"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Dec 11, 2013

एक अदृश्य जमात के हक़ में


समलैंगिक आज से नहीं है, हज़ारों वर्षों से सब समाजों में रहे हैं, और ख़त्म होने वाले नहीं है. भारतीय समाज में बाकी सब समाजों की तरह LGBT बहुत कम संख्या में होंगे, हालांकि उस संख्या के बारे में भी आज की परिस्थिति में जानना सम्भव नहीं हो सकता. परिवार से द्वीलिंगी खांचे मे फिट होने का दबाव और समाज में परिहास, घृणा, और शर्मिन्दगी का दबाव उनके अदृश्य होने की शर्त बुनता है.

वो जो समलैंगिक नहीं है, ३७७ के समर्थक हैं, उनके हिस्से भी इस अन्याय के दंश बीस रूपों में आयेंगे, अगर व्यक्ति को समाज और परिवार जगह नहीं देगा, आज़ादी नहीं देगा, तो उसके उलझाव से बाक़ी लोग भी नहीं बचेंगे. पारम्परिक शादियों में कई स्त्री पुरुष समलैंगिकों के साथ बंधते रहेंगे. आज की दुनिया के साथ संगत व्यवहार के लिए हमारे बच्चे मानसिक रूप से अपाहिज़ बने रहेंगे. एक ताज़ा वाकया है, २०१० में एक भारत से आये १८-१९ साल के लड़के की हरकतों की वजह से उसके अमरीकी गे रूममेट ने आत्महत्या की, और वो भारतीय लड़का जेल में हैं.

फिलहाल उदार लोग भी ठीक से LGBT की समस्या को नहीं समझते हैं, और समझ सकें इसके लिए खुलेपन की और संवाद की जगह जनतंत्र में होनी चाहिए. लेकिन धारा ३७७ की वापसी, LGBT को अपराधिक करार दिए जाने की वापसी, इस अल्पसंख्यक और सबसे दबी -कुचली अस्मिता को अँधेरे गड्ढ़े में धकेलती है, सम्मान के साथ जीवन जीने के सब रास्तों को बंद करती है, संवाद के सब दरवाजे बंद करती है .…

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