"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Mar 31, 2013

जाग नगर का राग -न्यूयॉर्क 02

 मारिया से कुछ बात करते मेट्रो में बैठी, मारिया कोलंबिया युनिवर्सिटी के स्टॉप पर उतर गयी, मुझे अभी अपटाउन के लगभग आखिरी छोर पर जाना हैं,  सिलसिलेवार तरीके से पहले ओर्थोडोक्स यहूदी, फिर आज हरे रंग में  'सेंट पैट्रिक डे' मनाते आयरिश, फिर हिस्पैनिक, और काले चेहरे मेट्रो में चढ़ते -उतरते हैं, अंदाज़ लगती हूँ कि किस इलाके में किस तरह के लोगों का बाहुल्य है.  मेरे ठीक बगल में एक डोमेनिकन बूढा खड़ा है, जिसके आगे के तीन दांत टूटे हैं, और ऑलमोस्ट बहुत पुराने, लगभग फट चुके कपड़ों में खड़ा है, उसके मुँह  से किसी सस्ती शराब की दुर्गन्ध आती है, लेकिन अपने व्यवहार में संजीदा है.  मेट्रो से उतर कर सड़क पर तिरपाल के तम्बू के नीचे सब्जियों के वैसे ही ठेले दिखते हैं,  एक बार को लगता है शायद करोल बाग़ या देहरादून सी कोई जगह है.  सड़क पर सिर्फ हिस्पैनिक और काले लोग. ग़ुरबत साफ़ दिखती है. हिन्दुस्तानी लोग अधिकतर न्यूजर्सी के सबर्ब  में रहतें हैं, इन इलाकों में नहीं रहते. इन इलाकों में आने में मेरे हिन्दुस्तानी मित्रों को असुरक्षा का भय सताता है, रात के वक़्त यहाँ आने की बात उनमें से बहुतों के लिए अवांछित है.  मेरी दोस्त सुजाता जो लेटिन अमेरिकी राजनीति की एक्सपर्ट है, यहाँ रहती है. सुजाता फ़र्राटे से स्पेनिश बोलती है, हिन्दी, अंग्रेज़ी भी और इस लेटिन अमेरिकी परिवेश के साथ घुलीमिली है. पिछली बार किसी तरह हिम्मत बाँध कर यहाँ पहुंची थी, अबकी बार मुझे डर नहीं है.

पांच वर्ष बाद फिर मिल सकने की खुशी है, सामने दो खेलते हुए बच्चे है, जिन्हें मैंने अब तक सिर्फ तस्वीरों में देखा है. पांच वर्ष की बच्ची चाहती है की उसे खोज निकालूँ, घर में घुसते ही हमारा खेल शुरू. फिर उसके लिए सोते समय किताब पढ़ना, मज़े की बात वही किताबें जो इसी उम्र का मेरा बेटा पढता है, 'टग बोट स्क्फी' और 'रेड कबूस'. उसेमें रवि की फोटो और वीडियो दिखाती हूँ, वो कहती है 'दिस इस योर सिली बॉय'.  रोहन बड़ा है तो 'बिग बॉय'. सुजाता मुझे कहती है की किस तरह छोटे बच्चों के साथ मीटींग में जाना संभव होता है? मुश्किल होता है, हम सब के लिए जो छोटे बच्चों के माता-पिता हैं. फिर धीरे धीरे उसी के बीच आप रास्ता बनाते हैं. शायद मीटिंग में आ सकना बहुत सरल काम है, दो बच्चों और नौकरी के साथ सुजाता ने जो तीन अच्छी किताबें लिख मारी है, वो बहुत बड़ी बात है. मालूम नहीं कैसे किया. 
  
सड़क पर रात भर चहल-पहल है, लगातार बाहर से आवाजें छन कर आ रहीं हैं, आवाज में नींद मुझे नहीं आती, इसीलिए किसी भी महानगर में नींद नहीं आती. पूरा जीवन अधिकतर सन्नाटे और सुनसान के बीच ही सोने की आदत बनी. मेरे लिए रात के समय, हवा का शोर, या बारिश और बर्फ के गिरने की आवाज ही सबसे पहचानी हुयी आवाज है.  स्टडी रूम में किताबों से घिरे होने का सुख है, सूजी और माइक का खजाना टटोल रही हूँ, एक रात कम है, कितनी तो किताबें हैं, और कितनी फिर उनके बीच वो भी है, जिन्हें २-३ वर्षों से पढने का सोच रही हूँ, लिखने का आलस है, अपनी यादाश्त पर अब बहुत भरोसा नहीं है, एक्स-रे मेमोरी लगता है अब किसी और जन्म की बात है, किसी दुसरे के जीवन का प्रसंग था.  शुक्र है फ़ोन है, क्लिक क्लीक. नींद नहीं आयी, सुबह  'The Dew Breaker'  पलटते हुयी.

सुजाता के घर पर नोर्मा और एंजेला से मुलाकात हुयी, नोर्मा क्यूबा में लिट्रेसी इनिशिएटिव प्रोजेक्ट के शुरुआती कार्यकर्ताओं में से है. सन साठ में आजादी के साथ क्यूबा में सब लोगों को साक्षर बनाने का अभियान शुरू हुआ और जिस किसी को भी पढना आता है, उसे किसी अनपढ़ को साक्षर करना है के फलसफे से साथ  और कुछ ही वर्षों के भीतर सभी लोगों को पढना लिखना आ गया. अब जब पचास वर्ष बाद अमेरिका में 'नो चाईल्ड लेफ्ट बिहाइंड' और इसी तर्ज़ पर भारत में 'सर्व शिक्षा' अभियान का नारा चला है, तो ये देखना और समझाना  ज़रूरी है कि बिना किसी तामझाम किस तरह दुनिया का अकेला लिट्रेसी प्रोजेक्ट सफल हुआ.  फ़िल्मकार कैथरीन मर्फी  ने इस पर फिल्म 'Maestra'  बनायी है. लिट्रेसी प्रोजेक्ट के सिलसिले में नोर्मा न्यूयॉर्क आयी है. नोर्मा अब जेंडर आईडेंटिटी, और रेस एक्वेलीटी पर काम कर रही एक्टिविस्ट है. एंजेला पैतीस वर्ष पूर्व जमैका से न्यूयॉर्क आयी थी, तब से इस इलाके में ही रहती है.  

सुजाता और दुसरे दोस्तों से हिपहॉप बैंडस के बारे में सुनती रही हूँ. सुजाता ने हालिया अपने ऑस्ट्रेलिया में बड़े होने के अनुभव और पिछले बीस वर्षों से क्यूबा, लैटिन अमरीका, और नार्थ अमरीका की घुमायी, रिसर्च करते हुए मन की हिप हॉप पगडंडियों पर भागते हुए अपनी तीसरी किताब  'Close to the Edge'  हिपहॉप म्यूजिक पर मेमॉयर की तरह लिखी है.  किताब को एक समान्तर जीवनअनुभव की तरह पढ़ना मेरे लिए पर्सनल लेवल पर दिलचस्प है. अपने अठारह वर्ष की मित्रता और बीच बीच में हुयी बातचीत के बरक्श, किताब की तरह पढना, फिर नए सिरे से मेरे लिए सुजाता को जानना भी है.  सन सत्तर के बाद, वियतनाम युद्ध, सिविल राईट आन्दोलन के बैकड्रॉप में हिपहॉप संस्कृति दमित अस्मिताओं की आवाज और अभिव्यक्ति की तरह उभरी, न्यूयॉर्क के अश्वेत बहुल इलाकों में इसकी शुरुआत रैप सिंगिंग, ब्रेक डांसिंग, बी-बोयिंग, मून-वाकिंग, ग्रेफ़िती आर्ट की तरह हुयी जिसने सत्तर के बाद की दो पीढीयों को ग्लोबली अपनी चपेट में लिया.  मेरा मन हिपहॉप में कभी नहीं रमा.  हिपहॉप की पोलिटिकल अंडरकरंट से भी मेरा कोई परिचय और कोई गठजोड़ नहीं बना. लेकिन ये मजेदार है कि मेरी पीढी की बैचैनी का ये ग्लोबल म्यूजिक हिपहॉप, भारत में संभ्रांत क्लास के बीच पॉपुलर हुआ, हाशिये की अस्मिताओं से उसका कुछ लेना देना नहीं था, एक संपन्न और ऑलमोस्ट लफंगी पूरी तरह समाज के संघर्षों से कटी जमात का फैशन था हिपहॉप. मेरे किशोरवय और यूनिवर्सिटी के दिनों में जाने पहचाने उन चेहरों को याद करने की कोशिश करती हूँ  जो नैनीताल की मॉलरोड या बरोड़ा के कैम्पस कोर्नर में ब्रेक डांस और मून वाक करते नज़र आते थे, उनमें कोई राजनैतिक नहीं था, दमित नहीं था. हॉस्टल में जिन लड़कियों के कमरे में माइकल जैक्सन और मडोना के पोस्टर थे, सब अमीर घरों की कंजुमरिस्ट लडकियां थी.

फिलहाल आज 'रेगे'  सुनने का मौका बना, ठीक न्यूयॉर्क के अश्वेत केंद्र हार्लेम के बीचों बीच. नोर्मा, एंजेला और सूजी तीनों बीच बीच में थिरक रहे हैं, नोर्मा और एंजेला को साठ पार की उम्र में ख़ुशी के साथ ग्रेसफुली थिरकना देखकर खुशी होती है, सोचती हूँ मेरी माँ होती तो क्या करती?  अब तक इधर उधर बॉब मारले के अलावा बाकी कुछ नहीं सुना, उन्हें भी टी.वी. और रेडियो पर ही सुना, फिर पिछले वर्ष बनी डोकुमेंटरी फिल्म मारले के मार्फ़त कुछ और जाना. जमैका के इन दो गायकों को सुनकर यही लगा कि  जहाँ से भी ये संगीत आया है, बहुत दुःख और पीड़ा के बीच घूम कर आया है, बहुत नाराज़ है ये संगीत, बैचैन हैं धुनें. मानव इतिहास के त्रासदी, और समाजों की पीड़ा एक समय के बाद ख़त्म भी हो जाती है, परन्तु चेतना में वो कई पीढीयों तक बची रहती है; करुणा बनकर, गुस्से के बुलबुलों सी भीतर भीतर उबलती...,

दुबारा हो सकता है फिर किसी हिप हॉप संगीत को सुनने जाऊं, हो सकता है अपने बड़े होते बच्चों के साथ रॉक, मेटेलिका सुनने भी जाना हो, गयी तो फिर कुछ उत्सुकता में ही जाऊगी, मन के चैन के लिए नहीं. मेरे मन की संगत भारतीय क्लासिकल या फिर लोकधुनों के साथ ही बैठती है,  देशी लोकधुनों जैसे ही आयरिश लोकधुनें, दक्षिण अमेरिकी हाइलैंड की धुनें, हवाई की धुनें, थाईलैंड और पूर्वी धुनें और अमेरिकी ब्लू ग्रास को सुनते हुए ही आनंद आता है. अच्छा होता की कुछ भारत में रहते हुए संगीत सीखा होता. बचपन के दिनों में पिता की हर दो साल बाद तबादले वाले जीवन में संभव न हुआ, बाद के सालों में शायद पांच वर्ष लखनऊ में रहते रिसर्च के समय सीख सकती थी, तब दूसरी धुन थी. अब बच्चों के साथ कुछ कर्नाटक शैली का संगीत सीखने की कोशिश करती हूँ, हिन्दुस्तानी सिखाने वाला कोई होता तो ज्यादा सहज होता,  लेकिन संस्कृत की जितनी भी बची खुची याद है, और ब्राहमण घर की परवरिश के बीच धार्मिक शास्त्रीय साहित्य की सुनी कहानीयों की याद, उससे कुछ भजन समझ में आते हैं,  बीच बीच की तमिल /तेलगु और कन्नड़ बिना समझे गा लेना विचित्र लगता है. गलत गा लेने की झेंप नहीं लगती क्यूंकि शायद गाना सीखने का जीवन में यही एक मौका है,  भजन गा लेने और सीख लेने से मेरी नास्तिक समझ पर कोई असर नहीं पड़ता. अच्छी बात ये भी कि किसी प्रगतिशील जमात के सामने मुझे भजन गाते दिखने या सीखने  में अब शर्म नहीं आयेगी. संगीत शब्दों से परे, फिर जिस वजह से भी बना हो बाहरी दिखावे से ज्यादा मन की चीज़ भी है.  जैसे हिन्दी लिखने का ब्लॉग मेरे लिए एक मौका है, लाख वर्तनी की गलतियाँ हो, व्याकरण का लोचा हो, किसी तरह का क्राफ्ट मेरे लिखे में न हो, फिर भी भाषा के साथ मेरे मन की संगत का ये एक जरिया है, नहीं लिखूंगी तो इस भाषा को भूल जाऊँगी, और लिखते लिखते शायद मेरी अशुद्धियाँ कम होती जायेंगी, शायद मेरे भीतर ये भाषा बची रहेगी....  

सुबह तैयार होकर नाश्ता कर रही थी कि  बच्ची ने चिल्लाकर मेरा परिचय ग्रैंडमाँ सावित्री से करवाया, सावित्री घर के काम में मदद के लिए आने वाली पचास पार की उम्र की महिला है, सावित्री कहती है 'माई रूट्स आर इन इंडिया'. सावित्री उन गिरमिटिया हिन्दुस्तानियों की वारिस है जो डेढ़ सौ वर्ष पहले भारत से मजदूरों की तरह करीबियन में लाये गए थे.  मैं सावित्री से कहती हूँ कि  फिर कभी मुलाकात होगी, मुझे मेट्रो और फिर आगे की यात्रा के लिए बस पकड़ने की जल्दी है. जल्दी से सबको अलविदा कर, फिर  सड़क पर. पोर्ट ऑथोरिटी, 42nd स्ट्रीट पर इस मुगालते में मेट्रो से उतर गयी हूँ कि  बस ग्रे हाउंड की होगी,  इमेल खोलकर टिकेट खोला, तो पता चला की ये कोई मेगा बस है, 34th स्ट्रीट से जायेगी. सुबह का समय है, धूप है, इसीलिए पैदल चलकर बस स्टॉप पर पहुंची. न्यूयॉर्क डेस्पेरेट शहर नज़र आता है, हर किसी के भीतर मानों कुछ ज़ल्दबाजी, कुछ बैचैनी की ऊर्जा भरी हुयी है, तीर की तरह भीड़ एक क्रासिंग से दूसरी क्रोसिंग पार करती, दौड़ती है, और ये भीड़ कितने तरह के लोगों की भीड़ है, बहुतायत में काले, भूरे, चीनी, दक्षिण एशियाई, देशी लोगों की भीड़. लगता है कहीं भारत या लेटिन अमेरिकी  किसी देश में हैं, अचानक से ये अहसास होता है कि मैं भी  इस भीड़ से अलग नहीं इसी भीड़ का हिस्सा हूँ, इसी में आसानी से मिल गयी हूँ. शायद इसीलिए ये शहर अपना लगता है, इस पर कुछ क्लेम करने की कसरत नहीं करनी पड़ती. बाक़ी छोटे यूनिवर्सिटी टाउन के भीतर मैं हमेशा भीड़ से अलग नज़र आती हूँ, कोई भी काला या भूरा इंसान अलग से नज़र आता है, भले ही रहते रहते एक तरह की कम्फर्ट ज़ोन में आप पहुँच जाते हैं, आपके इन शहरों में दोस्त बन जाते हैं. और कुछ वर्षों बाद आप को खुद अपना भीड़ से बाहर होने का इल्म नहीं रहता,  लेकिन न्यूयॉर्क कुछ सेकेण्ड के भीतर ही अटपटे तरीके से क्लेम करता है. अलविदा प्यारे शहर फिर लौटूंगी, बार बार लौटूंगी ...  

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Mar 24, 2013

न्यूयॉर्क 2013- 01

नींद, सपने और झकमारी का दिन 
एक कान्फ्रेंस के सिलसिले में कोल्ड स्प्रिंग हार्बर लैब, लॉन्ग आइलैंड, न्यूयॉर्क, आना हुआ है. सुबह ढाई बजे उनींदे, बस लेकर कोर्वालिस से पोर्टलैंड पहुंची, फिर सात बजे वहां से न्यूयॉर्क के कैनेडी एअरपोर्ट की फ्लाईट ली.  पांच घंटे तक अमेरिकी लैंडस्केप का जाना पहचाना एरियल व्यू, मिडवैस्ट के चौकोर, बर्फ़ से ढके खेत, जैसे बरफी के करीने से रखे टुकड़े, अनवरत, कोई बस्ती, कोई मकान नहीं, जीवन का कोई लक्षण भी नहीं,  बरफीयों का सिलसिला, नीले रंग के नदी या झील या पानी के छोटे बड़े तालाबों से टूटता है.  पता नहीं कितनी देर की नींद लगी, न्यूयॉर्क  आते ही अब ठसाठस सटी, ऊंची इमारते और अटलान्टिक महासागर का छोर दिखता है.  मेरे पास सिर्फ एक बैकपैक है, उम्मीद है ट्रेन पर हॉप करते हुए दो घंटे में लॉन्ग आइलैंड पहुँच जाऊंगी.  पांच वर्ष बाद न्यूयॉर्क आना, घर लौटने की खुशी जैसा ही है, आखिर जीवन के दस वर्ष इस राज्य में मैंने बितायें  हैं, कई दोस्त हैं, अच्छी यादें हैं, यहीं आस-पास की.  

 सबका सामान आ गया, मेरा पोस्टर जो चेकइन किया था वो नहीं आया, एअरलाइन वालों को पूछ रही हूँ, एजेंट एक दुसरे से पूछ रहे है, कंप्यूटर पर चेक कर रहे हैं,  टी.वी. पर अर्जेंटीना से नए पोप के चुने जाने की खबर है.  डेस्क पर खड़ी एजेंट कहती है कि इसे चैकइन की जरूरत नहीं थी, कैरीऑन  की तरह लाया जा सकता था. यही किया भी था, लेकिन पोर्टलैंड में एअरलाइन के एजेंट ने मुझसे चैकइन करवा लिया, बदले में तिरछी मुस्कान मिलती है. इन तिरछी मुस्कानों के आशय को पहचानती हूँ, जिस तरह भारत से निकलते वक़्त  कस्टमकर्मीयों की नफ़रत और अपनी पावर के बेजा इस्तेमाल से एन.आर. आई. लोगों को तंग करने के सुख को. कैनेडी एअरपोर्ट के ऑफिस में एअरलाइन एजेंट ने पीनटस, प्रेत्ज़ेल और सोडा मेरी तरफ बढ़ाया, मज़ाक से सदसयता का माहौल बनाने की कोशिश की, २ घंटे इन्तजार के बाद, कोई बन्दा कन्वेयर बैल्ट पर चलकर मेरा पोस्टर ढूंढ कर लाया. मेरे तीन घंटों की झकमारी के एवज में एजेंट ने मुझे मेरे गंतव्य तक मुफ्त कार से पहुंचाने की पेशकश की, जिसे मैंने खुशी से कबूला. यात्रा की खुशी भी हो तो भी बिन बात के झंझट लगे ही रहते हैं, पिछले वर्ष भारत से वापस आते समय कस्टम वालों ने ये कहकर तंग किया कि पासपोर्ट में प्रोब्लम है, दो घंटे तिकझिक करने के बाद उन्होंने आने दिया, ये कहते हुए कि न्यूयॉर्क दूतावास से जारी पासपोर्ट की सिलायी भारतीय सिलायी से अलग है,  इसी पासपोर्ट पर पहले चार दफे भारत आ चुकी हूँ और दो अन्य देशों को जा चुकी हूँ.  मेरे कुछ अमेरिकी नागरिक बने भारतीय दोस्त भी तिरछी मुस्कान के साथ ही कहते हैं  कि भारतीय पासपोर्ट में तो सबसे ज्यादा वी.आई.पी. ट्रीटमेंट भारत में मिलेगा ही, भारत और उसके बाहर भी अच्छे, बुरे अनुभव लगातार एक दुसरे को कम्पेनशेट करते रहे हैं, बैलेंस बना रहता है, कुछ देर की झुंझलाहट से ज्यादा किसी के लिए भी कड़वाहट मेरे मन में नहीं , शायद इन्हीं अनुभवों का असर है  कि विस्थापन की पीड़ा कम होती हैसब जगह कुछ न कुछ झक मारनी ही पड़ती है .....
 

कोल्ड स्प्रिंग हार्बर लैबरेटोरी 
पतझड़ के धूसर लैंडस्केप के किनारे, पुराने जीर्ण, मकानों की रिहायश पार करते डेढ घंटे के बाद, कोल्ड स्प्रिंग हार्बर लैबरेटोरी पहुँचीं, जेनेटिक रिसर्च के लिए, सबसे पहले बने, कतिपय केन्द्रों में से एक ये भी है. ग्रेस ऑडिटोरियम में  रजिस्ट्रेशन बूथ से  केबिन के कमरे की चाबी, इन्फोर्मेशन पम्पलेट और कान्फ्रेंस बुक लेते समय, कान्फ्रेंस हॉल के बाहर एक बोर्ड पर संस्थान की एतिहासिक उपलब्धियों  की छोटी सी झांकी नजर आती है, यहाँ डी.एन.ए. को जेनेटिक मटीरियल साबित करने वाले अल्फ्रेड हर्शी, साल्वाडोर लुरिया और मैक्स डेल्ब्रक का 1969 नोबेल के समय का ब्लेक एंड व्हाइट फोटोग्राफ  है, अल्फ्रेड हर्शी, मार्था चेज़ एक ग्रुप फोटो में भी हैं, अकेली खड़ी मर्दाना बुशर्ट और ट्राउजर में बारबरा मेक्लिनटॉक हैं,  सीढीयों पर बैठे, घास पर लेटें वैज्ञानिकों के बतकही करते दल के साथ साल्वाडोर लुरिया और मैक्स डेल्ब्रक हैं, लैब में  काम करते दिखते जॉन क्रेन्स और फ्रांसिस क्रिक और जेम्स वाटसन हैं. फिर वाटसन परिवार, वाटसन की दुनियाभर के सेलेब्रिटीज के साथ फोटोग्राफ, और  डी.एन.ए. रिसर्च पर कार्टून्स, न्यूज़ पेपर्स आर्टिकलस की कटिंग्स, बोर्ड के ठीक सामने गोल्डन डबल हेलिक्स...

केबिन तक की शेयर राइड में मेरे साथ डेनमार्क से आयीं दो छात्राएं हैं, एक फ़्रांस से आयी पोस्टडॉक है, केबिन में सामान रखने के बाद हम डाइनिंग हाल में जाते हैं. 
सीमेंट और कंक्रीट की 1907 में बनी डाइनिंग हॉल की इमारत,  यूजीन ब्लैकफोर्ड के नाम पर है. दीवारों पर, सीढीयों में, हॉल वे में विज्ञानिकों के स्केच लगे हुए हैं. खाने का अच्छा इन्तेजाम है, बल्कि ज्यादा शाकाहारी खाना है, श्रिम्प पॉपकोर्न, कॉडफिश, चिकन और पोर्क के बीच पांच तरह के सलाद, और ब्राउन राइस के साथ 'कपली' जैसे प्रेपरेशन का 'स्पिनैच क्रीम' रखा हुआ है. पिछले बीस वर्षों में कम से कम कांफ्रेंस मेनू में शाकाहारी भोजन उसी तरह बढ़ गया है जैसे कान्फ्रेंस में औरतों की भागीदारी. शाकाहारियों को अब भूखों नहीं मरना पड़ता, औरतें ज्यादा सहज दिखतीं हैं ...  


मॉलेक्युलर बायोलोजी के सबसे प्रसिद्द शोध केंद्र के अलावा कोल्ड स्प्रिंग हार्बर
लैबरेटोरी अपने ट्रेनिंग कोर्सेस और कान्फ्रेंसेस के लिए भी जानी जाती हैं,  इसकी शुरुआत  ब्रूकलिन इंस्टिट्यूट ऑफ आर्ट्स  और सायंस की बायोलोजी टीचर ट्रेनिंग लेब की तरह वर्ष 1890 में हुयी जो जल्द ही जेनेटिक रिसर्च के अग्रणी शोध संस्थान में बदल गयी.  इसी संस्थान में आठ नोबेल लॉरियट्स ने काम किया है और लगभग पिच्चासी नोबेल लॉरियटस किसी न किसी तरह इस जगह से जुड़े रहे हैं. यहीं अल्फ्रेड हर्शी, मार्था चेज़, साल्वाडोर लुरिया और मैक्स डेल्ब्रक ने वो क्लासिक एक्सपेरिमेंट किये, जिनसे साबित हुआ कि डी.एन.ए. ही जीवों के भीतर जेनेटिक मटीरियल का काम करता है. अल्फ्रेड हर्शी, साल्वाडोर लुरिया और मैक्स डेल्ब्रक को 1969 में  नोबेल मिला. फ्रांसिस क्रिक और जेम्स वाटसन ने अपना शोधपत्र प्रकशित होने के पहले  यहीं डी.एन.ए. के डबल हेलिक्स की संरंचना का खुलासा वर्ष 1953 में विषाणु पर केन्द्रित कान्फ्रेंस में किया, ये जेम्स वॉटसन का  डी.एन.ए. डबल हेलिक्स पर दिया  पहला लेक्चर था. 1962 में वॉटसन और क्रिक को डबल हेलिक्स के लिए नोबेल मिला.  जेम्स वॉटसन 1968  में यहाँ के डायरेक्टर बने, फिर प्रेजिडेंट और कालांतर में चांसलर, 2003 में रिटायर होने के बाद से अब तक वो यहीं रहते हैं. जॉन क्रेन्स ने डी.एन.ए. रेप्लिकेशन की प्रक्रिया की बुनियादी समझ यहीं विकसित की. गुणसूत्रों के विभाजन के दौरान क्रोसिंग ओवर की खोज से लेकर मक्का में जम्पिंग जीन्स की खोज करने वाली बारबरा मेक्लिनटॉक को यहीं अपनी प्रयोगशाला में चैन से काम करने का मौका मिला और यहीं  1942 में स्थायी नौकरी मिली, 1983 में जब उन्हें जम्पिंग जीन्स की खोज के लिए नोबेल मिला तब वो यहीं थी और अंत समय तक यहीं काम करती रही. रिचर्ड रोबर्ट्स और फिलिप शार्प को स्पलिट जीन्स और RNA स्प्लाय्सिंग की प्रक्रिया की खोज के लिए के लिए 1993 में  और कैरल ग्रेडर को टीलोमरेज एंजाइम की खोज के लिए 2009 में नोबेल मिला. इस समय यहाँ के प्रेजिडेंट ब्रूस स्टिलमेन हैं, और करीब 400 वैज्ञानिक  कैंसर, मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी मानसिक व्याधियों जैसे ऑटिज्म, शिजोफ्रेनिया, पर्किन्सनस और अल्जाइमर आदि पर रिसर्च कर रहे हैं.   

एम. एस. सी. के वर्षों में बहुत जतन से बचायी दो महीनों की फेलोशिप से जेम्स वॉटसन की मॉलेक्युलर बायोलोजी की टेक्स्ट बुक खरीदने और पढने की खुशी हो, या जेम्स वॉटसन के थ्रिलर शैली में लिखे 'डबल हेलिक्स' से मिले इंटरटेनमेंट की ख़ुशी, यहाँ के वैज्ञानिकों और उनकी खोजों के विषय में अपने स्कूली दिनों से कुछ जानती रही हूँ, ये सभी मोलेक्युलर बायोलोजिस्ट बहुत कुछ जाने पहचाने लगते हैं, इन सब की छाया में खड़े होकर मैंने अपने विषय के ककहरे सीखे हैं.  बारह साल की थी तो तब पता चला कि वर्षों बाद 1983 में जिस महिला वैज्ञानिक को नोबेल मिला है, वो बारबरा मेक्लिनटॉक यहीं काम करती है. कैम्पस में घुमते हुए उनके नाम पर एक लैब का नाम देखकर ख़ुशी हुयी.  हालाँकि उन्होंने बहुत से ऐतिहासिक महत्त्व के प्रयोग कोर्नेल में रहते हुए किये, परन्तु उसके बाद भी वर्षो तक उन्हें स्थायी वैज्ञानिक की नौकरी नहीं मिली, उनके नाम पर कोर्नेल में एक्सपेरिमेंटल कॉर्न फील्ड के बीच एक दो कमरे का शेड है. बारबरा मेक्लिनटॉक यहाँ से बार-बार कोर्नेल जाती थी, लोगों से मिलती और अपने प्रश्नों से आतंकित करती थी. डिपार्टमेंट की मीटींग के या पिकनिक के बीच पुराने रिटायर्ड प्रोफेसरों से कई दफे  बारबरा से हुयी उनकी मुलाकातों के किस्से मुझे अपने नौ वर्षों के इथाका प्रवास के दौरान सुनने को मिलते रहे.

कैम्पस में घुमते हुए और फिर यहाँ कुछ मित्रो की
लैब में जाने, लैब्स को भीतर से देखने के बाद, ये बात काफी रोचक लगी कि दरअसल यहाँ की सभी पुरानी प्रमुख लै समर हॉउस के भीतर बनी हैं, समर हॉउस के भीतर घर का ही खाका है, ऐसे ही घरों के भीतर दफ्तर, और दूसरे कार्यालय हैं. सहज ही कौन सोच सकता है कि इन घरों के भीतर मॉलेक्युलर बायोलोजी की बड़ी खोजे संभव हो हुयी. बड़ी खोजों के लिए सिर्फ इन्फ्रास्ट्रक्चर काफी नहीं होता, सपने देखने की कूव्वत, और अपनी रचनात्मकता के साथ जूझते रहने की कहानी ही शायद बड़ी खोजों की कहानी होती हैं.  हर लैका नाम और दफ्तर का नाम वैज्ञानिकों के नाम पर रखा गया हैं, एक लेक्चर हॉल का नाम एफ्रेम रेकर के नाम पर भी है, कोर्नेल की मॉलेक्युलर बायोलोजी बिल्डिंग में भी एक लेक्चर हॉल उनके नाम पर है.  एफ्रेम रेकर कोर्नेल में प्रोफेसर थे, और ऑस्ट्रिया से आये थे.  उनके बारे में सायंस से इतर जो दूसरी बात कही जाती थी, वो ये थी  कि उन्होंने और हिटलर ने किसी एक ही कोर्स के लिए यूनिवर्सिटी में अप्लाई किया था, एफ्रेम को दाखिला मिला और हिटलर परीक्षा में फेल हो गया, लोग अक्सर कहते की इसका उलट होता तो शायद हिटलर, एफ्रेम की जगह, सायंस में आ गया होता और तबाही बच जाती.  

समर हॉउसेस के इतर का कंस्ट्रक्शन वर्ष 1994 के बाद का है, कुछ नयी इमारतों को चैरिटी और फिलन्थ्रोपी की परम्परा को जारी रखते हुये बनाया गया हैं, हेज़न टॉवर से सटी बैकमैन बिल्डिंग, मशहूर सेंट्रीफ्यूज़ बनाने वाली कम्पनी के मालिक बैकमैन परिवार के दान से बनी है. इसी बिल्डिंग में वॉटसन का ऑफिस है,  ब्रेन रिसर्च की अग्रणी लैब्स है, जहां ब्रेन की याद करने, सीखने और प्लास्टीसिटी पर रिसर्चरस काम कर रहे हैं. ब्रेन डिसऑडर्स इस कैम्पस के लिए भोगी त्रासदी का भी हिस्सा है, मशहूर हर्शी-चेज़ प्रयोग करने वाली अल्फ्रेड हर्शी  की सहायक मार्था चेज़ तीसेक साल के आसपास, मेंटली चेलेंज्ड हो गयीं, उसके आगे रिसर्च नहीं कर सकी. जेम्स वॉटसन के अकेले बेटे शिजोफ्रेनिया के शिकार हैं. जीवन की यही विसंगतियां वैज्ञानिकों को बाक़ी सब लोगों से जोड़ती हैं, इनके आगे वो भी उतने ही असहाय, पर बेहतरी की उम्मीद में अपना काम जारी रखतें हैं. .... 

'व्हेलिंग' इन कोल्ड स्प्रिंग हार्बर  
कान्फ्रेंस हॉल की दाहिनी दीवार पर जॉन एच. जॉन की पेंटिंग लगी है, जो 'कोल्ड स्प्रिंग व्हेलिंग कम्पनी' के मेनेजिंग एजेंट थे. दरअसल लैब्स में कन्वर्ट हुए समर हॉउसेस 'कोल्ड स्प्रिंग व्हेलिंग कम्पनी' के थे, लैब बनने के कुछ वर्षपूर्व कम्पनी ने व्हेलिंग का कारोबार बंद कर दिया था और टूरिज्म के कारोबार के लिए यहाँ समर हॉउस, रिसोर्ट और होटल बनाये. जब यहाँ टीचिंग रिसर्च लैब बनाने की बात उठी तो कम्पनी के मेनेजिंग एजेंट जॉन एच. जॉन ने अपने उन्नीस समर हॉउस संस्थान को दान कर दिये. 

कांफ्रेंस के बाद घंटे भर के लिए  'व्हेलिंग म्यूजियम' देखा  जो अब एक छोटे से मकान के भीतर है  उन्नीसवीं सदी के मध्य में यहाँ 'कोल्ड स्प्रिंग हार्बर व्हेलिंग कम्पनी ' शुरू हुयी, जो सदी के आखिरी दशक में बंद हो गयी. . 'व्हेलिंग' यानि व्हेल का शिकार. व्हेल के शिकार और उसके शरीर के विभिन्न हिस्सों का इस्तेमाल ३ हज़ार वर्ष पहले से एस्किमो लोग जीवनयापन के लिए करते रहे हैं; मांस खाने के लिए, हड्डी का इस्तेमाल बर्तन, फ़र्नीचर, सुई से लेकर कई तरह के औजारों को बनाने के लिए, और त्वचा के नीचे चर्बी की बहुत मोटी परत जिसे ब्ल्बर कहते हैं, का उपयोग रोशनी के लिये. परन्तु उनकी जीवनपद्धती से समंदर के भीतर व्हेल के बाहुल्य में कोई फर्क नहीं पड़ा. 

अमेरिका में यूरोपी सेटलमेंट के बाद एस्किमो समुदाय के बाहर व्हेल का शिकार शुरू हुआ, और बड़े कारोबार का जरिया बन गया. महासागरों के बीचोंबीच व्हेल का औधोगिक स्तर पर शिकार का सिलसिला सतरहवीं सदी में शुरू हुआ और उन्नीसवीं सदी में परवान चढ़ा.  अब ब्ल्बर का उपयोग रोशनी के अतिरिक्त तमाम छोटी-बड़ी मशीनों के कलपुर्जों के बीच लुब्रिकेंट की तरह और मेकअप का सामान बनाने के लिए भी होने लगा.  व्हेल की हड्डियों से वो सब चीज़े बनी जो आज प्लास्टिक से बनती हैं. आज बिजली, प्लास्टिक और लुब्रिकेंट का जो उपयोग है, उस सबकी जगह व्हेल के शरीर के हिस्सों का इस्तेमाल हुआ. हजारों की संख्या में प्रति वर्ष व्हेल मारी गयीं  और बीसवीं सदी के शुरुआती दशक तक इनकी संख्या प्रतिवर्ष पचास हज़ार से ज्यादा बढ़ गयी, तीन सदी तक चले शिकार का नतीजा ये हुआ कि  व्हेल की कई जातियां विलुप्त होने की कगार पर आ पहुंची. कैरोसिन और पेट्रोलियम जैली की खोज के बाद 'व्हेलिंग' में कमी आयी और बिजली की खोज के बाद और कम हो गयी.  कैरोसिन और बिजली की खोज के साथ दुनिया चाहे सर के बल खड़ी हुयी हो,  लेकिन 'व्हेलिंग' की डिमांड कम हुयी, इस प्राणी का बचा रहना संभव हुआ. हालांकि जापान, नार्वे, डेनमार्क आदि कुछ देशों में  'व्हेलिंग' अब भी जारी है, परन्तु अधिकतर देशों ने  1986 में International Whaling Commission (IWC) की 'व्हेलिंग' पर पाबंदी को मान लिया है ताकि व्हेल के स्टॉक रिकवर किये जा सकें. मालूम नहीं कि एडिसन तक व्हेलों का शुक्रिया गान पहुंचा या नहीं?

म्यूजियम के भीतर रखे मिलें —व्हेल का जबड़ा, बड़ी बड़ी हड्डियाँ,
स्क्रिमशॉ कला के र्टिफेक्ट्स जो उन हड्डियों और दांतों पर नुकीले औजारों से की गयी बारीक नक्काशी से बने हैं, शिकार के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला हरपून, और एक साबूत, पूरे आयतन की शिकारी नाव, कई दूसरी नावों के नमूने, और एक डूब चूकी नाव की वर्षों बाद खोजयी में मिली चीज़े भी.  कुछ वर्ष पहले देखी एक बच्चे और व्हेल की दोस्ती पर बनी फिल्म 'व्हेली' और फिर सेंट अंटोनियो के सी-वर्ल्ड  में देखी चतुर, नाचती, मित्रता से भरी व्हेल याद आती है, अच्छा ही है, अब व्हेलिंग बीती हुयी बात है, उस भयंकर शिकार और खून खराबे का दौर ख़त्म हुआ, उम्मीद है की बचा खुची व्हेलिंग भी ख़त्म होगी, मनुष्य इस अद्भुत प्राणी का हमेशा दुश्मन बन कर नहीं रहेगा..... 

Some interesting books I found at  CSHL Bookstore...
1. The Voyage of the Beagle- James Taylor
2. The beagle Letters-Fredrick Burkhardt
3. The Immortal Life of Henrietta Lacks
4. An Unquiet Mind: A Memoir of Moods and Madness 
5. Geek Dad: Awesomely Geeky Projects and Activities for Dads and Kids to Share
6. Grounds for Knowledge
7. The Emperor of All Maladies: A Biography of Cancer by Siddhartha Mukherjee
8. A Feeling for the Organism, 10th Aniversary Edittion: The Life and Work of Barbara McClintock 
9.  An Usborne flap books see inside-science/math books for kids