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Oct 14, 2014

AAA14: पांगू से यात्रा की विधिवत शुरुआत

25 मई 2014
"मन का घोड़ा, कसकर दौड़ा, मार चला मैदान 
चलता मुसाफिर  ही पायेगा मंजिल और मकाम "

नारायण आश्रम में विधिवत आज अस्कोट -आराकोट यात्रा का शुभारम्भ हुआ. शेखर दा ने श्रीदेव सुमन को याद करते हुए यात्रा का शुभारम्भ किया, कुछ दिशा निर्देश दिये, और बताया कि आगे क्या अपेक्षित है. चंडीप्रसाद भट्ट जी ने प्रार्थना करवायी, और एक गीत भी सबसे गवाया "मन का घोड़ा,  कसकर दौड़ा, मार चला मैदान '.  पहले एक पंक्ति वो गाते, जिसे हम लोग दोहराते.  82 वर्ष के चंडीप्रसाद भट्ट बहुत स्वस्थ और दमखम वाले इंसान है, संकरी, ऊंची-नीची पगडंडियां चढ़ने-उतरने में संकोच नहीं करते, उत्साह से भरे हैं.  उनकी आवाज बुलंद है, उसमें किसी तरह का संकोच नहीं है और उच्चारण साफ़ है.   उनके लिए ऊंची आवाज में गाना,  नारे लगवाना, किस्से सुनाना,  कविता पाठ, और लोगों को सम्बोधित करना, सब सांस लेने जैसा सहज है. हिंदी और गढ़वाली दोनों भाषाओं पर उनकी पूरी पकड़ है, खाने, पहनावे, रहन-सहन में किसी ग्रामीण पहाड़ी किसान की सी सादगी है, लेकिन सामाजिक-राजनैतिक  समझ तीखी है, व्यक्तित्व तेजस्वी है.  अपने जीवन में मेरे लिए ये पहला अनुभव है किसी सर्वोदयी क़िस्म की प्रार्थना में शामिल होने का.   
Photo by Sushma Naithani

राणाजी  और उनकी पत्नी ने हमें चाय और हलवा खिलाकर विदा दी. ये विदा कुछ घर जैसी ही थी, स्नेहसिक्त, वैसी नहीं जैसी किसी होटल को छोड़कर जाते हुए होती है. भट्ट जी जिस जीप से आये थे, अभी दो तीन दिन वो हमारे साथ रहेगी, इसीलिए पीठ का बोझ फिलहाल इस जीप में रख दिया है और  लगभग खाली हाथ या एक छोटे से बैग और पानी की बोतल लिए हुए हम लोग पांगू की  तरफ पैदल निकल पड़े.  जल्द ही चलने की रफ़्तार के आधार पर चार पांच ग्रुप बन गए. सबसे  रफ़्तार वाले शेखर दा, प्रकाश उपाध्याय, गिरजा पांडे, कैलाश तिवारी, कमल जोशी आदि कुछ मिनटों में ही आँख से ओझल हो गए.  कुछ लोग दूर से दिखते रहे, मैं सबसे पीछे चलने वालों में रही, मेरा साथ देने भूपेन, अंजलि और हिमानी थे.

नारायण आश्रम से पांगू तक  सड़क काफी ठीक हालत में है, हम दो तीन गांवों से होकर गुजरे लेकिन किसी से ज्यादा बातचीत के लिए नहीं रुके, चूँकि  ठीक ग्यारह बजे पांगू पहुँचने का तय हुआ था. इस इलाके में पांगू सहित चौदह गाँव हैं जिन्हे चौदास कहते हैं, इन गांवों में रंग भाषा बोली जाती है, और यहाँ के लोग भोटिया या शौका जनजाति के अंतर्गत आते हैं. भोटिया लोग पारम्परिक रूप से भारत, नेपाल, तिब्बत के बीच  घूमंतू ब्यापारी रहे हैं. अच्छे मौसम में ये लोग छह महीने घर रहते और बाक़ी छह महीने घूमंतू व्यापारी की तरह रहते रहे हैं, व्यापार के इन छह महीनों को रंग भाषा में 'कुंचा' (पलायन) कहते हैं.  शौक़ा और भोटिया लोग पहाड़ के सबसे समृद्ध लोगों में से रहे हैं, और रंग भाषा के अलावा हिमालयी क्षेत्र की कई भाषाएँ ये लोग जानते हैं.  भारत-चीन की १९६२ की लड़ाई के बाद सदियों पुराना इंडो-तिब्बत व्यापार बंद हो गया और जीवन यापन के लिए सरकार ने भोटिया लोगों को आरक्षित जनजाति की सूची में शामिल किया, आज विभिन्न सरकारी नौकरियों में और ऊंची नौकरियों में इस समुदाय के लोग हैं.
Photo by Sushma Naithani

 पांगू गाँव लगभग सड़क पर ही हैं.  सड़क पर गाँव की तरफ जानेवाला एक गेट या मुख्यद्वार है , यहाँ स्वतंत्रता संग्रामी परिमल सिंह हयांकि के नाम का बोर्ड लगा है.  अस्कोट आराकोट की १९८४ और १९९४ की यात्रा के समय इस गाँव में पहाड़ की टीम का स्वागत परिमल सिंह जी ने किया था.यहीं  स्युसंग (शिव) का  मंदिर है, और 15X 25  फुट का प्रांगण है.  हमारे इस गाँव में सूत्र कर्णसिंह और जगत सिंह हैं जो स्वर्गीय परमल सिंह हयांकि के पोते हैं.  करीब साठ साल के, नाती पोतों  वाले कर्णसिंह खुशमिजाज और रंगीले व्यक्तित्व के आदमी हैं, उन्होंने कुछ घूँट लगा रखी है, लेकिन उसका इतना ही असर है कि वो निसंकोच हमें रंग भाषा में गीत सुना रहे हैं, नाच भी जा रहे है,  जैसे सोलह सत्रह साल के लौंडे हो, और भावुक हो रहे हैं बात बात पर. किसी तरह की अभद्रता उनके व्यवहार में नहीं है.

जगत सिंह मुझे महिलाओं से मिलवाने ले जाते हैं, कुछ महिलाएं अभी अभी खेत से ही लौटी हैं और अपने हाथ-पैर धो रही हैं, करीब पचपन साल की गीता देवी का शरीर  कसा हुया है, चेहरे पर चमक, सरलता और मातृत्व का मिलाजुला मीठा भाव है. उन्होंने हमें अपने पारम्परिक जेवर दिखाए, कालीन बुनने की हथकरघा मशीन दिखायी, बने हुए करीब बीस खूबसूरत कालीन भी दिखायें. इसमें से  कालीन उनकी बहु प्रेमा ने बुने हैं. प्रेमा दो बच्चों की माँ  है, और उसकी शिक्षा एम. ए. तक हुई है, लेकिन वो खेती, घर के कामों और कालीन डिजायन करने और बुनने में  निपुण है, जो  परिवार की जीविका का मुख्य स्रोत है.

 गीता देवी के घर के आँगन में प्लम का पेड़ है , और एक दुसरे पेड़ को वो टिमाटर का पेड़ बता रहीं हैं, इस तरह का चौड़े पत्तों वाला पेड़ मैंने पहले कभी नहीं देखा, जितना समझ में आता है, उससे यही लगता है, कि टमाटर की जंगली बेल हो सकती है या बड़े छोटे पौधे, लेकिन लगभग प्लम के जैसा पेड़ नहीं हो सकता. शायद टमाटर की तरह दिखने वाला कोई खट्टा फल इस पेड़ पर लगता होगा, जिसका इस्तेमाल ये लोग टमाटर की जगह करते हैं.  बातचीत में जैसे कल पता चला कि कुमायूँनी में हर नदी को गंग (यानि गंगा) कहते हैं, शायद इसी तरह इस पेड़ को टमाटर का पेड़ कहते होंगे.
Photo by Sushma Naithani

गाँव के अधिकतर घर साफ़ सुथरे और ईंट सीमेंट वाले हैं, अधिकतर घरों की बेटियां, बहुएं, लड़के सरकारी नौकरियों में है. गाँव में अच्छी खेती हैं, अच्छा मौसम है, बहुत से लोग सरकारी नौकरी करने के बाद गाँव वापस लौटें हैं, या फिर गाँव और शहरों के बीच आते जाते रहतें हैं. लेकिन गाँव में अस्पताल और स्कूल की दिक्कत अब भी है.  नजदीकी अस्पताल करीब चालीस किलोमीटर दूर धारचूला में ही है. चौदास के इन गाँवों के बीच एक ए. एन. एम. है. औरतें बहुत मेहनती हैं, और आम शहरी महिलाओं  से ज्यादा स्वस्थ और फिट दिखती हैं, ज्यादा निर्भय भी हैं.    

चन्द्रादेवी गाँव की चुनी हुई  प्रधान हैं, उनकी उम्र करीब चौसठ वर्ष है, वो इस गाँव की बेटी हैं और रिटायर्ड शिक्षिका हैं. उनके चेहरे पर मास्टरनी वाली सख़्ती की बजाय बहुत ममता और मीठापन है. उनका स्वभाव दोस्ताना और ऐसा है कि उनसे किसी को भी सहज प्रेम हो जाय, फट से अपनापा बन जाय. गाँव की तरफ से उन्होंने हमारा स्वागत किया, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं की गाँव के उनके भाई उन्हें बहुत सम्मान की दृष्टि से देखते हैं. उनसे बातचीत में पता चला कि आठवीं कक्षा के बाद उनकी शादी हो गयी थी, लेकिन कुछ वर्ष बाद पति किसी दूसरी महिला के साथ रहने लगा तो वो अपने मायके लौट आयी और फिर से पढ़ाई शुरू की, बी.टी.सी. की और प्राथमिक विधालय में शिक्षिका हो गयी. कई आस-पास के गाँवों, सोसा, गुंजी, धारपांगू, ज्योतिपांगू आदि के गाँवों में उन्होंने पढ़ाया. क्या संयोग कि  इस तरह की प्यारी औरत को जीवन में प्रेम नहीं मिला.  लेकिन स्वाभिमान और खुद्दारी की गहरी छाप उनके चेहरे पर है. जीवन के प्रति कोई कटुता भी नहीं है.
Photo by Sushma Naithani

भोटिया लोगों में शादी ब्याह के तरीके कुछ अलग हैं और संपत्ति के बंटवारे में कुछ मातृसत्ताक रिवाज़ भी हैं.  मुझे सिर्फ कुछ इस तरह की बात याद है कि  बसंत के महीने या किसी मेले में लड़के और लड़कियां अपने जीवन साथी का चुनाव खुद करते हैं.  यहाँ महिलाओं से इस रिवाज़ के बारे में पूछती हूँ तो जबाब मिलता है कि पुराने रिवाज़ के अनुसार सिर्फ पुरुष को अपने लिए पत्नी चुनने का अधिकार था, जो लड़की किसी पुरुष को पसंद आ गयी, वो उस लड़की पर रंग फेंक देता था और वो स्त्री रिवाज़ के अनुसार उसकी हो जाती. यदि स्त्री नहीं मानती थी तो उसे उठाकर जंगल में ले जाते थे, और जबतक वो अपनी नियति स्वीकार नहीं कर लेती गाँव वापस नहीं लाते थे. आज की लड़कियों को इत्मीनान है कि ये पुरानी प्रथा अब समाप्त हो गयी है, गुंडई करके मर्द अब किसी लड़की को जबरन नहीं ले जा सकते,  लड़की और उसके माता-पिता की सहमति के बिना अब कोई शादी नहीं हो सकती.

मंदिर के प्रांगण में कर्णसिंह, जगत सिंह समेत गाँव के मर्द हमारे लिए इस बीच खाना बना रहे हैं, दाल-भात  और आलू-टमाटर-न्युट्रिला की सब्जी, और हमारे साथी गीत गा  रहे हैं, गिरदा के लिखे गीत, नरेंद्र नेगी के गीत, शेरदा  अनपढ़ के गीत.  कुमायूँनी गीतों की और बीच बीच में रंग भाषा में छौंक लगाते हुए कर्णसिंह के गीत भले लग रहे हैं. फिर फैज़ के 'हम मेहनतकश ' की बारी आयी, जिसे बहुत मीठी आवाज और जोश के साथ गाया गया लेकिन, फैज़ का ये गीत इस जगह मेरे कानों को अटपटा और एलियन लगता है.  फैज़ इतने अजनबी मुझे कभी नहीं लगे.
Photo by Sushma Naithani

खाने के बाद विदा का वक़्त हुआ तो शेखर पाठक ने पांगू और उसके आसपास के गाँवों के लोगों को याद किया, यात्रा के बारे में एक छोटा सा भाषण दिया, और इसी बीच बारिश शुरू हो गयी, भट्ट जी ने भी लोगों को धन्यवाद दिया और पहाड़ की आन्दोलनों की परम्परा और विशेष रूप से चिपको आंदोलन को याद किया, गाँव के लोगों को विदाकर, बरसाती ओढ़कर हम लोग वापस तवाघाट की तरफ निकले.

तवाघाट पहुँचते पहुँचते रात हो गयी और वहीँ एन. एच. पी. सी. के गेस्टहाउस में हमने रात बितायी.    

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