"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Apr 24, 2013

रंग-ओ-गुल

साल के शुरू में किताबों, कापियों और जिल्द के भूरे बांस पेपर के साथ हर साल टिन का सस्ता सा वाटर कलर का डिब्बा भी आता, गोल बारह रंगों की टिकलियाँ,  एक सस्ती कूची, और एक बिना लकीरों वाली ड्राइंग नोटबुक. सेब, अमरुद, केला, अंगूर, से लेकर बरगद और खज़ूर का पेड़  बनता,  फूलों में हमेशा कमल का फूल होता, फूल हमेशा बंद, कमल के फूल जैसे ही दुसरे फूल होते,  अदल बदल कर कमल जैसे फूल और तरह-तरह की पत्तियों के साथ फिर 'साड़ी की  किनारी ' वाला डिजायन होता. किताब से देखकर बनाया खजूर का पेड़ अपने आस-पास किसी पहाड़ में नहीं दिखता, 'साड़ी की  किनारी' वाली साड़ी और कमल के जैसे फूल भी कहीं आस-पास नहीं दिखतें, आठ मील पैदल चलते हुए नानी के गाँव जाते समय भी नहीं ...

स्कूल जाते हुए फूलों से ढके बुरांश, मेलू, गुरय्याल, कचनार, अनार, आडू, पुलम, खुबानी के पेड़ दिखतें,  बशिंग, बनफ्शा, हिसर, किलमोड़े की फूलों लदी लकदक झाड़ियाँ दिखतीं,  डाडामंडी से लौटते हुए नदी किनारे मीलों चलतें या मरख्वल गाँव  से डाबर गाँव जाते हुए नदी किनारे बेर की लाल-नारंगी झाड़ियाँ दिखती,  फिर जब नदी नहीं रहती, बलुई जमीन पर बड़े कैक्टस पर उगे सुर्ख फूल दिखतें, और आते जाते पहाड़ी खेतों की हरी नम भीत पर हजारों  छोटे-छोटे बैंजनी फूल अप्रेल में और सफ़ेद फूल बरसात में खिलतें, दादाजी इन्हें वनस्पति कहते.  कचनार की कलियों का अचार, बुरांश के फूल का शरबत, हर बरसात में तोड़े-सुखाये वनस्पति साल भर दवा की तरह, चाय में मसालें की तरह काम आते. हमारे जीवन में इतने गुंथे, पहचाने फूल किताब में नहीं थे, इन्हें बनाने की जगह ड्राइंग की नोटबुक में नहीं थी...

सेब, अमरुद, केला, अंगूर, और कमल के फूल रंगते हमेशा वाटर कलर फ़ैल जाते, रुई के फाहे से रंग पोछते हुए कागज फट जाता,  टीन  के डिब्बे  में गोल रंगों की टिकलियाँ घिस जातीं,  रंग इधर उधर मिल जाते, अंत में मटियाये रंग के धब्बे बचतें, कूची होते होते फिर गंजी हो जाती,  नोटबुक के पन्नों के बीच साल के आखिर में बना  'साड़ी का कोई किनारा' साबुत बचता, लाल रंग के कमल के फूल और हरी पत्तियों वाला और माँ को दिखाकर कहती अगली बार  ऐसी किनारी वाली साड़ी खरीदना....



Apr 14, 2013

Nainital

In poetry workshop, we were suppose to write a poem about a favorite city. This was my try for Nainital.


Wonder as a dwarf in the midst of Himalayan peaks.
Go walk around the crowded Mall road
Packed with hotels, restaurants, cafe's, gift shops.
See the changing shades of green in the 'Naini' —the eye-shaped lake,
The biggest of seven sisters.
Enjoy a barbecued corn on the cob, brushed with spices and lime juice.
Listen to a solitary old man playing flute in one corner.

Seek solitude, feel cool breeze around the 'Thandi road',
Covered with lush green firs, oaks, and cedars.
Hike up to the Land's end to glance over the deep deep gorge around,
Count the thirteen dimensions, if you could.


Take a trolley up to 'Snow-View'
Enjoy 360 degree view
Breathe fog, and touch clouds if you could.
Try some warm 'jalebies' in 'Tallital',
Moth Namkeen and 'chaat-pakori' in 'Mallital'.
Don't forget the 'Spicy cha'.