"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Sep 3, 2014

अस्कोट से आराकोट -०२- अल्मोड़ा

23 मई 2014

नैनीताल से अल्मोड़ा जाते समय लगभग घंटे भर तक भवाली में जाम लगा रहा, लेकिन फिर रास्ता खुला तो अल्मोड़ा की तरफ आगे बढ़ने लगे.

जिस कार में बैठी हूँ उसमें मेरे साथ गिरिजा पांडे, स्टीव ड्रन, चन्दन डांगी, भूपेन सिंह,  देव प्रकाश डिमरी और बी. एस. नेगी हैं. कई तरह की बातें हो रहीं हैं प्रधानमंत्री  मोदी के वर्किंग स्टाइल की, लोगों का आपसी परिचय,  पहाड़ से जुड़ाव की बात, और फिर देश दुनिया की भी. कब किस बात का सिरा कहाँ जुड़ जाएगा तय नहीं.  चन्दन की आवाज मीठी है, वो बीच बीच में कई पहाड़ी गीत सुनाते चल रहे हैं,  भूपेन भी संगत करते चलते हैं.  स्टीव समाजशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं और खुशहाली पर रिसर्च करने आये हैं, स्वभाव से कम बोलने वाले  हैं,  वे अच्छी हिंदी बोलते हैं , लेकिन जब तक उनसे सीधे कुछ न पूछा जाय, कोई बात नहीं करते.

गिरिजा पांडे पहाड़ के मिथकों, लोककथाओं, लोक देवताओं से लेकर पहाड़ के इतिहास की तमाम बातों को रोचक ढंग से बताते चलते हैं.  गोलू, हरु, सैम आदि देवताओं के जागर के बारे में गिरिजा को सुनते लगता है किसी सपने में वापसी है, जैसे ये सबकुछ पहले सुना था, लेकिन अब कुछ भी याद नहीं सिवाय इसके कि ये नाम कहीं गहरे स्मृति में दबे हैं, ये कथाएं किसी बिसराये खाने में हैं. पहाड़ी जागरों की, जगरियों की, उनकी बजती थाली और  देवी देवता आये लोगों को देखने की बहुत बचपन की याद है, एक भय मिश्रित जुगुप्सा की याद है.  मैंने इन सब चीज़ों को किशोरवय तक आते आते अंधविश्वास के खाते में डाल दिया, फिर कभी पलट कर नहीं देखा. एक सहज जिज्ञासा में कुछ और चीज़ें पता चल सकती थीं, उसका भी रास्ता बंद हो गया.  मैं समझती हूँ कि बचपन की वो कुछ कुछ जादू, रहस्य भरी स्मृति मेरे लिए अमूल्य है.

सड़क के दोनों तरफ छितरे हुए चीड़ के जंगलों की और इस रास्ते के पुराने लैंडस्केप की कुछ याद मेरे मन के भीतर है, २९ वर्ष बाद अल्मोड़ा जा रही हूँ, एक पूरा युग बीत गया  है, बचपन के तीन वर्ष इस शहर में गुजरे हैं, अल्मोड़ा से खट्टी मीठी यादें जुड़ी हैं, इसी शहर में पहले पहल विज्ञान में रूचि हुयी,  साहित्य पढ़ना शुरू किया, कविता लिखना भी १२-१३ साल की उम्र में,  यहीं पढ़ने -लिखने  के संस्कार के बीज पड़े. जितनी तबकी मुझे याद है, अमूमन अधिकतर मकान पठाल की तिरछी छतों वाले थे, सरकारी मकान और कार्यालय लाल और हरे रंग के टिन की तिरछी छत वाले.  अल्मोड़ा के कारीगर जिस सफाई से पत्थर की स्लेटें काटते थे, उसकी प्रसिद्धि पूरे उत्तराखंड में थी. आज सड़क से जितना दिख रहा है, कोई पठाल की तिरछी छत वाला घर ढूंढें नहीं मिल रहा है. सब नए पुराने मकान अब सीमेंट के  लेंटर वाले हैं,  सब जगह सपाट छतें हैं.  संभव है कि मुख्य बाजार के भीतर अब भी कुछ पुराने पठाल की छत बची रह गयीं हों, लकड़ी के खूबसूरत दरवाजे बचे हो. अल्मोड़ा छोड़कर इतने वर्षों बाद भी कभी कभार इस शहर के सपने मुझे आते रहते हैं.  मेरा बहुत मन हो रहा था कि एक बार फिर पल्टन बाजार से लाला बाज़ार तक पैदल घूमकर आ जाऊं,  हनुमान मंदिर और थाना बाज़ार के बीच वो घर देख आ जाऊं जहाँ हम रहते थे, स्कूल तक फिर एक बार पैदल टहल कर आ सकूँ, कपड़े की दुकानों में हर जगह लहराते पिछौड़े और ताँबे के खूबसूरत नक़्क़ाशी वाली गागरें, और दुसरे बर्तन देख कर आ जाऊं,  लेकिन फिर सबके साथ ही निकलना था तो ऐसा हो नहीं सका.

अल्मोड़ा के सेवॉय होटल में  एक सभा हुयी, २०-३० लोग आये.  शमशेर सिंह बिष्ट जी से पहली बार मुलाकात हुयी,  पहली बार ही उन्हें सुनना भी हुआ.   शेखर दा ने यात्रा के बारे में घंटे भर का लेक्चर दिया, पूरे हिमालयी क्षेत्र की एक-एक नदी, नालें, झीलें, चोटियां, घाटियां  और बुग्याल, उनकी भौगोलिक स्थिति और उनसे जुड़ा कई तरह का डेटा उन्हें मुँहज़बानी याद है.  शेखर दा ने सबका परिचय भी कराया,  मेरे  परिचय की भी जाने अनजाने जो टोन बनी वो यही बनी कि अमेरिका से आयी रिसर्चर है.  मैं अपने देखे पहाड़ की लड़की थी, लोगों के देखे अमेरिका से लौटी रिसर्चर. कई तरह की आइडेंटीटीज के बीच जूझते  हुए अब पूरा जीवन निकल गया है तो अब मेरे लिए ये हैरानी का विषय नहीं है,  लेकिन आइडेंटिटी के ये खेल मुझे रोचक लगते हैं. मैंने श्याम मनोहर जोशी जी को याद किया कि जब 'कसप' का ठेठ अल्मोड़िया नायक इस शहर में 'देबिया  टैक्सी ' के नाम से पहचाना गया, तो मेरी क्या बिसात?

दाल भात खाकर हम पिथोरागढ़ की ओर रवाना हुए, अल्मोड़े से जरा बाहर शैलेश मटियानी का गाँव बाड़ेछीना और एन. एस. थापा का गाँव लम्बाटा दिखा.  सड़क के आस-पास भी गाँव दिखे, कुछ लोगों से बातचीत हुयी तो पता चला कि गाँव में पानी की दिक्कत है, इस अच्छे मौसम में पहले जो फलसब्जी इफरात में उग जाते थे अब संभव नहीं है.  पानी के स्रोत अधिकतर सूख गए हैं और जो बचे हैं उनका पानी प्रभावशाली लोगों के रिसॉर्ट में पहुँच जाता है.  टूरिज़्म इंडस्ट्री के मॉडल पर प्रदेश का विकास होगा तो फिर गाँव के हिस्से पानी कहाँ से आएगा?  फ़ायदा  जाने कितने लोगों को हुआ लेकिन फल और सब्जी बेचकर शहर के आस-पास के लोगों की जो आमदनी होती थी वो अब बंद हो गयी है. घर के आँगन में कोई हरियाली नहीं है.

रास्ते में गिरिजा हमें 'लक्खू उडियार' दिखाते हैं, उडियार की भीत पर भित्तिचित्र हैं, अधिकतर चित्रों में बहुत से लोग साथ-साथ हैं, जानवर, फूल, पेड़  और कुछ चिन्ह हैं, बमुश्किल एक जगह एक स्त्री-पुरुष का जोड़ा है, शायद कबीलाई राजा रानी या इष्ट देव व देवी. गिरिजा बताते हैं कि उत्तराखंड में पुरातात्विक महत्त्व की इस तरह की पांच गुफाएं हैं. अच्छी बात है कि उत्तराखंड में हज़ारों वर्षों से लोग रहते हैं, सब मुसलामानों के अत्याचार से भागकर पहाड़ नहीं आये हैं. 


1 comment:

  1. अल्मोड़े में हर शाम को घूमना एक आदत ही नहीं वरन दस्तूर सा है. लाला बाजार से शुरू कर के जोहरी बाजार तक जाना और वापिस आना. करीबन तीन चार बार इसी क्रम को दोहराना. और इनही क्रमो में उन दोस्तों से मिलना जिन्हे सुबह कॉलेज में मिल चुके थे. चौधरी चाट वाले के वहां चाट का आनंद. हनुमान मंदिर पे एक बार मत्था टेकना. दशहरो में पुतलो का प्रदर्शन. और नीचे कॉलेज वाले मैदान में उनका दहन. कैसे सालों निकल गए कुछ गुमान नहीं हो पाया. एक सनक थी की यही रहना है...इसी अल्मोड़े में. पर पलायन जरुरी था क्यूंकि जीवन जरुरी लगा था रुकने से ज्यादा. आज क्या हालत है ज्यादा पता नहीं...पर कुछ दिन पहले माता पिता गए थे पैतृक गावं गल्ली ...तो सुना की वह भी अब कोई नहीं रहता. सरकार की नीति चाहे जो कुछ हो....पलायन से पहाड़ो का पुराना सम्बन्ध है.
    दीदी आपके संस्मरण से जो थोड़ी बहुत यादें अल्मोड़ा की हैं स्मृति में स्वरुप हो उठी हैं. आपके पिथोरागढ़ के संस्मरणों का भी इंतज़ार है....ममकोट जो हुआ.

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