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Jun 30, 2013

कोलंबिया रिवर गोर्ज के बीच उत्तराखंड की याद


पेसिफिक नॉर्थवेस्ट में रहते हुए अब पांच वर्ष हुए, इस बीच करीब पांच हज़ार मील ड्राइव करते हुए इस क्षेत्र को देखने का मौका मिला है, इस क्षेत्र में कई झीलें, नदियाँ, प्रशांत महासागर का तट , ऊँचे पहाड़, गहरे दर्रे, सोये हुए ज्वालामुखी और अतीत में ज्वालामुखी विस्फोटों से बनी विशद घाटियाँ, झील और तालाब हैं. कोस-कोस पर झरने और दर्रों के बीच बहती नदियाँ.  बुराँस, बाँज, फर, चीड़, हेमलक, बर्च, चिनार, और देवदार के घने जंगलों में,
तेज़ हवा और पानी की मिलीजुली आवाज़, हड्डियों को चीरती ठण्ड के बीच हिमालय में कहीं होने का अहसास होता हैये साम्य, अजीब खेल करता है, कुछ ही देर को सही, मैं घर से बहुत दूर घर जैसी किसी जगह में पहुँच जाती हूँ. 
 
ये इलाका आइसऐज़ के ख़त्म होने के बाद महाजलप्रलय के असर में बना है. आईसएज  के अंत में तेज़ी से पिघलते ग्लेशियर्स के कारण नदियों और झरनों में आयी बाढ़ के पानी से कटकर ज़मीन का बड़ा हिस्सा दर्रों में बदल गया.  जो हिस्सा या तो सीधे पानी से बचा रहा या अपनी ख़ास संरचना के कारण पानी के दबाव को झेल सका वों क्लिफ्फ़ बन गया. जो बह/कट  गया, जो परते पानी में घुल गयी, उनकी जगह खड्ड व दर्रे बनते रहे. ये प्रक्रिया कई बार हुयी है.  इसके अलावा, चट्टानों के बीच रिसते पानी का बर्फ़ बनना, फिर पिघलना, फिर जमना की अनवरत प्रक्रिया भी चट्टानओं को तोड़ती रही है.  पानी, हवा, से हुये भूक्षरण, ज्वालामुखी और भूकंप से हुये विध्वंस सबने लाखों-करोड़ों वर्षों में इस विहंगम लैंडस्केप को गढ़ा है.

नोर्थवेस्ट में रहते हुये उत्तराखंड में बिताये हुए अपने जीवन के पहले बीस वर्षों की याद आती है,  यहाँ के भोगोलिक साम्य के बरक्स इस इलाके को किस तरह विकसित किया गया है,  इसकी देखरेख किस तरह से हुयी है, इस पर भी अक्सर नज़र जाती है, और कुछ अच्छी बातें देखकर एक सपना बुनती रहीं हूँ कि ये चीज़े काश हिमालयी क्षेत्र में भी संभव हो सके. अपनी जीवन पद्दती, गैजेट्स, और विकास और बाज़ार की अवधारणा तो  अमेरिका की नक़ल में ज्यादा विद्रूप के साथ हिन्दुस्तान अपनाता ही है, काश की अच्छी बातों और नीतीयों का भी कभी अनुकरण हो सकता. 
 
मेरे घर से दो घंटे की ड्राइव पर , पोर्टलैंड शहर के बाहर, कोलंबिया रिवर गोर्ज सीनिक एरिया है जो कोलंबिया नदी के दोनों तटों पर पसरा हुआ है. चूँकि कोलंबिया नदी ऑरेगन और वाशिंगटन राज्यों के बीच की विभाजन रेखा है, अत: ये क्षेत्र इन दो राज्यों के बीच पड़ता है, जिसमे ६ जनपद(काउंटी), १३ शहर-कस्बे, और चार नेटिव अमेरिकन रिजर्व आते है. कोलंबिया नदी जो पहाड़ों के बीच से बहती दिखती है , दरअसल ये समुद्र तल से भी नीचे बहती है, और जो पहाड़ हैं, वो पहाड़ न होकर जमीन का वो बचा हुआ हिस्सा है जो पानी की धार से कटा नहीं, घाटी महज एक बड़ा दर्रा है. पहाड़ और दर्रे बिलकुल एक सा वितान, एक सरीखे. ये इलाका देखकर और आइसएज़ के बाद बने तमाम क्षेत्रों को देखकर समझ आता है  कि पहाड़ हमेशा जमीन के ऊपर उठने से ही नहीं बनते, जमीन के भीतर कटाव से भी बनते हैं. जमीन दरकती है, दर्रे बनते है, और बचा रह गया प्लेट्यू पहाड़.  विपरीत चीज़ों के बीच साम्य का भ्रम, पृथ्वी ऐसी ही है.  

उन्नीसवीं सदी के मध्य में , हिमालय की तरह यहाँ भी नेटिव पेड़ों का भारी मात्रा में कटान हुआ और इस इलाके में लकड़ी के टालों  और आरा मशीनों के अलावा कोई दूसरा उधोग नहीं था.  नेटिव वृक्ष  जब कट गए तो सिर्फ व्यवसायिक नज़रिए से ही यहाँ तेज़ी से बढ़ने वाले वृक्ष लगाए गये. 
 पहले विश्वयुद्द के बाद, लगभग सौ साल पहले इस क्षेत्र को पर्यटन स्थल की तरह विकसित किया गया, यहाँ अमेरिका का पहला सीनिक हाइवे, कोलंबिया रिवर हाइवे, १९१३-१९२२ के बीच बना. पहली बार किसी हाइवे के निर्माण के लिए भारी मात्र में मेटल–बेस्ड संरचना का निर्माण किया गया, जो इस हाईवे को लंबे समय से टिकाये हुये है. जब ये हाइवे बन रहा था तो इस बात का बड़ी बारीकी से विशेष ध्यान रखा गया कि गोर्ज के साथ कम से कम छेड़-छाड़ हो, इस सोच के इर्द-गिर्द इस हाईवे का निर्माण हुआ, जिसका श्रेय  वकील सैम्युअल हिल और इंजीनियर सैम्युअल लेंकास्टर को जाता है . 
१९३० तक आते आते बहुत बड़ी संख्या में पर्यटक गोर्ज को देखने आये और गोर्ज में अंधाधुंध कंस्ट्रक्शन न् हो इसकी चिंता बनी. १९३७ में पेसिफिक नॉर्थवेस्ट के क्षेत्रीय कमीशन ने गोर्ज को राष्ट्रीय महत्तव का क्षेत्र घोषित किया और इसे संरक्षित पार्क बनाने की पेशकश की. कई सालों तक प्रकृति प्रेमियों ने इस एरिया के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध होकर तथाकथित विकास को दूर ठेले रखा. अंत में १९८० में पोर्टलैंड की एक गृहणी नेन्सी रसल ने जागरूक नागरिक मोर्चा बनाया और इस एरिया के संरक्षण की फेडरल गवर्नमेंट से मांग की. आन्दोलन करीब ६ साल चला, और नेन्सी रसल इस आंदोलन का चेहरा बनी, उन्हें बहुत सी व्यक्तिगत धमकियां मिली, कार का एक बम्पर स्टिकर भी पोपुलर हुआ Save the Gorge from Nancy Russel”.  १९८६ में तत्कालीन रास्ट्रपति  रीगन ने इस पर दस्तखत किये, और अब गोर्ज हमेशा के लिए विकास की आंधी से बच गया है. 

अब ये क्षेत्र २९२,५०० एकड़ का कोलंबिया नदी के दोनों तरफ फैला है.  अब इस एरिया के विकास और प्राकृतिक सौंदर्य को बरकरार रखने के लिए एक स्वायत्त कमीशन है जिसके १३ सदस्य है, ३ सदस्य ओरेगन का गवर्नर और ३ वाशिंगटन का गवर्नर मनोनीत करता है. और ६ सदस्य  अपने जनपद से आते है. एक सदस्य फोरेस्ट डिपार्टमेंट से आता है. 

हालांकि विकास और रोजगार को दरकिनार करके प्रकति को संरक्षित किया जाय तो लोग हाशिए  पर आ जायेंगे, इसीलिए बहुत सचेत तरह से विकास की ज़रूरत होती है. इस इलाके में पर्यटन सीमीत है, लगभग हर साल २० लाख पर्यटक गोर्ज में आते हैं. रहने के लिए कोई बड़ा होटल नहीं है, सिर्फ कुछ पुराने घरों में बेड एंड ब्रेकफास्ट की व्यवस्था है, बाक़ी लोग दिनभर यहाँ घुमते हैं, और वापस पोर्टलैंड चले जाते हैं.  सिर्फ कुछ पार्किंग लॉट हैं, बहुत से हाइकिंग ट्रेल्स है, वाटर सर्फिंग और विंड सर्फिंग के ऑउटडोर स्पोर्ट्स है.

आज इस गोर्ज में बहुत से हाईटेक, कंपनियां है, सौ साल पहले जहाँ जगह-जगह आरामशीनें थी, लम्बर कंपनियां थी, अब  बहुत सी इंजीनियरिंग की कंपनियां है. जैसे डालास वाटरफ्रंट पर जहाँ अलुमिनियम की भट्टी होती थी, अब गूगल का डाटा सेंटर है.  अब इस एरिया में बहुत से विनयर्ड्स भी है.. २००४ में इस एरिया को अमेरिकन विटीकल्चर एरिया की आधिकारिक स्वीकृति मिल गयी है. गोर्ज गाइड के अनुसार यहाँ पचास से ज्यादा विनयर्ड्स में अंगूर की लगभग तीस किस्में उगाई जातीं हैं. अंगूर के अलावा इस इलाके में बड़ी मात्र में हिमालयन ब्लेक बेरी , हिसालू, सेब, पल्म, नाशपाती, आडू, खुबानी भी उगायी जाती है.
 
गोर्ज को देखकर तसल्ली होती है कि आने वाली पीढीयों के लिए ये जगह बची रहेगी. 


केदारनाथ और उत्तराखंड के दुसरे इलाकों में हुयी भयानक तबाही के बाद भी क्या उत्तराखंड के नीतिनिर्माता कोई सबक लेंगें . पर्यटन और हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्लांट्स के इतर प्रकृति से मेल जोल रखने वाली होर्टीकल्चर  इंडस्ट्री और सॉफ्टवेर और हार्डवेयर की इंडस्ट्री का विकल्प सोचेंगे? उत्तराखंड के मानव संसाधन को शिक्षित और कुशल बनाने के लिए क्या राज्य कभी इन्वेस्ट करेगा या पिछड़ी खेती को ही नए वैज्ञानिक आयाम देने की कभी पहल होगी ? या सिर्फ पर्यटन का ही ढोल बजाएगा जहाँ लोग सिर्फ होटलों के सर्विस सेक्टर और खच्चर पर सामान ढोनें वाले मजदूर ही बने रहेंगे.


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Jun 25, 2013

उत्तराखंड

उत्तराखंड को छोड़े हुए अब मुझे बीस वर्ष से ज्यादा का समय हुआ, वहां की खबर बीच बीच में छुट्टी का समय बिताने, परिवार व मित्रों से ही मुझे मिलती है, अब समाचार पत्रों और इन्टरनेट से. पिछले बीस वर्षों में किसी बाहरी इंसान की तरह ही मैंने उत्तराखंड को दूर से देखा है, लेकिन किसी भीतर वाले की नज़र से, यहाँ वहां माइक्रो स्कोप लेकर भी. इन वर्षों में बार बार विस्थापन की दुखदायी प्रोसेस के बीच बार बार अपने घर को याद किया, गाँव को याद किया, दुनियाभर में जब भी पहाड़ देखें, उस तरह के भूगोल में लोगों को चैन से सारी संभावनाओं के साथ देखा, घर याद आया, उत्तराखंड याद आया और लगता रहा कि काश हमारे परिवेश में भी ये सब होता तो यूँ इतने सारे लोगों को दर -दर नहीं भटकना पड़ता. बचपन के शुरुआती वर्षों का पहाड़ पर बिताया अच्छा समय था , उसकी भोली याद अब तक मुझे पहाड़ से जोड़े रखती है. लेकिन ये फिर अवचेतन की बात है.

चेतन दिमाग हमेशा से जानता था, अब भी जानता है कि ये काश ..काश , मेरे जीवन में संभव नहीं ही होने वाला है. जब से होश आया, मुझे उत्तराखंड के गाँवों, कस्बों और छोटे शहरों का बाहरी दुनिया से बेतरह कटे होने की कोफ़्त, वहां किसी भी तरह के अवसरों का अभाव हमेशा से न सिर्फ दुखी करता रहा, बल्कि मुझे लगा कि मेरी स्थिति पिंजरे में बंद किसी जानवर जैसी, या कुंए में गिरे किसी जानवर की है, जहाँ ठीक से खड़े होने की कोशिश करना भी सर टकराने जैसा है. उत्तराखंड के आम लोगों के भाग्यवादी होने से, उनकी धार्मिक जकड़न, जातिगत भेदभाव से हमेशा चिढ़ रही है, औरतों की दोयम दर्जे की नियति से गहरी नफ़रत रही है, हमेशा कोफ़्त हुयी, औरतों के वर्त-उपवास की दुनिया से, मर्दों के ज़ाहिलपने से, मूढ़ता से और उनके दंभ से नफ़रत रही है. उससे दूर कहीं और, किसी बेहतर जगह लगातार भागने का मन बना रहा, और लगातार भागती रही हूँ. हमेशा से पुरानी दुनिया के टूटने की मंशा लिए रही हूँ, मनाती रही आधी उम्र कि कोई बड़ी टूटफुट हो, उत्तराखंड बदले, बेहतर हो.

अब पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से उत्तराखंड बदला है, और जैसी टूटफूट हो रही है, वो अब आँखों के सामने घटित दुस्वपन है ..., उसे कैसे सहा जाय ?

Jun 24, 2013

डॉ खड्ग सिंह वल्दिया: उत्तराखंड: केदारनाथ मंदिर कैसे हमेशा बच जाता है? (courtesy bbc hindi)


 सोमवार, 24 जून, 2013 को 18:59 IST तक के समाचार

नदियों के फ्लड वे में बने गाँव और नगर बाढ़ में बह गए.
आख़िर उत्तराखंड में इतनी सारी बस्तियाँ, पुल और सड़कें देखते ही देखते क्यों उफनती हुई नदियों और टूटते हुए पहाड़ों के वेग में बह गईं?
जिस क्षेत्र में भूस्खलन और बादल फटने जैसी घटनाएँ होती रही हैं, वहाँ इस बार इतनी भीषण तबाही क्यों हुई?
उत्तराखंड की त्रासद घटनाएँ मूलतः प्राकृतिक थीं. अति-वृष्टि, भूस्खलन और बाढ़ का होना प्राकृतिक है. लेकिन इनसे होने वाला जान-माल का नुकसान मानव-निर्मित हैं.
अंधाधुंध निर्माण की अनुमति देने के लिए सरकार ज़िम्मेदार है. वो अपनी आलोचना करने वाले विशेषज्ञों की बात नहीं सुनती. यहाँ तक कि जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के वैज्ञानिकों की भी अच्छी-अच्छी राय पर सरकार अमल नहीं कर रही है.
वैज्ञानिक नज़रिए से समझने की कोशिश करें तो अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इस बार नदियाँ इतनी कुपित क्यों हुईं.
नदी घाटी काफी चौड़ी होती है. बाढ़ग्रस्त नदी के रास्ते को फ्लड वे (वाहिका) कहते हैं. यदि नदी में सौ साल में एक बार भी बाढ़ आई हो तो उसके उस मार्ग को भी फ्लड वे माना जाता है. इस रास्ते में कभी भी बाढ़ आ सकती है.
लेकिन इस छूटी हुई ज़मीन पर निर्माण कर दिया जाए तो ख़तरा हमेशा बना रहता है.

नदियों का पथ


नदियों के फ्लड वे में बने गाँव और नगर बाढ़ में बह गए.
केदारनाथ से निकलने वाली मंदाकिनी नदी के दो फ्लड वे हैं. कई दशकों से मंदाकिनी सिर्फ पूर्वी वाहिका में बह रही थी. लोगों को लगा कि अब मंदाकिनी बस एक धारा में बहती रहेगी. जब मंदाकिनी में बाढ़ आई तो वह अपनी पुराने पथ यानी पश्चिमी वाहिका में भी बढ़ी. जिससे उसके रास्ते में बनाए गए सभी निर्माण बह गए.
 केदारनाथ मंदिर इस लिए बच गया क्योंकि ये मंदाकिनी की पूर्वी और पश्चिमी पथ के बीच की जगह में बहुत साल पहले ग्लेशियर द्वारा छोड़ी गई एक भारी चट्टान के आगे बना था.
नदी के फ्लड वे के बीच मलबे से बने स्थान को वेदिका या टैरेस कहते हैं. पहाड़ी ढाल से आने वाले नाले मलबा लाते हैं. हजारों साल से ये नाले ऐसा करते रहे हैं.
पुराने गाँव ढालों पर बने होते थे. पहले के किसान वेदिकाओं में घर नहीं बनाते थे. वे इस क्षेत्र पर सिर्फ खेती करते थे. लेकिन अब इस वेदिका क्षेत्र में नगर, गाँव, संस्थान, होटल इत्यादि बना दिए गए हैं.
यदि आप नदी के स्वाभाविक, प्राकृतिक पथ पर निर्माण करेंगे तो नदी के रास्ते में हुए इस अतिक्रमण को हटाने के बाढ़ अपना काम करेगी ही. यदि हम नदी के फ्लड वे के किनारे सड़कें बनाएँगे तो वे बहेंगे ही.

विनाशकारी मॉडल


पहाडं में सड़कें बनाने के ग़लत तरीके विनाश को दावत दे रहे हैं.
मैं इस क्षेत्र में होने वाली सड़कों के नुकसान के बारे में भी बात करना चाहता हूँ.
पर्यटकों के लिए, तीर्थ करने के लिए या फिर इन क्षेत्रों में पहुँचने के लिए सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है. ये सड़कें ऐसे क्षेत्र में बनाई जा रही हैं जहां दरारें होने के कारण भू-स्खलन होते रहते हैं.
इंजीनियरों को चाहिए था कि वे ऊपर की तरफ़ से चट्टानों को काटकर सड़कें बनाते. चट्टानें काटकर सड़कें बनाना आसान नहीं होता. यह काफी महँगा भी होता है. भू-स्खलन के मलबे को काटकर सड़कें बनाना आसान और सस्ता होता है. इसलिए तीर्थ स्थानों को जाने वाली सड़कें इन्हीं मलबों पर बनी हैं.
ये मलबे अंदर से पहले से ही कच्चे थे. ये राख, कंकड़-पत्थर, मिट्टी, बालू इत्यादि से बने होते हैं. ये अंदर से ठोस नहीं होते. काटने के कारण ये मलबे और ज्यादा अस्थिर हो गए हैं.
इसके अलावा यह भी दुर्भाग्य की बात है कि इंजीनियरों ने इन सड़कों को बनाते समय बरसात के पानी की निकासी के लिए समुचित उपाय नहीं किया. उन्हें नालियों का जाल बिछाना चाहिए था और जो नालियाँ पहले से बनी हुई हैं उन्हें साफ रखना चाहिए. लेकिन ऐसा नहीं होता.
हिमालय अध्ययन के अपने पैंतालिस साल के अनुभव में मैंने आज तक भू-स्खलन के क्षेत्रों में नालियाँ बनते या पहले के अच्छे इंजीनियरों की बनाई नालियों की सफाई होते नहीं देखा है. नालियों के अभाव में बरसात का पानी धरती के अंदर जाकर मलबों को कमजोर करता है. मलबों के कमजोर होने से बार-बार भू-स्खलन होते रहते हैं.
इन क्षेत्रों में जल निकास के लिए रपट्टा (काज़ वे) या कलवर्ट (छोटे-छोटे छेद) बनाए जाते हैं. मलबे के कारण ये कलवर्ट बंद हो जाते हैं. नाले का पानी निकल नहीं पाता. इंजीनियरों को कलवर्ट की जगह पुल बनने चाहिए जिससे बरसात का पानी अपने मलबे के साथ स्वत्रंता के साथ बह सके.

हिमालयी क्रोध


भू-वैज्ञानिकों के अनुसार नया पर्वत होने के हिमालय अभी भी बढ़ रहा है.
पर्यटकों के कारण दुर्गम इलाकों में होटल इत्यादि बना लिए गए हैं. ये सभी निर्माण समतल भूमि पर बने होते है जो मलबों से बना होती है. नाले से आए मलबे पर मकानों का गिरना तय था.
हिमालय और आल्प्स जैसे बड़े-बड़े पहाड़ भूगर्भीय हलचलों (टैक्टोनिक मूवमेंट) से बनते हैं. हिमालय एक अपेक्षाकृत नया पहाड़ है और ये अभी भी उसकी ऊँचाई बढ़ने की प्रक्रिया में है.
हिमालय अपने वर्तमान वृहद् स्वरूप में करीब दो करोड़ वर्ष पहले बना है. भू-विज्ञान की दृष्टि से किसी पहाड़ के बनने के लिए यह समय बहुत कम है. हिमालय अब भी उभर रहा है, उठ रहा है यानी अब भी वो हरकतें जारी हैं जिनके कारण हिमालय का जन्म हुआ था.
हिमालय के इस क्षेत्र को ग्रेट हिमालयन रेंज या वृहद् हिमालय कहते हैं. संस्कृत में इसे हिमाद्रि कहते हैं यानी सदा हिमाच्छादित रहने वाली पर्वत श्रेणियाँ. इस क्षेत्र में हजारों-लाखों सालों से ऐसी घटनाएँ हो रही हैं. प्राकृतिक आपदाएँ कम या अधिक परिमाण में इस क्षेत्र में आती ही रही हैं.
केदारनाथ, चौखम्बा या बद्रीनाथ, त्रिशूल, नन्दादेवी, पंचचूली इत्यादि श्रेणियाँ इसी वृहद् हिमालय की श्रेणियाँ हैं. इन श्रेणियों के निचले भाग में, करीब-करीब तलहटी में कई लम्बी-लम्बी झुकी हुई दरारें हैं. जिन दरारों का झुकाव 45 डिग्री से कम होता है उन्हें झुकी हुई दरार कहा जाता है.

कमज़ोर चट्टानें


कमजोर चट्टानें बाढ़ में सबसे पहले बहती हैं और भारी नुकसान करती हैं.
वैज्ञानिक इन दरारों को थ्रस्ट कहते हैं. इनमें से सबसे मुख्य दरार को भू-वैज्ञानिक मेन सेंट्रल थ्रस्ट कहते हैं. इन श्रेणियों की तलहटी में इन दरारों के समानांतर और उससे जुड़ी हुई ढेर सारी थ्रस्ट हैं.
इन दरारों में पहले भी कई बार बड़े पैमाने पर हरकतें हुईं थी. धरती सरकी थी, खिसकी थी, फिसली थीं, आगे बढ़ी थी, विस्थापित हुई थी. परिणामस्वरूप इस पट्टी की सारी चट्टानें कटी-फटी, टूटी-फूटी, जीर्ण-शीर्ण, चूर्ण-विचूर्ण हो गईं हैं. दूसरों शब्दों में कहें तो ये चट्टानें बेहद कमजोर हो गई हैं.
इसीलिए बारिश के छोटे-छोटे वार से भी ये चट्टाने टूटने लगती हैं, बहने लगती हैं. और यदि भारी बारिश हो जाए तो बरसात का पानी उसका बहुत सा हिस्सा बहा ले जाता है. कभी-कभी तो यह चट्टानों के आधार को ही बहा ले जाता है.
भारी जल बहाव में इन चट्टानों का बहुत बड़ा अंश धरती के भीतर समा जाता है और धरती के भीतर जाकर भीतरघात करता है. धरती को अंदर से नुकसान पहुँचाता है.
इसके अलावा इन दरारों के हलचल का एक और खास कारण है. भारतीय प्रायद्वीप उत्तर की ओर साढ़े पांच सेंटीमीटर प्रति वर्ष की रफ्तार से सरक रहा है यानी हिमालय को दबा रहा है. धरती द्वारा दबाए जाने पर हिमालय की दरारों और भ्रंशों में हरकतें होना स्वाभाविक है.
(रंगनाथ सिंह से बातचीत पर आधारित)

( http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/06/130623_ks_valdiya_uttarakhand_rns.shtml)

Jun 23, 2013

हिमालयी क्षेत्र को बिना संरक्षित किये तबाही को बचाना नामुमकिन है

"पर्बत वो सब से ऊँचा हमसाया आसमाँ का, वो सन्तरी हमारा वो पासबाँ हमारा"


भारत का तीन दिशाओं में तैनात प्रहरी हिमालय क्षतिग्रस्त हो गया है, किसी बाहरी दुश्मन ने नहीं किया, ये भीतरघात है, 16 जून को हुयी उत्तराखंड की तबाही हिमालय की बिलबिलाहट है, चेतावनी है.

इस गुपचुप भीतरी हमले की शुरुआत, हिमालय के जन जीवन पर आघात की कहानी, उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र के दोहन की कहानी वर्ष १८१५ में शुरू हुयी,  जब अंग्रेजों की सहायता से गढ़वाली और कुमायूं की सेनाओं ने गोरखा फौज को हराया और अपने क्षेत्र को आज़ाद किया.  लेकिन आजादी की कीमत अंग्रेजों के साथ हुयी संधि के तहत पूरा कुमायूं और गढ़वाल का एक हिस्सा सीधे अंग्रेजों के सुपुर्द हुआ.  अंग्रेजों ने पहाड़ की छानबीन की, यहाँ की बहुमूल्य लकड़ी पर खासकर उनकी नज़र गयी.  १८२३ में पहला वन अधिनियम आया, जिसने पहाड़ की जोत की जमीन के अलावा जो भी जमीन थी, सबको सरकारी घोषित कर दिया, जिनमें हर गाँव के सामूहिक चारागाह, पंचायती वन, नदी, तालाब और नदी के आस-पास की जमीन थी. १८६५ में अंग्रेजों ने वन विभाग की स्थापना की और पहाड़ की आधे से ज्यादा जमीन पर कब्ज़ा किया. अब उत्तराखंड की अस्सी प्रतिशत जमीन पर कई वन कानूनों के बाद वन विभाग का कब्ज़ा है.

पारम्परिक रूप से पहाड़ियों की जीवीका कई तरह की मिश्रित गतिविधियों से चलती थी,  खेती उसका एक बहुत छोटा भाग था.  नदी से मछली, जंगल से शिकार, और बहुत कंद -मूल-फलों, वनस्पतियों, मशरूम आदि के संग्रहण से पोषण होता था.  इसके अलावा पहाड़ के कई समुदाय खेती नहीं करते थें, बल्कि उनकी जीवीका का मुख्य आधार पशुपालन था, पशुपालक समुदाय तिब्बत, चीन, उत्तराखंड , नेपाल , लद्दाख , हिमाचल के बीच वर्षभर घूमते और लगातार चीज़ों को खरीदते-बेचते हुए अपनी गुजर करते थे और पहाड़ की आत्मनिर्भर, संपन्न, अर्थ व्यवस्था की रीढ़ थे. गढ़वाल का चांदी का सिक्का ('गंगाताशी') मुग़ल साम्राज्य के उत्कर्ष के दिनों में भी मुग़ल सिक्के से ज्यादा कीमत का था. अंग्रेज ने सिर्फ व्यक्तिगत सम्पति को ही वैध करार दिया और सारे पंचायती वन, चारागाह , नदी, नाले लोगों से छीन लिए. इस बदली स्थिति में जीविका के सारे रास्ते पहाड़ के लोगों के लिए बंद हो गए, पशुपालन मुमकिन न रहा.  बूढ़े, बच्चों और औरतों को छोड़ कर घर के जवान लड़के रोजगार की तलाश में मैदानों की तरफ दौड़े.  अब बची खेती को जोतने के लिए सिर्फ बूढ़े और औरतें ही बची.   हाकिम ने बड़े पैमाने पर पहाड़ियों की भर्ती फौज में करने के लिए इन्डियन मलेटरी अकेडमी की स्थापना भी देहरादून में की. पहाड़ के इसी इलाके में कुमायूं रेजीमेंट, गढ़वाल राइफल, गोरखा राइफल, इंडो-तिब्बत बोर्डर फ़ोर्स से लेकर हर तरह के सैनिक कार्यालयों और छावनियों की बसावट में पहाड़ी  शहर बसे.   बीसवीं सदी की शुरुआत से पहाड़ की आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे 'मनी ऑर्डर' व्यवस्था में बदल गयी.


इधर पहाड़ की लकड़ी बेचकर हाकिम के मुनाफे दिन दूना रात चौगुना हुआ.  पहले साल 1924-1925 में  फारेस्ट विभाग की आमदनी 5.67 करोड़ रूपये और सरप्लस में २ करोड़ की लकड़ी.  छ्पन्न वर्षों में ( 1869-1925 तक), लकड़ी बेचकर कुल मुनाफा 29 करोड़ और सरप्लस करीब  12 करोड़. बीस वर्ष बाद आजादी के समय तक अब तीस साल की कमायी एक साल में होने लगी, वर्ष 1944-45 में एक साल का लकड़ी बेचकर मुनाफा 12  करोड़ और सरप्लस करीब  5 करोड़.  आजाद भारत   के पिछले ६६ सालों का भारत सरकार का मुनाफा भी इस गरीब क्षेत्र से कम नहीं हुआ होगा (मेरे पास फिलहाल आंकड़े नहीं, अंग्रेजों का धन्यवाद की उनके आंकड़े  सहज उपलब्ध हैं ! ).  भारत सरकार व प्रदेश की सरकारों के खाते में खनन और हायड्रो इलेक्ट्रिक पावर प्लांट की कमायी भी जुड़ी. आजाद भारत ने पहाड़ के मानव संसाधन के लिए किसी दुसरे रोजगार की व्यवस्था नहीं की, वन विभाग की हथियायी हुयी जमीन को लोगों को नहीं लौटाया, न उसका इस्तेमाल पहाड़ के जन-जीवन के विकास और संरक्षण के लिए किया.  वर्ष १८२३ के बाद अब तक कई वन अधिनियम बने जिनका सार ये है कि उत्तराखंड का अस्सी प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा वन विभाग के कब्ज़े में हैं .  आज पहाड़ की सिर्फ ७% जमीन खेती की बची है, जिसमें पहाड़ की दस प्रतिशत आबादी भी गुजर नहीं कर सकती.  भारतीय फौज का बीस प्रतिशत आज भी दो प्रतिशत जनसँख्या वाले पहाड़ी इलाके से आता है. पहाड़ के लोगों के लिए विस्थापन विकल्प नहीं बल्कि जीवित बने रहने की शर्त है.

उत्तराखंड सरकार, चाहे किसी भी राजनैतिक दल की बने, उसकी नीतियाँ औपनिवेशिक लूट-खसौट के ढाँचे पर ही अब तक टिकी है.  भूमंडलिकरण या ग्लोबलाइशेशन के बाद और उत्तराखंड बनने के बाद हुआ सिर्फ इतना है कि लूट खसौट बहुत तेज़ और एफिसियेंट हो गयी है.  उत्तराखंड का हालिया तेरह वर्षों की विकास नीतियाँ सबके सामने हैं,  जिनके केंद्र में हिमालय के जीव, वनस्पति और प्रकृति का  संरक्षण  कोई मुद्दा नहीं, हिमालयी जन के लिए मूलभूत, शिक्षा, चिकित्सा, और रोजगार भी मुद्दा नहीं.  वे पूरे उत्तराखंड को पर्यटन केंद्र, ऐशगाह और सफारी में बदल रहे हैं.  निश्चित रूप से उत्तराखंड (सरकार का, माफिया व ठेकेदारों का) वन प्रदेश, खनन प्रदेश और ऊर्जा प्रदेश है.  इसीलिए जितनी भी नीतियां हैं,  वो जंगल, जमीन, और नदियों के दोहन की के लिए हैं. ये जन प्रदेश नहीं है, ये जन के लिए नीतीयाँ नहीं है.

पहाड़ के गरीब लोग पूरी एक सदी से ज्यादा समय से सिर्फ दिल्ली, लखनऊ, कलकत्ता, बंबई ही नहीं बल्कि ढ़ाका , लाहौर और काबुल तक होटलों में बर्तन मांजते और भटकते रहे हैं.  सौ साल में पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की भटकन में उनका भला न हुआ तो अब बीसवीं सदी में चारधाम के छह महीने से भी कम समय तक खुले होटलों के सर्विस सेक्टर उनका क्या भला करेंगे?   पर्यटन उधोग के नाम पर जिस अंधाधुंध तरीके से अनियोजित इमारतों के निमार्ण, सड़कों का चौड़ीकरण, नदी नालों और तालाबों के मुहाने पर कूड़ाकरण हुआ हैं, उसने पापियों को भले ही पावन न किया हो, हिमालय को सिर्फ न दूषित कर दिया है, बल्कि अब क्षतिग्रस्त भी कर दिया है.

जिन्हें हिमालय घूमना है, या तीर्थ दर्शन करनें हैं , वो अपने तम्बू लेकर घूमें, या पर्यटन एजेंसी तम्बू किराए पर दें, अपना खाना खुद बनायें,  या दुनियाभर के घुम्मकडों की तरह पैकैज्ड फ़ूड ले जाएँ, पाप धुलें न धुलें,  यायावरी का सुख और स्वास्थ्य जरूर पर्यटकों के हिस्से आयेगा.

 
उत्तराखंड राज्य सरकार को सिर्फ दैवी आपदा प्रबंधन नहीं करना है,  उत्तराखंड सरकार को इस राज्य का प्रबंधन ठीक करने की ज़रुरत है. उत्तराखंड की तबाही को प्राकृतिक या दैवीय आपदा कह कर टालबराई  से आने वाले सालों में आपदाओं की ही बाढ़ आयेगी.  उत्तराखंड और हिमालय की संरचना, और यहाँ के जन जीवन और एतिहासिक समझ की संगत  में विकास नीतियाँ बनाने और उनके क्रियान्वन की ज़रुरत है. हिमालय भुरभुरे मिट्टी के पहाड़ों से बना है, यहाँ के पेड़ों की जड़ें इस मिट्टी को नम और बांधे रखती हैं. जंगलों के कटान के साथ ही तेज हवा, और पानी के वेग का सीधा आघात पहाड़ पर पड़ता है. और भीतर से सुरंगों के जाल बिछ जाने से पहाड़ों की प्रकृति के आघातों को झेलने की क्षमता नहीं बचती. लगातार कटाव के फलस्वरूप नंगे हो गए पहाड़ों, भीतर से लागातार खोखले हो गए पहाड़ों में बाढ़ व भूस्खलन का खतरा बढ़ता ही जाएगा. ये प्रकृति का नहीं विकास के मॉडल का कसूर है .

पहाड़ की बिजली का विकल्प सौर ऊर्जा हो सकता है,  शहरी इलाकों की जीवन पद्दति में कुछ परिवर्तन से बिजली की ज़रुरत कम की जा सकती है,  लेकिन हिमालय का कोई विकल्प नहीं हैं, उसे रिपेयर करने की हमारी औकात नहीं है.  नदियों और पहाड़ों का सृजन हम नहीं कर सकतें. किसी भी सरकार और किसी भी एन.जी.ओ. की इतनी भी सामर्थ्य नहीं है कि वो हमारे पूर्वजों के हाड़तोड़ मेहनत से बनाये गए सीढ़ीदार खेतों की ही ठीक से मरम्मत कर सकें.

हिमालयी क्षेत्र को बिना संरक्षित किये तबाही को बचाना नामुमकिन है,  ग्रैंड कैनियन, यलो स्टोन पार्क आदि  प्राकृतिक साइट्स की तरह हिमालय को भी मनुष्य जाति  की धरोहर की तरह बचाना ज़रूरी है. पहाड़ नहीं बचेंगे तो मैदान भी नहीं बचेंगे, पूरा देश नहीं बचेगा. ..

Jun 19, 2013

उत्तराखंड नोट्स

बद्रीनाथ 
दादी और दादाजी एक बार सौ किलोमीटर से ज्यादा की पैदल यात्रा करके बद्रीनाथ गए थे, दादी की उम्र साठ और दादाजी की पचहतर थी, उनके साथ जो बीस लोग आस-पास के गाँव के थे वो भी उसी उम्र के थे.  सभी यात्रियों के पास मुश्किल से दो जोडी कपड़े, पानी का  तामलेट (तांबे की बोतल) और गुड के अलावा कुछ नहीं था.  पैदल चलते हुए जिस गाँव में पहुँचते वहीँ रुक जाते, गाँव के लोग ही उन्हें खाना-पीना खिला देते, जिन गाँवों से होकर आये थे उनकी खैर खबर लोगों को देतें.  महीने भर बाद लौटकर आये तो बद्रीनाथ का प्रसाद हर गाँव में बांटते हुए घर पहुंचे. गाँव के लिए भी कुछ प्रसाद था.  मुझे हथेली पर कुछ कच्चे पीले चने के दाने और चीनी के इलायची दाने की याद है. तामलेट में गंगाजल कई सालों तक घर में रहा ......

केदारनाथ
Southside of temple, Kedernath, Garwal, 1882.
घर के पुराने अल्बम में पिता जी की एक ब्लैक एंड वाइट तस्वीर जाड़ों के महीनों में केदारनाथ मंदिर के सामने की है,  सन सत्तर के दशक की तस्वीर, चारों  ओर बर्फ से सफ़ेद पहाड़ों के बीच काला भव्य मंदिर.  पिता जी कई वर्ष तक रुद्रप्रयाग, केदारनाथ, चमोली, गोपेश्वर में पोस्टेड थे, उस पूरे इलाके के चप्पे चप्पे को सालों तक उन्होंने पैदल छाना हैं.  केदारनाथ के साथ  यति मानव और अंगारों पर चलने वाले बाला साधु के किस्सों  की बहुत धुंधली याद  मेरे जहन में बची है. यति मानव के किस्से पिताजी ने भी सिर्फ सुने थे, दादा जी कहते थे की उनके गुरु ने सचमुच यति देखा था.  बाला  साधु को पिता ने देखा था, उससे बातें की थी.  मानव विज्ञानियों के पास फिलहाल हिमालय में होमो सेपियंस के अलावा किसी दूसरी मानव सदृश जाति के होने का कोई प्रमाण नहीं है. बीसवीं सदी की शुरुआत में सचमुच में हिमालय के जंगलों में जानवरों के बीच पला किशोर लोगों को मिला था, जिस के आइडिया को लेकर रुडयार्ड किल्पिंग ने जंगलबुक लिखी, और उसका हीरो मुगली रचा.
मै कभी केदारनाथ नहीं गयी, जब भी सोचा केदारनाथ के बारे में हमेशा यति मानव और बाल साधु को सोचा, बर्फ से ढके सफेद पहाड़ों के बीच पत्थर के भव्य काले मंदिर के बारे में सोचा .. ..


Jun 15, 2013

वाशिंगटन डी. सी. -01

महीने भर पहले, हफ्तेभर, वाशिंगटन डी. सी. में रहना हुआ.  इस बार  टूरिस्ट वाली हड़बड़ी की जगह इत्मीनान से जानने-देखने का मौका मिला.  इससे पहले, दो दफे यहाँ आना हुआ है, कुछ पुरानी यादें ताज़ा हो आयीं, अंदाज़ हुआ कि कितना भूल भी गयी हूँ ....

पहली बार  वाशिंगटन डी. सी. पन्द्रह साल पहले,  क्रिसमस के समय आयोवा से १९९८  में आयी  थी.  मेरे  मित्र मनोज और हेमा यहां थे. इन दोनों मित्रों के साथ मैंने नेशनल मॉल व मैमोरियल पार्क में अमेरिकी राष्ट्रपतियों के स्मारकों को देखा, नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ हेल्थ की लैब और बेथेस्डा की टहल की, इधर उधर छिटकी हुयी बर्फ दिखती थी, जो आयोवा के बर्फीले अंधड़ से निकल कर खुशनुमा अहसास था. अब इतने सालों बाद, स्मृति कुछ धुंधला गयी है. अच्छे समय गुजारने, उनके स्नेह की याद है.  आयोवा लौटते समय मनोज ने कहा था कि 'अगली बार चेरी फेस्टिवल के समय आना'.  


ये मौका पांच वर्ष बाद 2003 में मिला, मनोज और हेमा इस बीच भारत वापस लौट चुके थे, मेरा कोर्नेल ज्वाइन करना हुआ, शादी हुयी, और हमारे लम्बी ड्राइव करने के कुछ मौके बने.  इस दफे इथाका से आठ घंटे ड्राइव करते हुए हम ख़ास चेरी फेस्टिवल देखने अप्रैल के महीने में गए.  

चेरी फेस्टिवल का इतिहास काफी दिलचस्प है.  ओर्नामेंटल चेरी के ये पेड़ १९०० से पहले अमेरिका में नहीं थे. जापान से लौटे, अमेरिकन टूरिस्ट, अकसर खिले चेरी के पेड़ों की तसवीरें अपने दोस्तों परिचितों को उत्साह से दिखातें.  1885 में  अमेरिकी पत्रकार एलिजा स्किडमोर ने  जापान में ओर्नामेंटल खिले चेरी के पेड़ देखे, तो उन्हें  इन पोधों को अमेरिकी राजधानी वाशिंगटन डी. सी. लाने का ख्याल आया और कई वर्षों तक वो इसकी मुहीम चलाती रहीं, आर्मी के बड़े अफसरों, और प्रभावशाली लोगों से मिलती रहीं.  इस बीच डिपार्टमेंट ऑफ़ एग्रीकल्चर के बोटनिस्ट, प्लांट एक्स्प्लोरर, डेविड फेयरचाइल्ड ने एक हज़ार चेरी के पेड़ जापान से मंगवाए, उन्हें अपने निजी फार्म में लगाया, और स्कूली बच्चों को उनकी कलमें लगाने के लिए बांटते रहे.  एक ऐसे ही कार्यक्रम में एलिजा स्किडमोर की मुलाकात डेविड फेयरचाइल्ड से हुयी. एलिजा ने नए सिरे से डी. सी.  में बड़ी संख्या में चेरी के पेड़ लागने के लिए जरूरी धन जुटाना शुरू किया और एक ख़त इस सम्बन्ध में फर्स्ट लेडी हेलन टेफ्ट को भी भेजा, जिन्होंने इस प्रस्ताव को समर्थन दिया और प्रोजेक्ट शुरू हुआ.

टोकियो शहर के मेयर युकिओ ओज़ाकी ने  जापान की सदासयता के बतौर  वर्ष 1910 में  वाशिंगटन के लिए दो हज़ार चेरी के पेड़ों की पहली खेप भेजी.  जांच के दौरान इन पेड़ों में कुछ कीड़े और निमेटोड पाए गए, सारे पौधे जलाने पड़े.

दो वर्ष बाद, टोकियो शहर के  प्रसिद्द जापानी केमिस्ट जोकिची तकामीने के सहयोग से तीन हज़ार स्वस्थ चेरी के पेड़ों की दूसरी खेप अमेरिका पहुंची,  जिसे वाशिंगटन डी. सी. में  टाइडल बेसिन के चारों तरफ डेविड फेयरचाइल्ड की देखरेख में रोपा गया.  1965 में 3800 चेरी के पेड़ों की दूसरी खेप जापान से पहुंची जिसे टाइडल बेसिन और नेशनल मॉल व मैमोरियल पार्क में रोंपा गया.  

अब लगभग सौ साल बाद , हर अमेरिकी शहर के लैंडस्केप में ओर्नामेंटल चेरी के पेड़ दिखतें हैं, और लगता है जैसे यहीं के नेटिव हैं ये पेड़.  परन्तु वाशिंगटन डी. सी . के  नेशनल मॉल व मैमोरियल पार्क में प्रसिद्द राष्ट्रपतियों के स्मारकों,  कैपिटल बिल्डिंग, व्हाईट हाउस, लाइब्रेरी ऑफ़ कोंग्रेस, और और एक दर्जन से ज्यादा रास्ट्रीय संग्रहालयों के बीचों-बीच, विजातीय चेरी के फूलों की इस कदर सघन, हतप्रभ करने वाली मौजूदगी  विशेष हैं. 

बसंत उत्सव के तीन दिन सफेद, गुलाबी रंगत के फूलों से लकदक  चेरी के पेड़ों के बीच, पानी में उनकी छाया देखते, संगीत की धुनों के बीच, कुछ नेचुरल हिस्ट्री और स्मिथ सोनियन म्यूजियम्स की टहल करते बीते, और बाक़ी दूसरे म्यूजियम्स और आर्ट  गैलरी देखने की लालसा  के साथ  हम वापस इथाका लौट गयें ......

Jun 6, 2013

पेन्सल्वीनिया की मार्च डायरी-2013

दस बजे न्यूयॉर्क से स्टेट कॉलेज के लिए बस पर सवार हुयी, बस पहले ही आधे घंटे लेट चली, आधे रस्ते पहुंची तो स्नो स्टॉर्म शुरू हो गया, जो फिर अगले  ७ घंटों तक बना रहा. एक ही देश के भीतर, पांच दिन के भीतर, किसी दूसरी दुनिया में, किसी दुसरे मौसम में दाखिल हो गयी हूँ, घर छोड़ते समय चेरी और प्लम के पेड़ों पर फूल खिल गए थे, और आँगन में  डैफ़ोडिल्स   और ब्लू बेल्स...

कछुए की रफ़्तार से गाड़ी चल रही है , कभी-कभी सिर्फ दस किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से, मेरे पीछे की सीट पर बैठी औरत का किसी वकील मित्र के साथ पीट्सबर्ग मिलना तय था, अब मिलना संभव नहीं, अगर मिलना संभव हुआ तो, लौटकर उस मित्र का घर पहुंचना असंभव दिखता हैं. वो औरत पीट्सबर्ग  में अपने किसी परिचित के घर रात में रहने की गुजारिश कर रही है.   इतने तूफ़ान के बीच फॉर्मल तरह की  गुजारिश के संवाद सुनना दिलचस्प है, ये भी कि लोग किस तरह बराबर अपने आस-पास दूरियों का भूगोल व्यवस्थित रखतें है, दोस्तों को भी टेकन फॉर ग्रांटेड नहीं लेतें. लेकिन फ़ोन की बातचीत से दुसरे यात्री पक गए हैं, और उसे धीमें स्वर में बात करने को कहने लगे हैं.

इतनी बर्फबारी के समय बस से इस रास्ते जाना पहली बार हुआ है.  यूँ तकरीबन नौ वर्ष तक, इथाका से जब भी न्यूयॉर्क, न्यूजर्सी या वाशिंगटन डी. सी., जाना हुआ,  पेन्सल्वेनिया के बड़े हिस्से  से में ड्राईव करते हुए कई बार, अलग अलग मौसम में, गुजरना हुआ. शुरुआत के सालों में, खासकर दिसंबर -जनवरी के महीनों में ऐसा भी हुया कि रात में ड्राइव करते हुए जब बिंगहेमटन के आस-पास पहुंचे तो मीलों तक इतनी घनी धुंध और सिर्फ धुंध मिली कि अपने आगे की गाड़ी की मंद लाल बत्ती के अलावा कुछ न दिखा, न सड़क, न सड़क के दायें-बायें, न सामने से आती कोई कार या ट्रक, सिर्फ गहरा स्लेटी और काला, जिसके बीच पांच से दस किमी प्रति घंटे  की रफ़्तार से घंटे भर कार चलायी.

उन दिनों के खौफ का ही साया होगा जो अब तक सपनों में मुझे फिर घेर लेता है.  सपने में अक्सर इसी जाने पहचाने भूगोल में खुद को हाइवे पर कार चलाते हुए पाती हूँ, और आँखे हैं कि खुलती नहीं, आखों को खोलने की कड़ी कोशिश चलती रहती है, रुकने की कोई सुविधा नहीं, गाड़ी के स्टेरिंग पर हाथ, अंदाज़ से कार चलाती हूँ, डरी  हुयी कि अब किसी खड्ड में गिरे .., अब किसी ट्रक से टकराए ...

अब उस तरह से रात के समय लम्बी ड्राइव भी कितनी पुरानी बात हो गयी है, पिछले नौ वर्षों से बच्चों के साथ, किसी भी सूरत में रात में लम्बी ड्राइव ख़त्म हो गयी.  दिन में फिर अमूमन दोगुने समय के बजट के साथ ड्राइव का सिलसिला बना,  बीच में किसी पार्क में रुक गए, किसी रेस्टोरेंट में रुक गए, मतलब हर घंटे दो घंटे में रुकने की जो भी जगहें  हैं, उनका नक्शा दिमाग में बन गया.  बारिश और बर्फबारी के समय कहाँ से बचना और किधर से निकल लेना है का भी गणित बना.  फिर जैसे न्यूजर्सी  से हर तीन-चार महीने एक दफे भारतीय ग्रोसरी के लिए जाना रहता था, वापस लौटते हुए पेन्सल्वेनिया के बाहर आउटलेट मॉल  से कपड़ों की खरीद के लिए जाना भी शामिल हुआ .   ऑरेगन  आने के कुछ महीनों पहले एक दफे सेसमी स्ट्रीट जाना हुआ, बड़े बेटे को उसकी कुछ याद है, छोटा वाला सिर्फ चार महीने का था. वो कभी कभी सिर्फ एल्मो, कुकी मॉन्स्टर आदि की फोटो देखकर खुश  होता है . बच्चों के लिए शायद ये सचमुच के ही केरेक्टर  है,  मुझे हमेशा लबादे के भीतर बंद अपनी जीवीका की जुगत में लगे लोग दिखतें हैं, माँ और बाप जो बड़े वयस्क हैं, उनका भी बच्चों की ही तरह उनपर झपट पड़ने का अति उत्साह हमेशा कुछ उदास करता है, बहुत से बौने लोगों को इस बहाने काम मिलता है, सिर्फ इस वजह से भी तसल्ली नहीं होती, सतह की चहल पहल के नीचे बाज़ार की नींव पर खड़ी दुनिया सचमुच बहुत उदास करने वाली दुनिया है ...

बस यात्रा के साढ़े चार घंटे आखिर में सात घंटों में तब्दील हुई.  बहन के घर पहुंची, पार्किंग लॉट की बर्फ देखकर वो दिन याद आये जब आयोवा में कार के एंटीना पर रिबन बाँध देती थी, क्यूंकि सुबह तक कार बर्फ से ढक जाती थी, और अपनी कार पहचानना मुश्किल होता था.  घर पहुंचकर झोली-भात, भात-चूर्कानी, और चौलाई की भुज्जी खायी, फिर ऐसी नींद आयी, जैसे अपने माता-पिता के घर पहुँचने पर आती है.  सारे डिफेन्सेस, सारी सतर्कता, चिंता, चेतना पता नहीं कब झर गयी, भाई बहनों के घर पर भी संभवत: माता-पिता की अदृश्य छाया होती ही है. बहुत दिनों बाद सुबह नौ बजे तक सोती रही.....


Jun 3, 2013

यात्रा -१०

मन
बजता हो, एकतारा सा
तब कुछ दिन
मौन ...मौन ...मौन
मौन के साथ
घूमना,
खाना,
सोना,
ढूंढना,
खोजना,
और गुम  हो जाना

एक  दिन
मौन की देहरी पर जागना
उठ जाना,
और चल पड़ना,
स्मृतियों में धंसी आँख से
देखना
दिन,
साथ,
सपना,
सुनना
भूमीगत नदी की हिलोर ,
झरते पत्तों का गान,
भूली बोली की मिठास,
और
फिर लौट आना ....

**********

Jun 1, 2013

आम के नाम


गाँव के बीचों बीच आम का बगीचा था— पुराना, पुराने पेड़ों, पुरानी मिट्टी और पूर्वजों के श्रम से सींचा हुआ, सुगन्धित , क्रिस्पी, खट्टे, मीठे, कितने-कितने स्वाद; लँगड़ा, दशहरी, चौसा, हिमसागर, मालदा, तोतापरी, रसालू, नीलम, फज़ली, सलीम, बम्बईयाँ, रतौल, केसर, रानीपसन्द,  सफेदा, सौरभ ..., 

गाँव का साँझा बगीचा,  जैसे जोत के बाहर डांडा की जमीन पर पसरा चारागाह, जैसे ढलानों पर घना जंगल, और बरसाती छोहों से फूटते पानी को इक्कठा करने वाली एक छोटी सी पत्थर मिट्टी की कूड़ी 'नाव'. ...

अमराई के झुरमुट में स्कूल की छुट्टी के दिनों, स्कूल से आने के बाद, गर्मियों के लम्बे दिनों में,  धुंधलके तक बच्चे खेलते. बसंत में आम की बौर आती और उसकी खुशबू में पूरा गाँव नहाया रहता, कोयल, पपीहा, और करेंत ... जाने किन किन चिड़ियों के बोल से अमराई के साथ पूरा गाँव गूंजता .. ,

कच्चे आम और सचमुच के खट्टे दांत, गुड़  की कट्की काटने में भी तकलीफ होती .. ..होती खुशी भी ..., क्या सेंसेशन था वो ?   महीने भर तक कच्चे आम की चटनी बनती, अचार बनता. भूनी हुयी कच्ची अमिया का पना,  कच्चे आमों के टुकड़ों की धूप में सूखती मालाएं,  आम का  छिलका और बीज सुखाकर चूर्ण बनता ...

पत् ....पत् ...पत्  आम गिरते, लपक लपक कर अपनी फ्रॉक और कुर्तों, कमीजों में अगोरकर बच्चे घर लाते. ठंडे पानी की बाल्टी में डुबोते,  आम चूसते,  आम की सख्त गुठली चूसते,  फिर आम की इस हड्डी पर कोयले से आँख मुंह बनाते, कभी एक छेद बना कर डंडी फंसा कर खड़ा करते, माँ की किसी फट गयी साड़ी के टुकड़े से  लपेटते और बनाते गुड्डे, गुड़िया, चोर, सिपाही, नट, नटनी ... 


गाँव-गाँव घूमकर आम की खरीदारी का सौदा पटाते कुंजड़े, बगीचे के आम खच्चरों पर लादकर ले जाते कुंजड़े, कोन लोग थे, कहाँ के थे . ...

बरसात के बाद  आम से बिघ्लाण पड़  जाती, स्वाद ख़त्म हो जाता,  फिर इतने झड़ते आम, झड़ते रहते बेख्याली में,  उन पर मक्खियाँ भिनभिनाती, आम सड़ते, बगीचे में केंचुएं रेंगते,  किसी कोने अजगर पसरा दिखता या सरसराता हुआ सांप.

 महीने भर बाद आम की सिर्फ गुठलियाँ नज़र आती, हर तरफ, फिर एक दिन इसी हड्डी  के बीच में एक सुराख से एक नन्हा हरा पोधा  झांकता, तब पता चलता की हड्डी नहीं थी आम की गुठली! ,  सीपी का खोल की दो परते थी,  उसमें भीतर भी एक नन्हा जीव था !


समय की किस बोतल में बंद ये  कौन देश के बिम्ब ........