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Jan 6, 2014

कैलाइडोस्कोप

एक दुनिया बाहर, सौ भीतर
एक फेनिल समंदर यहीं
सतह पर बुलबुले, तल में भार
यहीं मणि, माणिक, मूंगे, सीपी, मोती
यहीं  गहिर अँधेरा, आलोकित संसार
यहीं अंतरदीप्ती
यहीं विस्थापन का आयाम
और डूबने की स्मृति
यहीं हैं संशय के बीस गड्ढे
चाह की सत्तरह पगडंडियां
यहीं हैं याद रह गयी तकलीफ़
भूल जाने की शर्म
भुलाये जाने की टीस
और सांत्वना की फुलझड़ियाँ
यहीं है नमी, बरसात यहीं
यहीं है बरसों बरस ऊँचे हिमखंड 
बालपन की हरियर घाटी यहीं
साथ-साथ चलते पहाड़ यहीं
बहुत बहुत चुप के बीच
'मठु-मठु, छैल-छैल'* की बात यहीं
यहीं है सूरज का एक टुकड़ा 
यहीं हैं प्रगाढ़ स्मृति के बहुरंग
यहीं पतझर
फिर फिर बसंत यहीं...


06jan2014
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'मठु-मठु, छैल-छैल'*: भरी दोपहरी धीमें धीमें, छाया-छाया  में पहाड़ चढ़ लेने की एक गढ़वाली सीख. 

4 comments:

  1. मनोभावों का एक जीवंत दिक्कालिक कोलाज

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  2. obviously like your website however you need to take a look at the spelling on
    several of your posts. A number of them are rife with spelling problems and I to find it very bothersome to inform the truth on the other hand I
    will certainly come again again.

    my blog post web page

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  3. Thanks Mr./Ms. Anonymous for your comment. I am aware of these problems. The spelling problems in earlier posts, in majority, reflect my problems with tying Hindi. Also, I have forgotten Hindi, in almost two decades-long stay outside of India. I started this blog to reclaim my language. I look forward to suggestions of friends like you. I am also lazy and sometimes do not correct an obvious mistake, so please pardon me.

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