"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Dec 7, 2013

जयपुर -आगरा-2013

जयपुर 
सुबह सुबह दिल्ली से जयपुर के रास्ते में गाँव, खेत, छोटे कस्बों की कुछ झलक दिखती है,  घरों के नाम पर सिर्फ ईंटों का ढेर नज़र आता है, बहुत कम घरों पर पलस्तर है. महानगरों से बहुत पीछे छूटे समय और साधनों की ये कोई दूसरी दुनिया है, कच्चे रास्तों और खेत की मुंडेरों के बीच ऊंट की सवारी की उबड़-खाबड़ दुनिया है.  दूर-दूर तक जुते हुए खेत दिखतें हैं, सुबह के नीम उजाले में टीले-पहाड़ दिखतें हैं, गाँव के किसान मर्द, औरतें, बच्चे दिखतें हैं,  ये दुनिया मुझे दिल्ली से ज्यादा सुकून देती है.  इस बड़े मुल्क का पेट भरने के लिए ऐसी ही जगहों में अनाज उपजता है.

जयपुर में सिर्फ दो मिनट के लिए शताब्दी रुकती है, दस मिनट पहले ही बच्चों के साथ हम दरवाजे पर खड़े हो गये,  हमारे ठीक पीछे ३०-३५ साल  का एक आदमी खड़ा हुआ, अजीब अक्खड़, रूड, शायद दिल्ली-गुड़गाँव में कोई ठीक-ठाक नौकरी करने वाला.  उसकी जल्दबाज़ी देखकर लगा कि हो न हो वो बच्चों को धक्का मारने में गुरेज नहीं करेगा.  मैंने उससे कहा कि तुम ही आगे चले जाओ.  स्टेशन पर टैक्सीवाला बहुत अच्छा और सभ्य इंसान मिला,  उसकी टैक्सी चुनाव प्रचार में लगी हुयी थी, हफ्ते भर बाद राजस्थान में चुनाव हैं, लगता है सभी प्राइवेट टैक्सीयां अमूमन दिन के कुछ घंटे इस काम में लगी हैं. फिलहाल कॉंग्रेस की सरकार है लेकिन मोदी, भाजपा की भी हवा बनी हुयी है.  बाक़ी फैसला देश के लोग करेंगे ही… 

पहली नज़र में जयपुर में जो भी आँखों को भाता है, वो पुराना है,  अरावली पहाड़ी पर सदूर तक फैली चीन की दीवार सरीखी दीवारों से घिरे किलें,  उनकी संगमरमरी, लाल बलुवा पत्थरों की भीत पर बेल बूटे,  फूल पत्तियां,  भवरें, तितलियाँ, झिर्रियां, झरोखे;  हवामहल के दोनों तरफ पुरानी गुलाबी इमारतें, सामने पब्लिक लायब्रेरी, संग्रहालय, जलमहल और झीलें.

हमारे साथ आमेर किले की घुमाई के लिए पंकज के मामा जी व  मामी जी हैं.   मामा जी आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के रिटायर्ड इंजिनीयर हैं, राजस्थान के किलों, ताजमहल समेत भारत भर की कई पुरानी इमारतों और कम्बोडिया के शिव मंदिर के रिस्टोरेशन प्रोजेक्ट्स में उनकी भागीदारी रही है.  वो हमें किले के भीतर पानी के संग्रह की तकनीक, अलग अलग मौसम के अनुकूल बने किले के हिस्से, हवा, पानी रोशनी को ध्यान में रखकर किया गया कंस्ट्रक्शन, आर्किटेक्चर की कुछ बुनियादी बातें बताते रहे. इस पुराने से मोह होता है, इस बात की खुशी भी होती है कि ये सब पांच सदियों के बाद भी बचा है, अच्छी हालत में है .

अतीत के रजवाड़ों की भव्यता को जरा किनारे रखकर आजादी के बाद पनपा, जो आज का जयपुर दिखता है, वो बाक़ी हिंदुस्तान के सब छोटे-बड़े शहरों की तरह ही है,  बेतरतीब, ईंट-गारे-सीमेंट का ढ़ेर,  सब तरफ कूड़ा कचरा, बिखरा हुआ है,  शहर में किसी संगत प्लानिंग के कोई चिन्ह नहीं है.  मालूम नहीं दूर देहात के क्या हाल हैं. चौकी ढाणी की तर्ज़ के सिम्युलेटेड गाँव देखकर सिर्फ विदेशी ही नहीं, हमारे दिल्ली, देहरादून तक के मध्यवर्गीय लोग भी निहाल हुए रहते हैं.  मेरे जैसों को ये मज़ाक ही लगता है, जिनका असली गाँवों के बीच बचपन बीता है,  जिन्होंने गाँवों में लोगों की दरियादिली और बाक़ी दुनिया से अलगथलग छूट जाने की हताशा देखी है. जिनकी स्मृति में रूपकवँर और भंवरी बाई हैं.  जिन्हे ये बात भूलती नहीं है, आधुनिक भारत के विकास के स्केल पर सबसे पिछड़े पांच राज्यों में से एक राजस्थान भी है, 'बीमारू' के बीच का 'र'.  उम्मीद करती हूँ  हमारे इसी जीवन में उत्तर भारत के राज्यों के लिए बीमारू संज्ञा बदल जायेगी, अतीत की छाया से निकल कर आधुनिक हिंदुस्तान की समृद्धि, शिक्षा और लोकतान्त्रिक जीवन पद्धति में इनका क्लेम बढ़ेगा.

आगरा 
दिल्ली आगरा हाइवे से साढ़े चार घंटे में आगरा पहुंचे, टैक्सी का ड्राइवर उत्साह से भरा हुआ नौजवान है, और अनौपचारिक रूप से हमारे गाइड की भूमिका भी निभा रहा है.  रास्ते में चीतल, हिरन और तीन नील गाय दिखीं,  अमूमन नील गाय बहुत शर्मीला जानवर है, बहुत देर तक सामने नहीं रहती, इतने पास से पहली बार मेरा भी नीलगाय को देखना हुआ.  आगरा शहर में शायद यमुना पर नया ब्रिज़ बना है , पुराने  को तोड़ कर जो लोहे के खांचे, सरिया, मलबा निकला है वो सड़कों पर बिखरा पड़ा है.   जितना शहर दिखता है, लगता है यहाँ खुदायी अभियान चल रहा है, कोई भूकम्प के बाद का मंजर है.  ताज के पार्किंग लॉट में भी अव्यवस्था है, कार पार्क करने की ठीक से जगह नहीं बनी है,  पार्किंग लॉट जरूरत के हिसाब से बहुत छोटा है और उसके बावजूद, ऊँट की बग्गियां, टाँगे, रिक्शे लगातार उस जगह को और तंग बनाते हैं.  वहाँ से ताजमहल एक मील भी नहीं है , लेकिन फिर भी ये गाड़ी वाले पीछे पड़े रहते हैं,  इस गेट से ताजमहल के मुख्य दक्षिणी दरवाजे की दूरी तक जहाँ तक ये बग्गियां जाती है, सब जगह गंदगी भरी पड़ी है।  सड़क के दोनों तरफ पैदल चलने के लिए ठीक ठाक पेवमेंट बना हुआ है, पेवमेंट और सड़क के बीच पानी की निकासी के लिए नालियां हैं लेकिन उनमें कीचड़ भरा है,  पेवमेंट पर चलते हुए उबकायी आती है, सड़क पर एक के बाद एक ऊँट और घोड़े लीद  गिराते जाते हैं, बावजूद इसके की ऊंटों ने डाइपर पहने हुए हैं.  भारत की सबसे अज़ीम इमारत ताजमहल तक पहुँचने के एक मील से कम रास्ते को भी साफ़ सुथरा रखने की कोई व्यवस्था नहीं है. आप सुकून से आधे घंटे चल सके ये हो नहीं पाता.

खैर जैसे-तैसे टिकट मिला और फिर मुख्य दरवाजे पर लम्बी लाइन.  ड्राइवर हमें किन्ही पतली गलियों के बीच से लाकर पश्चिमी दरवाजे तक लाता है , लाइन वहाँ भी लम्बी है , औरतों की लाईन यहाँ दुगनी है, लेकिन आखिरकर जब एक बार भीतर जा सकी तो फिर ताज के परिसर की भव्यता नज़र आयी, लाल बलुवा पत्थरों से बनी चारदीवारी, दक्षिणी और पश्चिमी द्वार,  पश्चिम में खूबसूरत मस्जिद, पूरब में मेहमान खाना, फिर ठीक यमुना के किनारे ताज महल, नीले आसमान के बीच सफ़ेद मोती की तरह,   धूप भरी दोपहर है, ताजमहल को छोड़कर बाकी सब कुछ बुझा बुझा सा है, लेकिन ताजमहल की परावर्तित रोशनी में चौंध नहीं है, कुछ बहुत मुलायम सी बात है.  पूरा परिसर साफ़ सुथरा है, जितना सम्भव हो सकता है उसकी मेंटेनेंस ठीक है. आज इतवार के दिन बहुत भीड़ है, कुछ फेवरेट स्पॉट पर दो मिनट  खड़े होकर फ़ोटो खिंचवाने की होड़ लोगों के बीच लगी है, लेकिन सब शांतिप्रिय ढंग से हो रहा है, कोई धक्कामुक्की या अभद्रता नहीं है.

ताजमहल के भीतर जाने के लिए लम्बी लाइन लगी है.  लाइन में लगने के पहले जूते उतरने की व्यवस्था है,  जूते रखने की जगह बहुत साफ़ है, ऑर्गनाइज्ड है, वहाँ काम करने वाला इंसान सज्जन है, एफिसिएंट भी. हालिया जूते उतार कर नंगे  पैर जाने का एक और विकल्प पैरों में शू कवर पहन कर जाने का हो गया है, जगह जगह इन शू कवर के चीथड़े बिखरें, उड़ रहे है. अमूमन विदेशी लोग और गाँव देहात के लोग नंगे पाँव जा रहे हैं,  मिडिल क्लास भारतीय, जींस पैंट वाले शू कवर पहन कर जा रहे है, और उन्हें होश नहीं है कि इस्तेमाल करने के बाद इन्हे कूड़ेदान में फेंकना या साथ ले जाना इनकी जिम्मेदारी है. ये पढ़ाई लिखायी और ऊंची कमायी किसी तरह का सिविक सेन्स क्यूँ नहीं लोगों के भीतर पैदा करता है, ये मेरी समझ से बाहर है.  सरकारी साफ सफाई जितनी हो सकती है, उतनी है, और ऐसे  गैर-जिम्मेदार रवैये के चलते लगता है बहुत अधिक है. क्या सोचकर इन शू कवर्स की इज़ाज़त इस परिसर में दी गयी है? हालाँकि  ये भी वैसा ही सवाल कि ऊँट की बग्गियां क्यूँ पार्किंग लॉट में हैं.  कोई कह सकता है कि इस बड़े देश में रोजगार के ये मौके हैं.  लेकिन शायद इससे बेहतर मौके खोजने की जरूरत है,  ये प्योर न्यूसेंस हैं.  

ताजमहल के भीतर जाने के लिए घूमी हुयी लम्बी कतार है, इस कतार को धकेलते हुए बन्दूक और मशीनगन लिए हुए आर्मी-पुलिस के सिपाही और अफसर है,  जो लोगों को जरा भी चैन से खड़े नहीं होने देते, अपनी गति से आगे खिसकने नहीं देते कि सांस लेने कि  जगह बची रहे, चिल्लाते हैं,  खदेड़ते हैं और ताजमहल के दरवाजे तक आते आते लगभग स्टम्पीड का माहौल बना देतें है, उनका चीखना बढ़ जाता है, लोग एक  दुसरे के ऊपर चढ़ रहे है, किसी बच्चे का पैर दब गया, आदि ये सब होता है,  ताजमहल देखने आये सारे उत्साह पर पानी फिर जाता है।  सुरक्षा के लिए पुलिस और आर्मी ठीक है, लेकिन आम लोगों को लाइन से अंदर ले जाने के लिए दुसरे प्रशिक्षित लोग होते तो अच्छा था.  पुलिस के लोगों को सिर्फ भीड़ को काबू रखने की ट्रेनिंग है,  लेकिन ये लाइन में लगे लोग है, हसरत से ताजमहल देखने आये है, उपद्रव मचाने की इनकी मंशा नहीं है. इनके साथ बर्ताव अलग होना चाहिए.  इस दरवाजे से मुश्किल से दो फीट की दूरी पर मुमताज़ महल और शाहजहां की कब्र है. वैसे कहतें हैं कि असल कब्र जमींदोज है, नीचे तहखाने में हैं, ये जो दर्शकों को सुलभ है, असल वाली की रेप्लिका है.  उम्मीद करती हूँ कि मुमताज और शहंशाह अपनी तन्हाई में सुकून से होंगे,  ये शोर, ये गाली गलौज़, बच्चों की रोने की आवाज़ें उनके आराम में खलल नहीं डालते होंगे.

पिछले १५ सालों में भारत के बाहर भी बहुत से स्मारक, म्यूजिम, नेशनल पार्क , वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी देख चुकी हूँ.  वहाँ भी भीड़ ताजमहल से किसी मायने में कम नहीं होती.  लेकिन वहाँ ठीक से जगह- जगह पीने के पानी की व्यवस्था, शौचालय की व्यवस्था होती है, परिसर का नक्शा होता है,  छोटे छोटे क्यूरेटेड डिस्क्रिप्शन होते हैं. ताज महल का परिसर बहुत बड़ा है, ताज महल के भीतर देखने के आलावा दूसरी चीज़ें भी हैं.  ताजमहल बनाने के दौरान नक्शों में हुयी हेर-फेर के दस्तावेज हैं,  कुछ आम जनता और उत्सुक लोगों के लिए इस सूचना का डिसप्ले लगाया जा सकता है,    ठीक से प्रशिक्षित गाइड हो सकते है,  जो कुछ लोगों को ठीक से सूचना दे सकतें, परिसर की मेंटेंनेस में भागीदारी कर सके, स्कूली बच्चों के टूर में मदद कर सकें. रोजगार के ये तमाम रस्ते खुल सकतें हैं.  लेकिन उसके लिए राजनैतिक और प्रशासनिक कुशलता और कंसर्न की जरूरत है. अपनी विरासत से सचमुच प्यार करने और उसपर गर्व करने की जरूरत है.

ताजमहल परिसर, दरवाजों को,  मस्जिद और मेहमान खाने को जितना सम्भव हुआ अपनी तरह से हमने देखा, और यहाँ आना, इसे देखना घाटे का सौदा नहीं रहा, इसे देखकर खुशी, हैरत हुयी और सुकून भी मिला.  लेकिन जरा सी अच्छी व्यवस्था होती तो दूर दराज़ गाँवों, शहरों, देश विदेश के कोनों कोनों से जो लोग यहाँ आते हैं उनके अनुभव में खुशी का इज़ाफ़ा होता, बेवजह की खीज़ नहीं होती. 

1 comment:

  1. आपकी खीज साफ़ झलक रही है . और इस तरह का माहौल लगभग हर तरफ है चाहे वो कोई भी प्रदेश हो . इक अजब सा जुनून घूमने और घुमाने वालों पर हावी दिखता है . अपनी पिछली यात्रा के दौरान हिमाचल की उजड़ी सड़कों पर चलते हुए दिल कोफ़्त से भर गया था मेरा ..

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