"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Jul 28, 2013

ज्वालामुखी के आँगन में —माउन्ट सेंट हेलेंस

दुनिया के लगभग तीन चौथाई ज्वालामुखी 'पेसिफिक रिंग ऑफ़ फायर' के भीतर आते हैं, जिनमें से कुछ ब्रिटिश कोलंबिया, वाशिंगटन, ऑरेगन, और कैलिफ़ोर्निया राज्यों में पसरी  कैस्केड पर्वत श्रृंखला के भीतर हैं.  पेसिफिक नार्थवेस्ट के लैंडस्केप को रचने में इन ज्वालामुखीयों की अहम् भूमिका रही है.  पिछले वर्ष माउंट मेज़मा पर हुए विस्फोट से बनी 'क्रेटर लेक' देखने का मौका मिला था, जिसके तल में अब सुप्त ज्वालामुखी है. 

इस इलाके में बहुत से एक्टिव ज्वालामुखी भी हैं. पोर्टलैंड या सियाटल से हरीभरी कैस्केड पर्वत श्रृंखला के बीच वनस्पति विहीन स्लेटी, बर्फ से ढके माउंट हुड, माउंट रेनियर और माउन्ट सेंट हेलेंस दूर से दिखतें हैं.  हवाई जहाज जैसे ही इन तीन पर्वतों के ऊपर से गुजरतें हैं, पायलट यात्रियों को याद दिलातें हैं कि वे इन पर्वतों के एरियल व्यू का मज़ा लेना न भूलें. सन दो हज़ार में सियाटल आयी थी, तब पहली बार आते-जाते हवाई जहाज से माउन्ट रेनियर और माउंट सेंट हेलेंस को देखा था. फट ये ख्याल आया कि शायद हिमालय की किसी चोटी का एरियल व्यू ऐसा ही होगा,  हालांकि  हिमालय का विस्तार वृहद् है, ये तुलना ही बेमानी थी, फिर भी घर की याद होगी, जिसने अजाने देश में समरूपता ढूंढ लेने का दबाव बनाया. 

 हवाई जहाज़ से, कई कई दफे इन पर्वतों को समीप से देख लेने का भ्रम हुआ है, लेकिन फिर एरियल व्यू, डिसटोर्टेड व्यू हुआ,  हर चीज़ बौनी, पिचकी हुयी नज़र आती है, पहाड़ देखने के लिए वैसे भी एरियल व्यू सबसे नाकाफी है, वैसे पहाड़ देखने के लिए कोई भी एक व्यू कभी पर्याप्त नहीं होता, पहाड़ की बहुत दूर से, ठीक तलहटी से,  360 डिग्री की परिधि में खड़े पडौसी पहाड़ों से और पहाड़ चढ़ते चले जाने के बीच कई-कई देखी, कई कई मौसमों के बीच दिखी और बहुत सी छिपी रह गयी झलकों से मिलकर पहाड़ का जादू सर चढ़ता है, विस्मित करता है, बार बार लौटेते रहने का आग्रह करता है. 

 पिछले हफ्ते,  माउंट सेंट हेलेंस तक जाने और इसे करीब से देखने का मौका लगा.   हालाँकि चार वर्ष पहले २००८ में यहाँ आखिरी मर्तबा एक छोटा विस्फोट हुआ था, लेकिन ये जो सामने लैंडस्केप है,  वो सन अस्सी के विध्वंस की सृष्टी है.  ढाई सौ मील के इलाके में ज्वालामुखी की राख, पमिस, लावा रॉक्स, हज़ारों  की संख्या में पेट्रीफाइड पेड़ ही पेड़, औंधे गिरे हुए,  खड़े के खड़े रह गए, अपनी जड़ों तक नग्न,  बिखरे हुए हैं.  ज्वालामुखी का सीधा प्रहार जिन पर्वतों पर हुआ, वहां  पूरी तरह मिट्टी की परतें पहाड़ों से उधड़  गयी, उनकी नुकीली देह पता नहीं कितने वर्ष बाद हरियाली ढक सकेगी, कब फिर से वन्यजीव, और पक्षी बसेंगें...

 बिना ऑक्सीजन के ज्वालामुखी के ताप में जल जाने, उस राख में एकमेक हो पत्थर हो गए पेड़ को छूती हूँ, सन अस्सी की ठीक-ठाक याद है मुझे, मन में ये ख़्याल आता है कि मैं सन अस्सी की मई अठारह को, किसी वजह से, यहाँ होती तो इन्ही पेड़ों की तरह एक पत्थर होती. दो हज़ार साल पहले  ज्वालामुखी में दब गए रोमन साम्राज्य के पुराने शहर पॉमपेई का सहसा स्मरण हो आता है. लगता है कि पॉमपेई के बीचों-बीच कहीं पहुंची हूँ.  पॉमपेई के विपरीत यहाँ मानवहानि बहुत कम हुयी. ये इलाका बहुत कम आबादी वाला, घने वनों से घिरा है, रिहायिश यहाँ से काफी दूरी पर है, और इतवार की सुबह जब विस्फोट हुआ तो यहाँ काम करनेवाले लोग दूर अपने घर पर थे, फिर भी ५७  लोगों की जान गयी, जिनमें कुछ कैम्पिंग करते हुए लोग, यहाँ काम कर रहे पत्रकार और कुछ वैज्ञानिक थे.  विस्फोट के कुछ ही दिनों बाद वैज्ञानिक यहाँ लौटे,  यहाँ पर हुयी रिसर्च से मिली जानकारियों से अब ये संभव हुआ है कि भविष्य में इस तरह के हादसों का पूर्वानुमान कुछ हफ़्तों पहले लग जाएगा, इन प्राकृतिक आपदाओं का मनेजमेंट संभव हो सकेगा.  मन में अभी भी, 16 जून 2013  में केदारनाथ में हुए विध्वंस की कथा समेत पहाड़ों की कई कई कथायें समान्तर चल रहीं हैं.

अस्सी के विस्फोट के बाद बहुत मात्रा में जो पेड़ अगल-बगल के पहाड़ों में गिरे थे, लेकिन जले नहीं थे, उनकी ढुलाई कई महीनों तक चलती रही.  अगले दो वर्षों तक यहाँ ६८,००० एकड़ में फिर पेड़ रोपें गयें, अब इन पेड़ों की उम्र भी तीस वर्ष हो गयी है, बहुत बड़े हिस्से में हरियाली लौट आयी है.  डगलस फर के ये पेड़ काले, सलेटी लावा, राख, चट्टानों से ढके पहाड़ों के बीच हरी पन्नी में लिपटी टूथपिक की कतारबद्ध, बौनी, सेनायें जैसी लगती हैं.  विनाश के बीच, जीवन की लड़ाई के योद्धा ही तो हैं ये हरे पेड़. इस हरेभरे के बीच ही अब निर्जन सेंट हेलेंस पर्वत दिखता है. 

सिर्फ तीस साल पहले ट्युटल नदी यहाँ से होकर बहती थी, ठीक माउन्ट सेंट हेलेंस के नीचे से,  और यहीं 'स्पिरिट लेक' भी है.  पुरानी तस्वीरों में साफ़ पानी की नीली नदी दिखती है, स्वच्छ , नीली 'स्पिरिट लेक' भी.  अब बहुत बड़े निर्जन का सलेटी विस्तार है, ट्युटल का बड़ा हिस्सा मलबे के नीचे भूमिगत है.  स्पिरिट लेक में राख घुला, गन्दला पानी है, नदी और झील दोनों का कुछ हिस्सा दलदल में बदला हुआ है. वर्षों बाद या कल ही कौन जानता है की यहाँ क्या होगा?

माउंट सेंट हेलेंस के ठीक सामने के पहाड़ पर, ट्युटल नाम की जगह में,   ब्लास्ट जोन के भीतर जॉनस्टन रिज़ ओब्जर्वेटरी एवं नेशनल वोल्केनिक मोन्यूमेंट है, जहाँ कई रियल लाइफ़ एक्जिबिट से लेकर ज्वालामुखी के मॉडल है, यहाँ  थियेटर में, 'The Eruption of Mount St. Helens' देखी.  ज्वालामुखी के विस्फोट और धुंएँ, गर्द की बारिश और विनाश की इमेजेज  हिरोशिमा के परमाणु बम विस्फोट की छवि उकेरती हैं.  लगता है पॉमपेई, हिरोशिमा और सन अस्सी के माउंट हेलेंस के विस्फोट सब की देखी, सुनी बातें एक साथ गूँथ रही हैं.    धीरे-धीरे स्क्रीन फोल्ड हो रही है, और अब परदे पर फिल्म की जगह, एक बड़ी खिड़की है, जिसके पीछे से माउंट सेंट हेलेंस नमूदार हुआ है.  एक उम्रदराज़ जोड़ा जो ठीक मेरे पीछे बैठा है, हमारी पारिवारिक फोटो लेने की पेशकश करता है, और बदले में यही प्रस्ताव उन्हें देती हूँ. इन लोगों का यहाँ दूसरी बार आना हुआ है, पांच वर्ष पहले जब यहाँ आये थे, उसक समय की धुंध  में उनके लिए बहुत कुछ देखना संभव नहीं हुआ था, आज के देखे की उनको खुशी है.  हम अपने धूप में नहाए दिन के शुक्रगुजार हैं  …

जॉनस्टन रिज़ ओब्जर्वेटरी जिस पहाड़ पर है, वहां मील पांच मील पैदल टहलते  ब्लास्ट जोन का बहुत बड़ा हिस्सा दिखता है, इस पूरे पहाड़ पर भी अब मिट्टी  नहीं है, पमिस, लावा, रेत की तरह भुरभुरी राख है, कई पेट्रीफाईड, बड़े, बड़े,  कोनीफर पेड़ आड़े तिरछे गिरे हुए हैं, फिर उनके ही बीच से जगह-जगह लूपिन के बैंजनी-नीले फूल, सफ़ेद एस्टर, अजाने नारंगी, पीले फूल, कुछ घास, खरपतवार, जंगली ओट उगीं हैं, धीरे-धीरे हरियाली के लिए जमीन रच देंगे यही.   हरे की आहटें हैं ये,  फिर किसी दिन, जब मैं नहीं रहूंगी, उग ही आएगा सब्जरंग…

यहाँ से माउंट सेंट हेलेन्स का विस्तार दीखता है,  पर्वत की मुख्य चोटी की जगह बड़ा गड्ढ़ा है,  अच्छे, उजले, धूप के इस दिन,  बर्फ से ढके, दो मुहानों से छूटते भाप के बगूले रह रह कर दिखतें हैं. बीच बीच में तेज़ हवा इन्हें बहाकर ले जाती है.  ये एक्टिव ज्वालामुखी है, पर इस वक़्त कितना शांत, किसी तरह का भय सृजित नहीं करता. इस वक़्त लगता है कि ये इस नए लैंडस्केप का सृजक ही है. विध्वंस और सृजन एक ही सिक्के के दो पहलू है, दोनों लगातार साथ साथ चलने वाली प्रक्रियाएं  …  




अस्सी के विस्फोट का एक वीडीयो है , पहले और बाद के लैंडस्केप का अंतर और विभीषिका का दस्तावेज  ….