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Apr 18, 2014

उलटबासियाँ

सिर्फ गुनगुन आवाज़े हैं
कोई बात नहीं है
कोई जगह है हरी भरी
अकेली, लोगों के बीच घिरी
साफ़ कुछ दिखता नहीं
आँख है कि खुलती नहीं
और ढूंढते रहना जाने क्या क्या
अधूरा चाँद,  आधा वृत्त
दिवंगत दादी
दुगड्डे के बस अड्डे में लीची का ठेला
डोईवाला में योयो, बाक़ूगान
डेनवर में चाट की दूकान
यूँ ही किसी बस में चढ़ जाना
नीम अँधेरे किसी सुनसान में उतरना
जाने कौन शहर पहुंचना
इप्सविच, इम्फाल, इथाका
लेरेमी, लॉन्ग आईलैंड, लाटूर 
बाराबंकी, बंबई, बरोड़ा, बाड़मेर
हतप्रभ हूँ, खो गयी सी  
यहाँ किसी को  जानती नहीं
पहचानती नहीं, रस्ता सूझता नहीं
कोई कहता है
'बीस वर्ष बाद,  इन्ही जगहों पर 
फलाँ -फलाँ  रहते होंगे
बस अभी नहीं हैं. "
सपने के भीतर सपना
खेल के बीच खेल
और उलटबासियाँ 
सपनों के समांतर जीवन .....

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