"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Sep 27, 2013

गिरदा की छवियाँ

 "पहाड़'-19:  'गिरदा विशेषांक' (नवंबर 2015) में प्रकाशित


“हमन उज्याड़ि फिरि के करला
पछिल तुमरो मन पछताल
आपुंणो भलो जो अघिली कैं चांछा
पालो-सैतों करो समाल”
                      -----------वृक्षन को विलाप, गौर्दा    



झुसिया दमाई और गिरदा से मुलाक़ात


९८ के जनवरी या फरवरी की बात है, मैं उन दिनों लखनऊ में थी, पी.एच.डी. थीसीस जमा कर दी थी, एक साथ देश के भीतर नौकरी और देश के बाहर पोस्टडॉक्टरल रिसर्च फेलोशिप के लिए आवेदन कर रही थी, इन्ही दिनों शेखर दा का फ़ोन आया ‘यहाँ रवीन्द्रालय  में  झुसिया दमाई जी का कार्यक्रम हो रहा है, हो सके तो जल्दी आ जाओ’.  


अस्सी वर्ष से ज्यादा के झुसिया दमाई पारंपरिक ढोली की वेश में, उसपर घुँघरू बंधी गाय की पूँछ की करधनी, हाथ में हुड़का, और डमरू लिए, नाचते, अभिनय करते हुए एक के बाद एक वीरगाथाएं गाते, बिजली की चमक से पलटते, भाव और भंगिमाओं का कोई कोलाज गडमड होता, अदृश्य घोड़े, तीर, तलवार, घायल रणबाकुंरे, सब एक साथ मानों झुसिया जी की देह में ही रह रहकर अवतरित होते रहे.  नेपाल और कुमाऊं मे लोकगाथा गायन की तमाम बारीकियों को समझने परखने वाले अस्सी बर्षीय श्री झुसिया दमाई के बारे में लोगों को खास जानकारी नहीं थी, मैंने भी पहली बार उनका नाम सुना था, पहली बार ही उन्हें देखा था. हुन्गरे लगाने (संगत) के लिए उनकी दोनों पत्नियाँ साथ थी.



झुसिया दमाई बैतुड़, नेपाल के मूल निवासी थे, जो कई वर्षों से उत्तराखंड पिथोरागढ़ जिले के ढुंगातोली गाँव में रहते थे, उत्तराखंड व नेपाल के मौखिक इतिहास के विरल, संभवत: आखिरी भडौं गायक (वीरगाथा गायक) थे. २० साल की उम्र से अपने पिताजी के साथ झुसिया दमाई ने गायन शुरु कर दिया था. नेपाल (बैतुड़ के त्रिपुरासुंदरी के मंदिर में चैत्र, आश्विन और कर्तिक में भगवती, जगन्नाथ, पांडवगाथा, का विधिवत स्तुति गान उनकी वंश परम्परा थी, जिसे सात दशक तक उन्होंने निभाया. दीवाली की अमावस के दिन हर साल रणसैनी के मेले में शुरुआत झुसिया जी के गायन से होती.  झुसिया दमाई पर गिरदा ने शोध तैयार किया था और दमाई जी  जैसे कलाकार से बड़े समाज का परिचय गिरदा और पहाड़ की कोशिशों से ही संभव हुआ था. अस्सी वर्ष के बाद ही दमाई जी पर लोगों की नज़र गयी.


हुड़के के साथ गिरदा को पहली दफे वहीं स्टेज, रवीन्द्रालय में  झुसिया दमाई जी का कार्यक्रम  में देखा, सुना.  एक कथा से दूसरी कथा में जाते झुसिया जी बीच बीच में विराम लेते, और गिरदा अपनी गूंजती आवाज में कभी भावार्थ कहते, कभी संगत के लिए हिन्दी का तर्जुमा गाते, नेपाली और कुमाऊंनी न समझने वाले दर्शकों के लिए एंकर का रोल निभाते.  झुसिया दमाई को देखना-सुनना अद्भुत अनुभव था, गिरदा की उस आवाज की कोई छाया अब तक कहीं मन के भीतरी हिस्से में है. कार्यक्रम ख़त्म होने के बाद, जैसा अपेक्षित था, भीड़ ने गिरदा और दमाई जी को घेर लिया, परिचय का मौका गिरदा से उस दिन नहीं बना, शेखर दा से भारत छोड़ने के पहले वो पांच मिनट की बातचीत मेरी आखिरी बातचीत थी.


नौ वर्ष बाद २००७ में सूचना मिली कि  प्रवासी उत्तराखंडियों की संस्था ‘उना’ ने शेखर दा, गिरदा  और नरेन्द्र सिंह नेगी जी को अपने सालाना कार्यक्रम में न्यूजर्सी बुलाया है.  इन दिनों मैं और पंकज अपने दो छोटे बच्चों, के साथ इथाका में रह रहे थे. हमारे लिए जाना संभव नहीं हुआ, बाद में यूट्यूब पर उस प्रोग्राम  की झलक मिली और न्यूजर्सी में रहने वाले कई दोस्तों की बात सुनने को मिली.  सुजाता फर्नेंडिस, जो अपने विधार्थी दिनों में शेखर दा से परिचित रही है, और एक वर्ष के करीब उत्तराखंड में रही है, अब कई वर्षों से न्युयोर्क में है.  सुजाता ने ब्रेख्त फोरम में भी एक कार्यक्रम करवाया.   ब्रेख्त फोरम में आये अधिकतर लोगों को हिंदी नहीं ही आती थी, लेकिन गिरदा के सहज आत्मीय व्यक्तित्व, उनकी आवाज और अदायगी से लगभग हर कोई उनके प्रेम में बंध गया. अलग-अलग तरह से मुझे न्यूयॉर्क और न्यूजर्सी के दोस्तों से प्रतिक्रियाएं मिली, उनमें से एक रोचक प्रतिक्रिया ये भी थी कि गिरदा के दांतों की ठीक से रिपेयरिंग हुयी होती तो वो आवाज ज्यादा अच्छी होती.  मेरा कभी ध्यान नहीं गया, पंकज से पूछा तो उसको भी इसकी कोई याद नहीं है.  जिस गिरदा को हमने जाना-सुना उसी से हमें प्यार हो गया, गिरदा के व्यक्तित्व की मिठास का स्रोत उनका जिया हुआ जीवन था, वंचित जन के लिए उनकी बेपनाह संवेदना थी, उनकी मिठास बहुत भीतर की चीज़ थी, गिरदा के दांतों, तमाम बाहरी चीज़ों से उसका लेना देना नहीं था. जाने पहचाने अर्थों में गिरदा वैसे परफोर्मर भी नहीं थे, और अच्छा है कि परफोर्मर नहीं थे, विपन्नता के बीच गर्वीला जीवन जीने वाले कलाकार थे.  


कभी-कभी अच्छा भाग्य होता है, मुलाक़ात असंभव परिस्थिति में भी हो जाती है, शेखर दा, गिरदा, और नरेन्द्र नेगी जी ने इथाका आने का समय निकाला, और तीन-चार  दिन उनके साथ रहने का मौका बना. गिरदा और नेगी जी से ये मेरी पहली मुलाक़ात थी. ९८ में दमाई जी के कार्यक्रम में जिस चेहरे और आवाज से परिचय हुआ था, अब उस समूचे गिरदा से आमने सामने मिलना हुआ.  तीन-चार दिन इथाका में हमें गिरदा की सोहबत का मौका मिला.


घर में गिरदा और देश दुनिया के क़िस्से  


गिरदा  यूँ तो मेरे पिताजी  से आयु में दस बरस बड़े थे,  अपने से छोटो के साथ  बराबरी के जिस  भाव और अपनेपन से वो मिलते, बरताव करते थे, वो ताऊ, या मामा नहीं हो सकते थे, वो गिरदा ही थे—पांच बरस के बच्चे से लेकर सौ बरस के बूढो तक सबके ‘गिरदा’—इन सारी पीढ़ीयों में एक साथ.  गिरदा बात करते हुये फट से रसोई में बरतन धोने चले जाते, चूल्हे में झांक अाते,  किसी भी नयी चीज को बालपन की भौंचक नज़र से देखते, फिर उतनी ही संजीदगी से िकसी बात पर कोई राय पूछते, कोई क़िस्सा सुनाते. गिरदा को बहुत खांसी हो रही थी, और उनकी सिगरेट उसमें इजाफा कर रही थी.  शेखर दा की रजामंदी  से मैंने गिरदा की सिगरेट छिपा दी, बीच बीच में गिरदा अपनी सिगरेट के लिए मनुहार करते. फिर किसी बात में उलझ जाते.



बातचीत के बीच कुछ बात मेरे कामकाज और रिसर्च पर भी आयी. कुछ बात जी.एम.ओ. फसलों और दुनिया भर में इस तकनीकी के विरोध में उठी आवाजों के बारे में भी हुयी. मैंने उनसे कहा कि जी.एम.ओ. फसलों के पक्ष-विपक्ष को निरपेक्ष तरह से देखती रही हूँ. तकनीकी चाहे परमाणु ऊर्जा की हो या जैव तकनीकी, उसका अच्छा या बुरा होना इस बात से तय होता है कि अंतत: उसका समाज में किस तरह से उपयोग होता है, उसे क्रियान्वित करने वाली राजनैतिक और आर्थिक ताकतें किस नीयत से उसे प्रमोट करती हैं, रेगुलेट करती हैं, सरकारे व्यापक जन समूह की भलाई के हित में नयी तकनीकी के कारोबार को निगोशिएट करती हैं या नहीं.  हमेशा नयी तकनीकी की समझ और इन पर कंट्रोल बड़ी ताकतों का रहता है. जन अन्दोलान्कारीयों के पास हमेशा इस समझ की कमी रहती है कि नयी संभावनाओं को कैसे आवाम के हक में निगोशिएट किया जाय, इसीलिए उनके पास सिर्फ विरोध का ही विकल्प बचता है. जी.एम.ओ. फसलों से लम्बे समय में होने वाले एक नुक्सान से मुझे ज़रूर चिंता होती है कि भारत जैसे देश में जो जैव-विविधता का एक बड़ा केंद्र है, मुनाफे के लिए सिर्फ एक तरह की फसल को उपजाना भविष्य में बड़े संकट खड़े करेगा, और इस जैव विविधता को नुकसान पहुंचाएगा. जैव विविधता के बाबत फिर फसलों की उत्पत्ति पर बात हुयी, फिर गिरदा ने एक पुरानी कहानी सुनाई.


“एक परिवार अपने भोजन के लिये सिर्फ चावल का एक दाना हांडी मे पकाता था, और हांडी भर जाती थी, जो सब के लिये पर्याप्त होती थी. एकदिन अचानक कुछ मेहमान आये और एक की बज़ाय दो दाने मिलाकर गृहणी ने पकाये और नतीजतन  हांडी के आधे चावल कच्चे और आधे पके, सभी को भूखा रहना पड़ा”.


इस लोककथा में  संभवत: धान की जैव-विविधता और उत्पत्ति की कहानी का विम्ब ही छिपा है. शायद ये उन दिनों की कहानी हो जब  धान की विविध प्रजातियाँ यहाँ जंगल में उगती हो जिनके दानों को लोग बटोर लेतें हो, विधिवत खेती की शुरुआत न हुई  हो.  गिरदा के पास लोक स्मृति के जाने कितने खजाने थे.गिरदा और नेगी जी से बहुत से गीत सुने, गिरदा फैज़ को, फिर फैज़ की रचनाओं का कुमाऊँनी में अनुवाद सुनाते रहे, बीच बीच में हुड़का ठीक करते गिरदा,  उन्होंने अपना हुड़का खुद बनाया था, इस तरह का पारंपरिक पहाड़ी ड्रम बाजार में नहीं मिलता, कैसे हुड़का बना, किन सामग्रीयों से हुड़के के अलग-अलग हिस्से बने बताते रहे, नरेन्द्र नेगी ने भी अपने किस्से बताये कि घर में किस तरह अपना हुड़का बनाने को लेकर उनका विरोध हुआ. पारंपरिक रूप से सवर्ण का हुड़का बनाना बजाना पहाड़ में नहीं था. हुड़का मुख्य रूप से नाचने-गाने से जीविका चलाने वाले ‘बादी’ (नट) का ही था. लोक कला को जात-पांत की परंपरा की जकड़न से बाहर समूचे में क्लेम करने का हुनर गिरदा में बहुत पहले से था, उत्तराखंड के कई लोक कलाकारों गिरदा ने ही खोजा, जिनमें गोपाल बाबु गोस्वामी, सूरदास हरदा, झुसिया दमाई शामिल है. गिरदा को बिजेंद्र लाल साह जी ने ढूँढा था और गिरदा कई मायनों में लोककवि गौर्दा,  बिजेंद्र लाल साह और मोहन उप्रेती की परम्परा के वाहक थे.      



शेखर दा ने बातचीत में कहा कि अपने सब्जेक्ट के बारे में, देश दुनिया से उसके सम्बन्ध के बारे में मुझे लिखते रहना चाहिए. मैंने उनसे कहा कि पहले तो लिखना किसके लिए होगा, और दूसरा तकनीकी शब्दावली को पठनीय हिन्दी में लिखना मेरे बस से बाहर की बात है, फिर लिखने में समय लगाऊं भी तो इतने समय मेरी जीविका कैसे चलेगी? किसी तरह कुछ लिख भी लिया जाय तो उसे छापेगा कौन? फिर अपने लिखे को छपने के लिए अलग से कसरत, मुझसे नहीं होगा. गिरदा धीरे से हँसे, कहा कि ‘जीवन में सब काम सिर्फ जीविका की शर्तों पर नहीं होते.  कुछ काम अपने मन की खुशी और सपनों के लिए भी होते हैं’.  गिरदा ने और शेखर दा ने कुछ साल पहले ही स्वेच्छाअवकाश ले लिया था और अपने मन के काम कर रहे थे, गिरदा मीठी आवाज में गाये ‘दिल की खाने में वक़्त लगता है, दिल लगाने में वक्त लगता है’.


इस बातचीत के बाद संयोगवश ब्लोगर पर हिन्दी लिखने की सुविधा का पता चला, हिन्दी भाषा के साथ बरसों पहले टूटा मेरा लिखने का सम्बन्ध फिर से जुड़ गया, जो भी मन में आया लिखा, गलत वर्तनी के साथ, गडमड विचारों के साथ, कभी भावुकता के आवेग में ही. इससे पहले कई सालों से सिर्फ कवितायें लिखती थी, वो भी छुपाकर.  अब इस उम्र में भी छिपाकर लिखने की वैसी जरूरत नहीं रही, तो कई दफे सिर्फ कवितायें ही लिखी. समय की मारामारी के बीच भी अब कई चीजे लिखने का मन करता है, शायद किसी दिन लिखते-लिखते सचमुच कुछ लिखना होगा….


कोर्नेल यूनिवर्सिटी और नियाग्रा में गिरदा
कोर्नेल यूनिवर्सिटी का  साउथ एशिया विभाग समय-समय पर नेपाल व हिमालय पर कार्यक्रम करता रहता है, हालाँकि जुलाई से सितम्बर के बीच आमतौर पर  सेमिनार नहीं होते, लेकिन विभाग के मैनेजर वलियम फ़ेलन से जब मैंने हिमालयी क्षेत्र में शेखर दा के काम का ज़िक्र किया तो विलियम ने बहुत उत्साह से एक विशेष लेक्चर अपने विभाग में आयोजित किया.  उत्तराखंड हिमालय पर शेखर दा ने लेक्चर दिया, जिसकी समाप्ति गिरदा, नेगी जी और शेखर दा के सामूहिक गान से हुयी. हिमालय को उसके भूगोल, इतिहास और हिमालयीजन के जीवन पर विस्तार से जानने का ये मेरे लिए भी मौका था.  कुछ मित्र परिचितों के साथ बातचीत करते  हुए पॉटलक भोज के बीच हमारी शाम गुजरी. अगले दिन फिर शेखर दा विलियम के साथ कई दुसरे लोगों से मिलते रहे.  तीसरे दिन पंकज के साथ तीनों लोग इथाका से नियाग्रा के लिए निकले. पंकज अब भी नियाग्रा जाते समय रास्ते भर गाने गाते हुए पहुंचने के अच्छे दिन को याद करते हैं. रात करीब दस बजे ये सब लोग इथाका लौटे, किसी तरह मुझसे दोनों बच्चों को सँभालते हुए सिर्फ खिचड़ी बनी, वही सबने प्रेम से खायी, फिर बात होती रही देर रात तक,  अगले दिन फिर सुबह से देर दोपहर तक.  


 गिरदा के पास किस्सों का खज़ाना था, लोककथाओं से लेकर अपने जीवन के अनुभवों का, और विराट  स्नेह  संसार में बंधे अनिगनत मित्र-परिचितों के क़िस्से भी जैसे उनके अपने ही क़िस्सों का विस्तार था. जिन लोगों से हम कभी मिले  नहीं, जिनका  पहले नाम भी नहीं सुना,गिरदा के मार्फ़त उनसे एक आत्मीय परिचय बना, लोगों को जोड़ने, उस तरल आत्मीय संसार के विस्तार की, उसे लबालब भरते रहने का उनका स्वभाव बेमिसाल था.  गिरदा के ये क़िस्से भी उनकी मन की अमीरी, मन की मरोड़  और जीवन के दिल तोड़ अनुभवों के बीच की आवाजाही का ही वृत्तांत थे.  गिरदा बात बात में कह गए ‘यात्रा भी सबसे बडी अपने भीतर ही होती है, मंथन भी’.
फिर विदा हुयी, मन हम सबका भीगा ही था, गिरदा की आँखे भी भीगी और फिर जाते जाते उन्होंने अपनी रुलाई भी नहीं रोकी.  तीन-चार दिन का सम्बन्ध नहीं था, लगता रहा की वे हमेशा से हमारे आत्मीय थे, घर परिवार के थे.      


लोक के कवि गिरदा


गिरदा अपने समूचेपन में उत्तराखंड की कई पीढीयों के बीच लोकचेतना के वाहक, संस्कृतिकर्मी थे. परम्पराओं की समझ रखने वाले, अपने समय के लोगों की पीड़ा से विचलित, और ताउम्र अपने लोगों के लिए सपने देखने वाले आन्दोलनकारी. गिरदा बखूबी समझते थे कि  पहाड़ के दूर दराज के गांव से  निकलकर देश के कोने-कोने   में पहुंचे पहाड़ के गरीब लोगों की भटकन, पीछे छूट गये परिवार की विपदा, पहाड़ के जल जंगल और संसाधनो का दोहन, खनन, हिमालय का लगातार टूटना, सबके सिरे  आपस  में उलझे हैं. पहाड़ के जन और प्रकृति को  केंद्र में रखे बिना  िवकास की कोई योजना कभी कारगर नहीं हो सकती. ये बात बहुत सादा तरीके से गिरदा बताते रहे, सत्तर के दशक में चिपको आन्दोलन के समय गिरदा कहते रहे  …

“ढुंग बेचा, माट बेचो, बेची खै  बज्याणी
लिस खोपी -खोपी मेरी उधेड़ी दी खाल”


बीसवीं सदी के आखिरी दशक में जब अलग उत्तराखंड राज्य का आन्दोलन परवान चढ़ा, तब उस राज्य के सपने में, सबसे मजबूर और हाशिये पर खड़े जन की बेहतरी के सपने को गिरदा अभिव्यक्त करते रहे, उस सपने को सींचते रहे...

“बैणीं फांसी नी खाली जाँ रौ नि पड़ल भाई
मेरी बाली उमर नि माजौ तलिउना  कढ़ाई
रम, रैफल, ल्य्फ्ट -रैट  कसि हुंछों बतुलों    
हम लड़ते रैया भुली ! हम लड़ते रूलो !”


उत्तराखंड राज्य बन जाने के दस साल बाद तक, अपने आख़िरी  दिनों  तक, गिरदा इस सपने को  पीठ पर लादे, धरनों पर बैठे, मचंपर, सड़क पर, जुलुस में, जहाँ भी मौका मिला पहाड़ के विकास के विनाशकारी मॉडल के विरोध में अपना मत दर्ज करते रहे.


गिरदा के भीतर का जो कवि था, कलाकार था, नाटककार और निर्देशक था वो अपनी इसी राजनैितक चेतना को सीधे सरल तरीके से लोगों के बीच ले जाने का काम करता था. उसके सब खेल, सारी धुन, सारी रंगत, सारा जीवन भी इसीलिए था कि  कैसे भी हो ये सूरत बदलें. गिरदा ने अपनी कवितायें आमतौर पर जलूस के बीच, नुक्कड़ नाटक या उत्तराखंड में हुए विभिन्न आन्दोलनों  की तत्कालिक जरूरत, और क्षोभ के बीच लिखी, बहुत सी कवितायें अपनी दूधबोली कुमाँऊनी में लिखी, फैज़ को भी कुमाँऊनी में अनुवाद किया, सब तुरंत-फुरंत, लोगों के ठीक बीचोबीच.  कविता से उनका सरोकार शायद इतना ही रहा हो कि लोगों के मन तक अपनी बात सरल भाषा और लय के साथ पहुंचा सकें, उनके मन में कोई बात सीधी तरह से बिंध जाय, याद रह जाय या फिर गिरदा ही लोगों की पीड़ा को सरल तरह से, उनकी अपनी बोली-भाषा में कह सकें.


अपनी समझ का इस्तेमाल गिरदा ने कविता को चमकाने के लिए  नहीं िकया, क्राफ्ट के साथ कोई विशेष प्रयोग नहीं किये, हालाँकि कहन के लिए कुछ पॉपुलर जुमलों, पहाड़ के लोगों के मन में धंसे पॉपुलर बिम्बों का उन्होंने प्रयोग किया, कुछ पंक्तियाँ बार-बार कई कविताओं में आयी है. शायद कभी सचेत तरह से किसी कविता में कोई संशोधन भी नहीं किया गया. हिंदी कविता के संस्कार से गिरदा की कविता और उनके गीत अलग हैं, आधुनिक हिंदी कविता के जाने संसार से अलहदा.  समाज के कविता से विमुख होने की बात गिरदा नहीं किये, जिस समाज के बीच वह  थे, वहां लोगों ने खूब उनकी कविता और गीतों को गया, बहुत प्रेम से गाया, आगे भी गाते रहेंगे, क्यूंकि गिरदा और उनकी कविता ठीक जन के बीच जन्म लेती रही, उन्ही के लिए  लिखी गयी, उन्होंने ही उसे गाया भी. गिरदा की कविता से मेरा एक मात्र सीधा परिचय ‘उत्तराखंड काव्य’ और इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री तक सीमीत है, और इसी के देखे ये चंद बातें हैं.  गिरदा लिखी-पढ़ी जो पीछे छोड़ गए हैं, जब प्रकाशित होगी, तो  गिरदा को जानना कुछ और बढेगा.


विदा, गिरदा
 
गिरदा के हिन्दुस्तान लौटने के बाद मेरी तीन बार उनसे फ़ोन पर बात हुयी, लम्बी बात हुयी, फिर से मिलने की बात भी हुयी.  २०१० में मेरा महीने भर के लिए भारत जाना हुआ, उम्मीद थी कि इस बीच अपने घर परिवार से अलग कुछ उत्तराखंड को देखकर, गिरदा और पुराने नैनीताल के मित्रों से मिलकर आ सकूँ. इस बीच एक अच्छा काम विद्यासागर नौटियाल जी से मिलना हुआ, उनकी कुछ बातचीत रिकॉर्ड की. मेरा नैनीताल जाने का प्रोग्राम था, १७ अगस्त को मैंने गिरदा के घर फोन किया तो पता चला कि वो अस्पताल में हैं, फिर उन्हें हल्द्वानी ले जाया गया.


विद्यासागर नौटियाल जी से गिरदा की तबीयत का ज़िक्र किया, अपनी तरह से गिरदा को उन्होंने प्रेम से याद किया और ये भी कहा कि  ‘गिरदा कुछ कम अराजक होते, कुछ अनुशासित तरह से लिखते होते तो उनके अनुभवों का खजाना बहुत बड़ा है’.  २२ अगस्त को गिरदा ने विदा ली. उसके बाद नैनीताल जाने की मेरी हिम्मत टूट गयी, बिना गए ही मैं लौट आयी. बहुत बार गिरदा के बारे में लिखने की बात मन में आयी, दो चार लाइन से ज्यादा नहीं लिख सकी.वापस लौटकर नौटियाल जी का इमेल मिला


“ उस दिन मैंने गिरदा की जीवन शैली की बात शुरू की थी, आपने बताया था कि आपने उनकी पत्नी से बातें की है, लेकिन गिरदा उसके दो तीन दिन बाद ही हमें छोड़ कर विदा हो गये. मैं हतप्रभ हूँ, पहाड़ क्या इस देश के अन्दर अब कोई ऐसी शक्सियत कभी जन्म नहीं लेगी, वे जिस युग के अनुभवों को साथ लिए चलते थे, वे दिन ही कभी वापस नहीं आने वाले  हैं “.

गिरदा से अब फिर कभी मिलना नहीं होगा. दुबारा तो नौटियाल जी से मिलना भी नहीं हुआ, मनमौजी, भावनाओं के आवेग में जीने वाले गिरदा और बेहद अनुशासित, सचेत, प्रतिबद्ध जीवन जीने वाले नौटियाल जी, दोनों से अब मिलना नहीं होगा, शायद दोनों जैसा अब कोई कभी नहीं होगा…, मुझे कुछ अक्ल होती तो सिलसिलेवार तरीके से गिरदा से इथाका में कुछ बातचीत करती, कुछ सचेत तरह से उनके अनुभव जानने को मिलते. उनसे बात करते हुये ये यही लगा कि इतनी ही सहजता से गिरदा फिर मिल जायेंगे. उनके जाने के बाद, उन्हें  याद करते हुये, दुसरे तमाम लोग जो गिरदा से मिले उनके मार्फ़त अब गिरदा को कुछ और जान सकूंगी. उन्हें चाहने वाले मेरी नज़र के देखे गिरदा को कुछ जान सकेंगे, इसी उम्मीद में लिख रही हूँ.

5 comments:

  1. बहुत सुंदर और आत्मीयता से लिखा हुआ है गिरदा के बारे में सुषमाजी. सबके अपने अपने गिरदा हैं. छोटी सी मुलाकात हो या लंबे सिलसिले, उस आदमी में कुछ ख़ास ही बात थी. ऐसे लोग अब कितने कम हो गए हैं...ऐसी अद्भुत मिठास वाले...ऐसे बबा कहने वाले...ऐसे निश्छल..

    शिव, देहरादून

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  2. संस्मरण पढ़कर मन भावुक हो गया। वे दृश्य भी याद आए जब तुम कितने सात्विक भाव से इनकी बातें करते हुए लगातार निमग्न हो गई थीं। मुझे तभी लगा था कि इन के विषय में कहने को कितना कुछ तुम्हारे मन में हुलस रहा है। उसे बाहर आना ही चाहिए। अभी और भी संस्मरण हैं...विशेषतः उनके तुम्हारे यहाँ रहने और विनम्रता के, जो मैंने उस दिन सुने थे।

    कैसे-कैसे विशिष्ट लोग कई बार हमारे आसपास रहते और चले जाते हैं... कई बार तो हम उनके जीते जी उनका मूल्य ही नहीं समझते। कुछ हमारा बालपना भी बहुधा होता है। गिरदा को नमन। नौटियाल जी स्वयं एक देवपुरुष ही थे। बस स्मृतियाँ शेष रह जाती हैं.....

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  3. ये संस्मरण हमे भी उनसे जोड़े रखते हैं जिनसे चाहे हम कभी मिले भी नहीं और उनकी बातें हमेशा मार्गदर्शन करती रहती हैं । एक हिम्मत सी आती है कि इनके बड़े बड़े क़दमों में कभी कुछ छोटा सा योगदान हम भी कर सकें
    जीवन में सब काम सिर्फ जीविका की शर्तों पर नहीं होते

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  4. आज फिर पढ़ा।बहुत अच्छा लिखती हैं।समय निकाला कीजिए।

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  5. आप बहुत भाग्यवान हैं जो गिर्दा से मिल सकीं.आपका लेख पढ़ ऐसा लगा जैसे आपके जरिए हम भी उनसे मिल रहे हैं.
    इस अक्टूबर कुछ दिन के लिए कुमाऊं जाना हुआ. काश यह कुछ साल पहले किया होता और गिर्दा से मिलना हो जाता!
    घुघूती बासूती

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