो दिन आयेगा


उस दिन हम होंगे तो नहीं

पर हम होंगे ही उसी दिन

जैंता ! वो जो दिन आयेगा एक दिन इस दुनिया मे,

जरूर आयेगा,



-उत्तराखंड काव्य से साभार














11 comments:

  1. वाह वाह जी मजा आ गया.अब एक पोस्ट शेखर पाठक जी पर भी हो जाये.

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  2. गिर्दा की याद दिलाने का शुक्रिया. जैंता एक दिन त आलो हमने भी ख़ूब गाया है.

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  3. पहाड़ी तो नहीं हूँ मगर कई पहाड़ियों के निकट रहा हूँ,गिर्दा मुझे भी बहुत अच्छे लगते हैं. ये कविता तो ख़ास तौर पर बहुत सुंदर है.

    वो सुबह कभी तो आएगी

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  4. पहाड़ी, मैदानी, देशी, विदेशी सबका स्वागत है! सब मेरे अपने परिवार के ही सदस्य है। !!!!

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  5. बहुत बहुत धन्यवाद । यदि कुमाऊँनी के शब्द भी दे दिये होते तो उन्हें सहेज लेती और लिखे हुए को समझना भी कुछ अधिक होता है । एक कविता को सुनती अन्य विडियो तक पहुँच बहुत देर से सुने जा रही हूँ । यदि कोई कुमाऊँनी कवियों या लेखकों की कुमाऊँनी में लिखी किसी पुस्तक के बारे में बता सके तो बहुत आभारी होऊँगी ।
    घुघूती बासूती

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  6. आज पहली बार आपके ब्लाग पर आना हुआ और अच्छा लगा। आपके कैंटीन के किस्से दिलचस्प लगे। गिर्दा की कविता पढ कर मजा आ गया हालांकि कुमांउनी में इस गीत का रंग ही कुछ और आता है। गिर्दा की बुलंद आवाज में गाए गए जनगीतों को कभी नहीं भुलाया जा सकता। आपकी ब्लाग में सामग्री की विविधता आकर्षित करती है। फिर मिलते हैं।

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  7. आप से पहले मिलना नही हुआ, अन्यथा आपको भी बताता कि गिरदा यहाँ न्यूजर्सी, न्ञूयार्क में आने वाले हैं। वैसे उनके प्रोग्राम को मैने अपनी उत्तरांचल की साईट पर डाला है, आपके लिये लिंक दे रहा हूँ।

    http://www.readers-cafe.net/uttaranchal/2007/09/26/jugalbandi-narendra-singh-negi-and-girda/

    http://www.readers-cafe.net/uttaranchal/2007/08/01/narendra-sing-negi-sekhar-pathak-girda-meet/

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  8. अशोक ने अभी यह लिंक भेजा है जिसे टूटी हुई बिखरी हुई पर लगा रहा हूँ. एक संदेह है- गिर्दा को तिवाडी लिखना चाहिये या तिवारी. आख़िर नाम में तो बहुत कुछ रखा है.

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  9. और हाँ आपके ब्लॉगरोल पर नज़र डाली, यहाँ आपने मेरे ब्लॉग का लिंक दे रखा है.आभार.पहली फुर्सत में आपको भी अपने ब्लॉग पर लिंक करके उऋण हो लूँगा.
    यहीं आपने अमितवा नाम भी रखा है जिसे आप अमिताभ लिखना चाह रही होंगी. आप जानती हैं कि पटना बॉर्न अमिताभ कुमार अमरीका में अध्यापक हैं और जाने माने लेखक पत्रकार.

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  10. Jan kavi Girda ke nahi rahne ki khabar se marmahat hun.Janwadi doston ke liye girda ka chale jana ek badi chati hai.Shradhanjali...
    A.K.Arun,Editor- Yuva Samvad

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  11. apki nyee post se yaha aayi hun..umeed se labrej kavita...wo din ayega....

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