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Mar 5, 2014

मालूम नहीं चिड़िया

हमेशा से कुछ चौड़े, सधे, नपे, जाने पहचाने, रास्ते थे, जिनपर चल कर कहीं कहीं पहुंचा जा सकता था. उन रास्तों और उन मंजिलों में  सुरक्षा थी, खो जाने की सम्भावना कम थी, इसीलिए जो मिल सकता था उसी में संतोष करना था, उसी में गिनती की ख़ुशी, गिनती के सुख.  चौड़े, आजमाए रास्तों के दोनों तरफ, जब तब छोटी छोटी पगडंडियाँ थी जिन पर बीच बीच में मनचले निकलते कुछ दूर तक, फिर वापस आते. कुछ  सचमुच में खो जाते, रास्ता भटक जाते, जीवन भर वापस लौटने का रास्ता खोजते रहते.


कोई एक आध मन की पगडंडी के रास्ते ठेठ जंगल में निकल जाता, वो सचमुच ही खो जाना चाहता, उसे इस नपीतुली दुनिया से, रहस्यहीन  और रसहीन जीवन से नफ़रत होती,  वो हमेशा कहीं और, कहीं और, कहीं और निकल जाना चाहता. मन के किसी अँधेरे कोने में दुबककर बैठी रहती हज़ार पंखों वाली सतरंगी चिड़िया,  जो  जब तब डैने  फैलाकर उड़ जाती, जीवन उसके पीछे-पीछे  हरी घास पर दौड़ता, कंटीली  झाड़ में उलझता, खरोंचों से तार तार होता, लहूलुहान होता, किसी गहरी अंधेरी खाई में बेलगाम लुढ़कता, और और लुढ़कता चला जाता.  किसी दिन दौड़ते दौड़ते चिड़िया पकड़ में आती, पैराशूट बन कर समतल जमीन पर उतार देती, और तब जीवन कहता तौबा, अब और नहीं, चिड़िया अब कहीं और जाओ!

चिड़िया फिर कुछ देर अपने पंख समेटकर मन के अँधेरे कोने में दुबक जाती, जानती होती कि अगली उड़ान लम्बी और ज्यादा बेलगाम होगी, नहीं जानती चिड़िया कि  किस दिशा में होगी,  चिड़िया पैराशूट बन सकेगी या नहीं?

चुपचाप एक प्रार्थना  बुदबुदाती चिड़िया: 'मन गहरा रहे, उस गहरे में अँधेरे की याद रहे, ह्रदय की तगारी में पानी, पानी में झिलमिल रोशनी रहे . माफ़ी मांग लेने, और माफ़ कर सकने का हौसला रहे, जज़्ब करने कर लेने का धैर्य, सुन लेने का धीरज, चीन्ह लेने वाली आँख रहे. खड़े होते रहने, होने का हौसला रहे, मुझे अपने होने की खुशी रहे....




2 comments:

  1. परिपक्व लेखन जो मुझे कायल करता है!

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  2. Aapka shukriya Parul, likhna nahin hai koshish jai likhte rahne ki...

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